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दूसरी नजरः खत्म हुर्इ आधार की बुराइयां

आधार का मकसद एक विशिष्ट पहचान संख्या देना था, ताकि न तो यह फर्जी बनाया जा सके और न ही इसका प्रतिरूप तैयार हो सके।

Author October 1, 2018 7:40 AM
आधार परियोजना के तहत जनवरी 2013 से लाभ देना शुरू कर दिया गया था। इसे प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजना नाम दिया गया।

आधार का मकसद एक विशिष्ट पहचान संख्या देना था, ताकि न तो यह फर्जी बनाया जा सके और न ही इसका प्रतिरूप तैयार हो सके। और ऐसा हो भी नहीं सकता। कल्याणकारी राज्य लाभार्थियों को जो पैसा देते हैं वह नगदी या फायदों के रूप में होता है। छात्रवृत्ति, वृद्धों और दिव्यांगों को पेंशन, एलपीजी सिलेंडर के लिए सबसिडी इसके उदाहरण हैं। हमने देखा है कि प्राइवेट कॉलेजों में ‘फर्जी’ छात्रों के नाम दर्ज होते हैं जिनके नाम पर छात्रवृत्तियां डकार ली जाती थीं। यह भी देखने को मिला कि कई घरों में दो या दो से ज्यादा एलपीजी सिलेंडर कनेक्शन थे और लोग डीलर की मिलीभगत से सब पर सबसिडी ले रहे थे। यह भी देखा कि एलपीजी डीलरों ने भी फर्जी ग्राहक बना रखे थे और उनके नाम पर सबसिडी ले रहे थे और इन सिलेंडरों को होटलों, रेस्टोरेंट और शादियों में इस्तेमाल के लिए किराए पर दिया जा रहा था।

दूसरी समस्या यह थी कि गरीबों के पास अपनी पहचान बताने के लिए कोई विश्वसनीय और प्रामाणिक तरीका नहीं था। सबसे ज्यादा मुश्किल बाहर से आए कामगारों, झुग्गियों में रहने वालों, वनों में रहने वालों और सड़कों पर रहने को मजबूर लोगों को हो रही थी। इन लोगों के पास कोई प्रामाणिक पता तो होता नहीं था, मतदाता सूचियों में भी इनके नाम नहीं थे, न ही किसी सरकारी रिकार्ड में कहीं ये दर्ज थे, इसलिए इन लोगों को राशन कार्ड नहीं मिल सकता था, बच्चों का स्कूल में दाखिला नहीं हो पाता था। कुल मिला कर ये लोग पुलिस, नगर निगम और वन अधिकारियों की मेहरबानी पर ही निर्भर थे जो इन्हें घुसपैठिया मानते हुए इनके साथ अमानवीय बर्ताव करते थे।

पहचान जरूरी

ऐसा नहीं है कि गरीब की अपनी कोई पहचान नहीं होती। हर इनसान की पहचान की तरह ही उनकी भी अपनी पहचान है, लेकिन वे खुद को पहचान नहीं सके, खासतौर से अपनी गरीबी के कारण। यूपीए सरकार ने इस समस्या और इसके आकार को पहचाना। इसके लिए हमें एक ऐसा तरीका खोजने की जरूरत थी जो हर व्यक्ति की अपनी पहचान कायम करने में मददगार साबित होता। और यह पहचान सबसिडी, लाभ या सेवा देने वाले को भी मंजूर होना चाहिए था। इसलिए ‘पहचान प्राधिकरण’ की जरूरत महसूस हुई।
इस तरह आधार का विचार और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआइडीएआइ) अस्तित्व में आया। आधार का उद्देश्य लोगों के लिए एक ऐसा आसान तरीका तैयार करना था जिससे सबसिडी, लाभ और सेवाओं का फायदा उन तक पहुंच सके। कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा और आसानी से आधार बनवा सकता था। इसके पंजीकरण का काम 2010 में शुरू हुआ था।

आधार परियोजना के तहत जनवरी 2013 से लाभ देना शुरू कर दिया गया था। इसे प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजना नाम दिया गया। शुरू में इसे प्रयोग के तौर पर कुछ सीमित जिलों में और सीमित लाभों के लिए ही चलाया गया था। डीबीटी के तहत सबसे पहले छात्रवृत्तियों, कल्याणकारी कार्यों से जुड़े भुगतानों और एलपीजी सबसिडी को शामिल किया गया था। इन लाभों को हासिल करने के लिए प्राप्तकर्ता के पास आधार होना जरूरी था।

जब निगरानी होने लगी

मई 2014 में नई सरकार सत्ता में आई। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब उसने आधार का कड़ा विरोध किया था। शुरू में, डीबीटी को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं थी, जैसा कि बाद में सरकार ने माना भी। लेकिन बाद में नंदन नीलेकणी ने सरकार को ‘समझा’ लिया। मुझे संदेह है कि सरकार ने तकनीकी के महारथी नीलेकणी की बात नहीं मानी होगी, और इसके बजाय किसी ऐसे व्यक्ति का कहना माना होगा जिसने बड़ी चतुराई से आधार परियोजना को एक निगरानी और जासूसी तंत्र बनाने की संभावना भांप ली थी।

एनडीए सरकार ने लोगों के बीच इस झूठ को फैलाने की कोशिश की कि जो व्यक्ति अपने को ही नहीं पहचान सकता, तो उसकी क्या पहचान होगी। जबकि और ज्यादा सबसिडी, लाभ और सेवाएं इस परियोजना के तहत लाई जा चुकी थीं। मंत्रियों और विभागों को निर्देश दे दिए गए कि वे आधार के लिए लोगों पर दबाव डालें, रोजमर्रा की तमाम गतिविधियों से आधार को जोड़ें। सारे विपक्ष को दरकिनार कर दिया गया। तब तक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था, और आधार को बैंक खातों, मोबाइल टेलीफोन, पेंशन, स्कूलों में दाखिले, परीक्षाओं, म्युचुअल फंड में निवेश, बीमा पॉलिसियों, क्रेडिट कार्ड, पोस्ट आॅफिस योजनाओं, पीपीएफ योजना, किसान विकास पत्र, मिड-डे मील योजना आइसीडीएस जैसी योजनाओं के लिए अनिवार्य बना दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अस्थायी रूप से रोक लगाई, लेकिन सरकार ने इस अंतरिम आदेश को चुनौती दी। अदालत में सरकार ने आधार को तमाम सेवाओं से जोड़ने को जायज ठहराया। दरअसल सरकार उस कानून को मान कर चल रही थी, जो उसने धोखाधड़ी से वित्त विधेयक के रूप में पास करा लिया था।

आखिरकार, आधार के नाम पर लोगों पर निगरानी रखने की सरकार की यह परियोजना ध्वस्त हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने चार-एक के बहुमत के फैसले से आधार परियोजना को सबसिडी, लाभों और सेवाओं तक सीमित कर दिया है। बाकी सारी दूसरे क्षेत्रों पर पाबंदी लगा दी गई है। उदाहरण के लिए स्कूल में दाखिलों, या बैंक खातों या मोबाइल या परीक्षाओं आदि में अब आधार की जरूरत नहीं है।

चिंतन की जरूरत

मेरे विचार से, आधार कानून को वित्त विधेयक की तरह पारित करने को लेकर बहुमत ने असाधारण रूप से न्यायिक सहिष्णुता दिखाई है। कानून का एक प्रावधान पढ़ते हुए और अगले दो छोड़ते हुए, वित्त विधेयक की तरह इसे पास करने को सही ठहरा दिया गया। बहुमत के इस फैसले में यह बुनियादी त्रुटि है। लेकिन यह मामला किसी और दिन व अन्य मसले के लिए सुरक्षित रख लिया गया है।

बहुमत का यह फैसला जहां जबर्दस्त मेहनत का नतीजा नजर आ रहा है, वहीं न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का असहमति वाला फैसला अदालत के असहमति वाले फैसलों के बीच गिना जाएगा। अगर जस्टिस ह्यूजेस के शब्दों में देखें तो यह आने वाले कल के लिए कानून की भावना के बारे में विचार की अपील करता है। असहमति भविष्य के लिए अदालत की दिशा को तय करती है और उन लोगों के लिए उम्मीद बनाए रखती है जो यह तर्क देते रहे हैं कि आधार का मौजूदा स्वरूप असंवैधानिक था।

इस साल संविधान पीठों ने जितने भी फैसले दिए हैं, उनसे निरंकुशता कम हुई है, लोगों की आजादी के दायरे को विस्तार मिला है और संवैधानिक नैतिकता के आदर्शों को और मजबूती मिली है। यूपीए ने आधार परियोजना पर जो विचार किया था, वह पुनजीर्वित हो गया है। आधार की ‘अच्छाइयों’ को बचा लिया गया है। और आधार में जो ‘बुराइयां’ आ गई थीं, उन्हें पहचान कर खत्म कर दिया गया है। लेकिन अभी काफी कुछ है। हमेशा की सतर्कता आजादी की कीमत है।

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