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गीता प्रेस

सागर में जहां हम बचपन-लड़कपन में पले-बढ़े, हमारे नाना के यहां, जो हमारे सामने ही रहते थे और जहां पढ़ने-लिखने के लिए हम अक्सर जाते थे...

Author October 18, 2015 12:04 PM

सागर में जहां हम बचपन-लड़कपन में पले-बढ़े, हमारे नाना के यहां, जो हमारे सामने ही रहते थे और जहां पढ़ने-लिखने के लिए हम अक्सर जाते थे, गीता प्रेस गोरखपुर से निकलने वाली पत्रिका ‘कल्याण’ नियमित रूप से आती थी। उसमें हर महीने प्रकाशित नीतिपरक कहानियां पढ़ कर ही साहित्य में रुचि जागी होगी ऐसा अनुमान है, हालांकि ठीक से याद नहीं। मेरी मां हर दिन गीता प्रेस से ही प्रकाशित ‘रामचरितमानस’ से पाठ करती थी और उसी की पूजा भी- उसके प्राय: हर पन्ने पर चंदन और अक्षत की छापें होती थीं। इधर गीता प्रेस और उसकी हिंदू धार्मिकता में भूमिका पर फिर से ध्यान गया है।

अच्युतानंद मिश्र ने गीता प्रेस के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार को मिले और उनके द्वारा लिखे पत्रों का एक संचयन ‘पत्रों में समय-संस्कृति’ नाम से संपादित और प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित किया है। महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सीवी रमण आदि से लेकर प्रेमचंद, प्रसाद, किशोरीदास वाजपेयी, राहुल सांकृत्यायन, क्षितिमोहन सेन, बनारसीदास चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त आदि के पत्र संकलित हैं। प्रेमचंद ने लिखा था कि ‘मेरे लिए धार्मिक तत्त्वों पर कुछ लिखना अनधिकार है। आप अधिकारी होकर मुझ अनधिकारी से लिखाते हैं… ‘श्रीकृष्ण और भावी जगत’ यह प्रसंग मेरे अनुकूल है और इसी पर कुछ लिखूंगा।’

गांधीजी ने 1932 में यरवदा मंदिर से लिखा: ‘… परंतु जब तक हृदय में थोड़ा-सा भी विकार भरा है वहां तक पूर्ण विश्वास का दावा नहीं किया जा सकता।… दूसरे के विश्वास की कितनी भी घटनाएं हम सुनें उससे हमारे हृदय में श्रद्धा बैठ नहीं सकती। बुद्धि को अवश्य थोड़ी मदद मिलती है। हृदय के लिए निजी पुरुषार्थ अत्यावश्यक है और वह पुरुषार्थ संयममयी श्रद्धा से ही शक्य है।’ यह सलाह भी गांधीजी ने दी थी: ‘कल्याण में दो नियमों का पालन करना- बाहरी कोई विज्ञापन नहीं देना है और पुस्तकों की समालोचना नहीं करनी है।’

पोद्दारजी ने तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को पत्र लिखते हुए उन्हीं के पत्र का एक उद्धरण दिया है: ‘आप इतने महान हैं, इतने ऊंचे महामानव हैं कि भारतवर्ष को क्या, सारी मानवी दुनिया को इसके लिए गर्व होना चाहिए। मैं आपके स्वरूप के महत्त्व को न समझ कर ही आपको ‘भारत रत्न’ की उपाधि देकर सम्मानित करना चाहता था। आपने उसे स्वीकार नहीं किया, यह बहुत अच्छा किया। आप इस उपाधि से बहुत-बहुत ऊंचे स्तर के हैं।’

रामचरितमानस के प्रामाणिक पाठ के सिलसिले में भी पोद्दारजी की भूमिका थी और उन्होंने उसके लिए विशेषज्ञों की समिति भी बनाई थी। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने 1957 में लिखा: ‘… किसी को इस बात का गर्व नहीं होना चाहिए कि मैं भाषा और साहित्य का पंडित हूं तो मैं मानस का संशोधन करने का अधिकारी हूं। यह संशोधन तो अवधी भाषा की प्रकृति के अनुसार गोस्वामीजी की काव्य मर्यादा और भाव मर्यादा के अनुसार होना चाहिए।… इस संबंध में किसी प्रकार का दुराग्रह न रख कर सद्भाव और भक्ति के साथ इसमें हाथ लगाना चाहिए।’

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