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गतिविधि दिशाहीन प्रक्रिया नहीं

गतिविधि का सबसे विकृत रूप वह है, जो बिना किसी मकसद के कराई जाती है। ऐसी गतिविधि का कोई संदर्भ नहीं होता और वह आनंददायी भी नहीं बन पाती। किसी अवधारणा को सिखाने में कौन-सी गतिविधि उपयुक्त होगी, इसे समझने की जरूरत होती है।

Author May 20, 2018 04:22 am
गतिविधि का सबसे विकृत रूप वह है, जो बिना किसी मकसद के कराई जाती है

कालूराम शर्मा

स्कूली शिक्षा में पिछले कुछ दशक से गतिविधियों का बोलबाला बढ़ा है। स्कूल में बच्चों के साथ शिक्षकों के उन्मुखीकरण को लेकर गतिविधि को मानो रामबाण इलाज के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है। शिक्षक प्रशिक्षकों और शैक्षिक कार्यकर्ताओं को गतिविधि ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है। गतिविधि की गंगा शिक्षा के सर्वोच्च संस्थानों से चल कर स्कूलों तक पहुंच तो गई, मगर इसका स्वरूप मैदानी स्तर पर आते-आते बदल गया। माना जाने लगा के गतिविधि रटने के खिलाफ एक शिक्षण शास्त्र के रूप में उभरेगी, मगर न तो रटना खत्म हुआ और न ही गतिविधियां ठीक ढंग से अपना स्थान बना पार्इं। हम गतिविधि के मर्म को समझ नहीं सके।

स्कूली शिक्षा में गतिविधि शब्द काफी प्रचलित है, मगर इसकी अवधारणा को लेकर गलतफहमियां भी सबसे ज्यादा पैदा हुई हैं। इसका इस्तेमाल करने वाले प्रशिक्षार्थियों, शिक्षाविदों और प्रशासकों ने भी इसे गलत समझा है। शिक्षकों को गतिविधि आधारित शिक्षण करने के लिए प्रेरित किया तो जाता रहा, मगर उन्हें इस तरह से तैयार करने की तरफ ध्यान कम ही दिया गया कि किसी गतिविधि से कैसे किसी अवधारणा को बेहतरी से समझा जा सकता है। बच्चों की कक्षाओं में गतिविधियों होने मात्र से ही समझ लिया जाता है कि बढ़िया शिक्षण हो रहा है। पर गतिविधि महज यांत्रिक प्रक्रिया बन कर रह गई।

उन्मुखीकरण शिविर आजकल गतिविधियों के दम पर ही चलाए जाते हैं। कक्षा में नीरसता भगाने और ताजगी पैदा करने के लिए गतिविधि करा दी जाती है। गतिविधि का अर्थ समझा जाता है- हिलना-डुलना, नाच-गाना, कुछ करना, खेल आदि। गतिविधि से कुछ ऐसा अर्थ भी निकलता है, जिसमें कक्षा में जब बोर हो जाएं, तो उस वक्त आनंद पैदा करने के लिए ‘कुछ’ करवा दिया जाए। प्राथमिक कक्षाओं के स्तर पर वर्णमाला, बारहखड़ी, गिनती और पहाड़ों को हावभाव के साथ कराना स्कूलों में गतिविधि माना जाता है। जहां बच्चे गीत और कवितानुमा अंदाज में हावभाव के साथ गाते हुए दिखते हैं। विज्ञान जैसे विषय में मॉडल बनाना, प्रयोग करना आदि आम गतिविधि है।

एक स्कूल में गतिविधि आधारित शिक्षण के बड़े चर्चे थे। वहां पर पहली और दूसरी के बच्चे पूरे-पूरे दिन भर गिनती-पहाड़ों का आलाप करते। गिनती-पहाड़ों को लेकर कुछ गीत बनाए गए थे। बीच-बीच में बच्चे कुछ कविताएं गाते रहते। जब बच्चों से गिनती सुनाने को कहा जाता तो वे गीत की तर्ज पर बोल तो पाते, मगर वे न तो चीजों की गिनती कर पाते, न ही पहाड़ों की समझ उनमें बन पाई। अगर उनसे पूछें कि अठारह के बाद क्या आएगा, तो वे बताने में भी असमर्थ होते। अगर हम पीछे मुड़ कर देखें, तो महात्मा गांधी की नई तालीम में गतिविधि का कोई उल्लेख नहीं दिखता। नई तालीम का केंद्र बिंदु उत्पादक काम है। बच्चों को हाथों से काम करने के अवसर अधिक से अधिक मिलें। जब बच्चा काम करेगा तो उसके हाथ, हृदय और दिमाग तीनों इस प्रक्रिया में शामिल होंगे। जाहिर है कि नई तालीम संज्ञानात्मक विकास के साथ भावनात्मक और शारीरिक विकास पर भी जोर देती है। रवींद्रनाथ ठाकुर मानते थे कि बच्चों को अधिक से अधिक सोचने के लिए प्रेरित किया जाए।

अधिकतर गतिविधियां बेकार और उबाऊ होती हैं। ऐसी गतिविधियों को न तो बच्चे समझ पाते हैं और न ही उनके मकसद और उपयोगिता से परिचित हो पाते हैं। गतिविधियां कई बार इसलिए भी अर्थपूर्ण नहीं होतीं, क्योंकि वे सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक नहीं होतीं। दरअसल, स्कूल अपने आप में समुदाय ही होते हैं, जहां विभिन्न संस्कृतियों के बच्चे होते हैं और एक साथ मिल कर सीखते हैं। देखा जाए तो व्यवहार में, आदतों, सामाजिक दायित्वों आदि में विभिन्न संस्कृतियों में काफी फर्क होता है। यह फर्क सीखने पर काफी असर डालता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि उन छात्रों के समूह के लिए अर्थपूर्ण गतिविधियां उतनी सार्थक नहीं होतीं, जो दूसरी संस्कृति को मानने वाले समूह के लिए होती हैं।

जरूरत है कि कक्षा में की जाने वाली गतिविधियों को बेहतर और अर्थपूर्ण अंदाज में इस प्रकार से करें कि वास्तविक परिस्थितियों जैसा माहौल पैदा हो। गतिविधियों में वास्तविक संदर्भ को कुछ इस प्रकार से लाया जाए, मानो वे छात्रों के जीवन में घटित हो रही हों। मसलन, कक्षा में बच्चों को दीवार अखबार निकालने को कहा जा सकता है, जहां वे अपने क्षेत्र की खबरों को उस अखबार में स्थान दें। दरअसल, गतिविधि एक साधन है साध्य नहीं। हो यह रहा है कि गतिविधि ही साध्य बन जाती है। गतिविधि के आयोजन के पहले यह सोचना जरूरी है कि हम बच्चों के साथ किस नजरिए से पेश आते हैं। अगर हम यह मान लेते हैं कि बच्चों को कुछ आता-जाता नहीं और सब कुछ हमें ही सिखाना है, तो माजरा कुछ और हो जाता है। अगर यह मान कर चला जाता है कि बच्चे खाली घड़े नहीं होते, उन्हें अपने आसपास की दुनिया का भान है। बच्चों में सीखने की अपार क्षमता होती है, तो फिर कक्षा में सीखने-सिखाने का दृश्य बदल जाता है।

पश्चिमी अंचल के आदिवासी इलाके में एक स्कूल के आदिवासी बच्चों ने अपने क्षेत्र में अकाल के अनुभवों का अनूठा दस्तावेज तैयार किया। बच्चों ने अपने क्षेत्र के बुजुर्गों से बातचीत की और उसे लिखते गए। यह काम लगभग एक-डेढ़ माह तक चला। इस गतिविधि से जो निकल कर आया वह एक दस्तावेज बन सका। इसे आप गतिविधि कहें या शोध कार्य, मगर यह कार्य बच्चों ने किया। इस गतिविधि ने बच्चों में आत्मविश्वास पैदा किया। मनोवैज्ञानिकों ने साबित किया कि बच्चे खुद करके, अपने अनुभवों से बेहतर और जल्दी सीखते हैं। सीखने की प्रक्रिया में अपने आसपास के परिवेश से जुड़ी घटनाएं, चीजें और खोजबीन मददगार होती हैं। यही बातें राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा भी कहती है। कक्षाओं में कोई भी काम जब तक बच्चों के संज्ञान से नहीं जुड़ता, वह शिक्षा नहीं है। इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर गतिविधियां रचने की जरूरत है।

गतिविधि में चुनौती का होना अपरिहार्य है। दरअसल, किसी भी गतिविधि में चुनौती से आशय है कि गतिविधि करने वाले को अंजाम पता नहीं होना चाहिए। अंजाम गतिविधि करने वाला खोजे। तभी तो गतिविधि का कोई अर्थ होगा, वरना गतिविधि मात्र एक औपचारिकता से अधिक नहीं होगी। कहना न होगा कि हमारे यहां सरकारी स्कूल हों या महंगे अंग्रेजी स्कूल, वहां गतिविधियां तो होती हैं, मगर उनमें संज्ञानात्मक पहलू उपेक्षित रहता है। हमें यह भी समझना होगा कि हर चीज गतिविधि से नहीं सीखी जा सकती। दर्शनशास्त्र, बाल मनोविज्ञान जैसे मामलों में मूलभूत समझ बनाने में गतिविधियां अधिक कारगर नहीं हो सकतीं। स्कूली शिक्षा तंत्र में जो गतिविधियां प्रचलित हैं वे ‘रेडीमेड’ हैं। वे तुरंता आहार की तरह हैं। शिक्षकों से विभिन्न शिविरों में इसी तरह की गतिविधियां कराई जाती हैं। इसे विडंबना कहें कि ये रेडीमेड गतिविधियां ही शिक्षक अपनी कक्षाओं में करवाने को मजबूर हैं।

गतिविधि का सबसे विकृत रूप वह है, जो बिना किसी मकसद के कराई जाती है। ऐसी गतिविधि का कोई संदर्भ नहीं होता और वह आनंददायी भी नहीं बन पाती। किसी अवधारणा को सिखाने में कौन-सी गतिविधि उपयुक्त होगी, इसे समझने की जरूरत होती है। साथ ही यह भी कि गतिविधि तो हो गई, मगर उससे सीखने को क्या मिला? किसी भी गतिविधि का अगला चरण होना चाहिए विश्लेषण। इस बात का ध्यान रखने की भी जरूरत होगी कि कहीं ऐसा न हो कि हर गतिविधि के बाद ‘हमने क्या सीखा’ की तर्ज पर पूछा जाए और कक्षा में सीखने का मजा ही किरकिरा हो जाए।

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