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तवलीन सिंह का कॉलम : नई सुबह अभी दूर है

धर्म-मजहब से जुड़ी एक खुशखबरी भी थी पिछले सप्ताह, वह यह कि गुलबर्ग सोसाइटी में जिन्होंने आग लगाई थी 2002 के गुजरात दंगों के दूसरे दिन उनमें से कुछ लोग अब जेल भेज दिए गए हैं।

Author नई दिल्ली | June 5, 2016 4:36 AM
तवलीन सिंह।

आज के दिन बत्तीस साल पहले आॅपरेशन ब्ल्यू स्टार अपनी चरम सीमा पर था। जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने जनरल शबेग सिंह की मदद से ऐसी नाकेबंदी कर रखी थी दरबार साहब की कि भारतीय सेना के कई जवानों को मंदिर में दाखिल होते ही अपनी जानें गंवानी पड़ीं। लड़ाई इतने लंबे समय तक चली कि मंदिर परिसर में टैंक भेजने पड़े और उन्होंने अकाल तख्त को निशाना बनाया, जहां भिंडरांवाले अपने खास साथियों के साथ छिपा हुआ था। अकाल तख्त खंडहर बन गया, कई बेगुनाह श्रद्धालु मारे गए, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी थे और इसके बाद मजहब को लेकर एक जुनून फैला पंजाब में, जो आतंकवाद में तब्दील हो गया।

आॅपरेशन ब्ल्यू स्टार को याद करना इसलिए जरूरी है इस हफ्ते क्योंकि धर्म-मजहब से जुड़ी दो घटनाएं पेश आई हैं, जिन्होंने याद दिलाया कि धार्मिक भावनाएं कितनी आसानी से पागलपन में बदल जाती हैं अपने देश में। इन दिनों नई सुबह की बातें बहुत हो रही हैं, लेकिन यह नई सुबह नहीं आने वाली है, जब तक प्रधानमंत्री अपने कुछ लोगों को नियंत्रण में रखने का प्रयास नहीं करते हैं। वही लोग, जो एक तरह से जिम्मेवार थे मोहम्मद अखलाक की हत्या के लिए, अब ऊंची आवाज में कहते फिर रहे हैं कि चूंकि उसके फ्रिज में पाया हुआ गोश्त गाय का था, एक नई जांच के मुताबिक, उसके परिवार को गोहत्या के अपराध में जेल भेजना चाहिए।

इन आवाजों में सबसे ऊंची आवाज है स्वामी आदित्यनाथ की, जो शायद जानते नहीं हैं कि मुंह खोलते ही वे कितना नुकसान करते हैं, भारतीय जनता पार्टी का और निजी तौर पर प्रधानमंत्री का। एक इंसान की हत्या की गई दादरी में सिर्फ इसलिए कि कुछ हिंदुत्ववादी कट्टरपंथियों को संदेह था कि बिसाहड़ा गांव के इस अकेले मुसलिम घर में गाय का गोश्त खाया जाता है। मोहम्मद अखलाक को इतनी बेरहमी से मारा गया इस शक के आधार पर कि भारत दुनिया भर में बदनाम हुआ। प्रधानमंत्री की विकास और परिवर्तन की बातों पर ऐसा पानी फिर गया कि जैसे उनकी सारी मेहनत बेकार गई हो।

इस बार भी प्रधानमंत्री विदेश गए हैं भारत की शान बढ़ाने, पर यह शान खाक हो जाती है जब स्वामी आदित्यनाथ जैसे लोग अपना मुंह खोलते हैं। जिस देश में बीफ खाने वालों को पीट-पीट के मारा जाए, उस देश में निवेश करने वे क्यों आने वाले हैं, जो खुद बीफ खाते हों और जिनकी सभ्यता में बीफ खाना पाप नहीं पोषण है। सो, प्रधानमंत्री को चुप्पी तोड़ कर अपने उन साथियों को नियंत्रण में लाना होगा, जिनकी फिजूल की बातों के कारण मोहम्मद अखलाक के अलावा कम से कम पांच और मुसलिम नौजवान मारे गए हैं। वह भी सिर्फ इसलिए कि गाय या भैंस अपने ट्रकों में लादे हुए किसी मंडी तक जाने की कोशिश कर रहे थे। बीफ पर पाबंदी के कारण हिंदुओं का शायद उतना ही नुकसान हुआ है, जितना मुसलमानों का हुआ है। कोल्हापुरी चप्पल बनाने वालों ने खुल कर महाराष्ट्र में बीफ पर प्रतिबंध का विरोध किया है।

धर्म-मजहब से जुड़ी एक खुशखबरी भी थी पिछले सप्ताह, वह यह कि गुलबर्ग सोसाइटी में जिन्होंने आग लगाई थी 2002 के गुजरात दंगों के दूसरे दिन उनमें से कुछ लोग अब जेल भेज दिए गए हैं। जकीया जाफरी, जिनके पति अहसान जाफरी उन उनहत्तर लोगों में से थे, जो इस मनहूस जगह पर मारे गए थे, लंबी लड़ाई लड़ने के बाद उम्मीद कर रही थी कि उन तमाम लोगों को सजा हो, जो हिंसक भीड़ में शामिल थे। दंगा पीड़ित लोग यह भी उम्मीद कर रहे थे कि अदालत इस फैसले पर पहुंचे कि गुलबर्ग सोसाइटी पर हमला एक साजिश के कारण हुआ, जिसमें राजनेताओं, अधिकारियों और पुलिस अफसरों के नाम थे। ऐसा अदालत ने नहीं पाया, लेकिन मायूसी के बदले हमको खुशी होनी चाहिए कि न्याय तो हुआ है कुछ हद तक। लंबे अरसे से दंगों पर लिखने के बाद यकीन के साथ कह सकती हूं कि अक्सर जब दंगाई अपनी बिलों में वापस छिप जाते हैं, तो न प्रशासन उनको ढूंढ़ निकालने की कोशिश करता है और न ही कानून के तहत उनके खिलाफ कार्यवाही पूरी तरह से की जाती है।

ऊपर से यह भी अक्सर होता है कि जांच समितियां बिठाई जाती हैं, जिनका असली काम है ऐसी लीपापोती करना कि पता ही न लगे कि अपराधियों में राजनेता भी थे, राजनीतिक दलों का हाथ था। बिलकुल ऐसा हुआ था 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या का बदला लेने कांग्रेस कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के कहने पर तीन दिनों के अंदर दिल्ली शहर में तीन हजार से ज्यादा बेगुनाह सिख मारे गए थे। आज तक इस जनसंहार के पीड़ितों को न्याय नहीं मिला है। न ही उन मुसलिम परिवारों को न्याय मिला है, जिनके मर्दों को हाशिमपुरा की एक गली से पीएसी वाले उठा कर ले गए थे और गंगा नहर के किनारे ले जाकर ट्रक के अंदर ही गोलियों से भून दिया था। दंगों की फेहरिस्त लंबी है और सजा पाने वालों की बहुत छोटी, सो गुजरात में अगर थोड़ा-सा न्याय भी मिला है, तो उम्मीद की किरण तो हम जला सकते हैं।

अच्छा होता अगर हत्यारों के साथ उन अफसरों और सुरक्षा कर्मियों को भी जेल भेजा जाता, जो हिंसा रोकने में नाकाम रहे। एक बार भी अगर ऐसा हुआ होता किसी दंगे के बाद तो शायद 2002 से बहुत पहले ही दंगों का शर्मनाक सिलसिला खत्म हो गया होता। अब अगर उस किस्म के दंगे नहीं होते हैं भारत में जैसे पहले हुआ करते थे, तो सिर्फ टीवी पत्रकारों की सक्रियता के कारण। जैसे भी हुआ हो अच्छा हुआ है, लेकिन नई सुबह अभी दूर है, बहुत दूर।

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