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तीरंदाजः भाषा भेद न कीजै

महात्मा गांधी ने कहा था राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। यह बात सच है। राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का होना जरूरी है।
प्रतीकात्मक चित्र

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के अनुसार हिंदी आम बोलचाल की महाभाषा है। ग्रियर्सन भारतीय भाषाविज्ञान के महान उन्नायक थे। उनका भारतीय भाषाओं के अध्ययन में अति विशिष्ट स्थान है। उनकी ख्याति का प्रधान स्तंभ लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इंडिया है। यह सर्वेक्षण राष्ट्रभाषा के निर्माण की विधि की ओर भी इंगित करता है।

ग्रियर्सन कृत सर्वेक्षण अपने ढंग का एक विशिष्ट ग्रंथ है। उसमें हमें भारतवर्ष का भाषा संबंधी मानचित्र मिलता है, जिसका अत्यधिक सांस्कृतिक महत्त्व है। दैनिक जीवन में व्यवहृत भाषाओं और बोलियों का इतना सूक्ष्म अध्ययन पहले कभी नहीं हुआ था।
ग्रियर्सन आयरलैंड के रहने वाले थे। वे 1873 में इंडियन सिविल सर्विस के अफसर होकर हिंदुस्तान आए थे। उनका रुझान भाषाओं की तरफ शुरू से ही था। भारत आने से पहले उन्होंने संस्कृत और अन्य प्रचलित भारतीय भाषाओं का अध्ययन शुरू कर दिया था। सरकारी कामों से छुट्टी पाने के बाद वे अपना अतिरिक्त समय संस्कृत, प्राकृत, पुरानी हिंदी, बिहारी और बांग्ला भाषाओं और साहित्यों के अध्ययन में लगाते थे।

अपने कार्यकाल में ग्रियर्सन ने महत्त्वपूर्ण खोज कार्य किए, जिनमें उत्तरी बंगाल के लोकगीत, कविता और रंगपुर की बांग्ला बोली, राजा गोपीचंद की कथा; मैथिली ग्रामर, सेवेन ग्रामर्स ऑफ दि डायलेक्ट्स ऑफ दि बिहारी लैंग्वेज, कश्मीरी व्याकरण और शब्द कोश, पद्मावत का संपादन, बिहारीकृत सतसई (लल्लू लाल कृत टीका सहित) का संपादन, नोट्स ऑन तुलसीदास, दि माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान आदि उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण रचनाएं हैं।

पर उनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया है। 1888 से 1903 तक उन्होंने इसके लिए सामग्री संकलित की थी। उसके बाद सर्वे के विभिन्न खंड क्रमश: प्रकाशित होने लगे थे। यह इक्कीस जिल्दों में है और उनमें भारत की 179 भाषाओं और 544 बोलियों का सविस्तार सर्वेक्षण है। इनमें भाषाविज्ञान और व्याकरण संबंधी सामग्री भी उपलब्ध है।

ग्रियर्सन का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने तमाम भाषाओं और बोलियों का अध्ययन करने के बाद हिंदी को बोलचाल की महाभाषा बताया था। साथ ही उन्होंने यह भी बताया था कि बोलियों से भाषाएं बनती हैं और एक भाषा दूसरी भाषा से शब्द, मुहावरे और व्याकरण लेकर समृद्ध होती है। कोई भी भाषा अपने को एकदम अलग नहीं रख सकती है। उसमें बाहर से आए हुए शब्द जुड़ते रहते हैं और वे निरंतर कालानुसार व्यावहारिक होती चली जाती है।

वैसे प्राचीन काल से ही बोलचाल की भाषा और सरकारी भाषा अलग रही है। क्लिष्ट संस्कृत या तमिल को ग्रंथों की रचना के लिए प्रयोग में लाया गया था, पर उनका दैनिक उपयोग बोलियों के माध्यम से होता था। समय और स्थान के अनुसार भी उनका प्रयोग अलग-अलग तरीके से किया जाता था। दरबारी भाषा हमेशा क्लिष्ट और रूढ़िवादी रही है।

ग्रियर्सन आयरलैंड के रहने वाले थे और कहने को वहां अंग्रेजी बोली जाती थी, पर आयरलैंड की अंग्रेजी क्वीन्स इंग्लिश से एकदम अलग थी। इग्लैंड में ही दक्षिण की ओर जाने पर वेल्स की अंग्रेजी ऐसी थी, जिसे लंदन से आया व्यक्ति नहीं समझ सकता था। एक और रोचक बात यह थी कि इग्लैंड के दरबार में अंग्रेजी बोलना अच्छी शिक्षा का आभाव माना जाता था। फ्रेंच में बात करने का चलन था और बुद्धिजीवी अपने को लैटिन में बयान करते थे।

फ्रांस के दरबार में फ्रेंच नहीं, बल्कि लैटिन का चलन था। फ्रेंच आम लोग बोलते थे। स्कूलों में ग्रीक और लैटिन पढ़ाई जाती थी, क्योंकि उसका ज्ञान उच्च पद पाने के लिए जरूरी माना जाता था। हिंदुस्तान में भी सौ साल पहले तक सरकारी भाषा फारसी-उर्दू और अंग्रेजी थी। कोर्ट-कचहरी के मामले फारसी-उर्दू में निपटाए जाते थे और अच्छे घर के बच्चे उर्दू-फारसी और अंग्रेजी में शिक्षा ग्रहण करते थे।

वैसे अंग्रेजी यूरोप में नहीं फैल पाई थी। क्वीन्स इंग्लिश को फैलाने में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विशेष योगदान रहा था। वैसे हम जो अंग्रेजी बोलते हैं, वह वास्तव में अंग्रेजी नहीं है। वह फ्रेंच, हिब्रू, जर्मन, डच, स्पेनिश, इटालियन, लैटिन, ग्रीक, जापानी, फारसी, उर्दू, हिंदी आदि का घोल है। इसमें हजारों शब्द बाहर से लिए गए हैं और उनके अंग्रेजी में चलन की वजह से उन्हें हम अंग्रेजी शब्द मानने लगे हैं। उदाहरण स्वरूप ‘बॉस’ उन्नीसवी शताब्दी में जन्मा डच शब्द है, ‘शिट’ जर्मन है और ‘होनचो’ जापानी शब्द है। पर जब हम इनका उपयोग करते हैं तो अंग्रेजी में बोल रहे होते हैं।

महात्मा गांधी ने कहा था राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। यह बात सच है। राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का होना जरूरी है। हिंदी उसके लिए उपयुक्त भी है। पर कौन-सी हिंदी? क्लिष्ट संस्कृत वाली हिंदी या फिर हिंग्लिश वाली हिंदी? या फिर ब्रज, अवधी, भोजपुरी मिश्रित हिंदी?

वास्तव में आधुनिक भारत को ऐसी राष्ट्रभाषा की दरकार है, जो बोलचाल की भाषा तो हो ही, पर साथ में साहित्य सृजन से लेकर सरकारी कामकाज तक में भी प्रभावी हो सके। हमें ऐसी भाषा चाहिए, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए कारगर हो।

ऐतिहासिक कारणों से भारत में राष्ट्रभाषा का प्राकृतिक रूप से विकास नहीं हो पाया था। फारसी और उर्दू के बाद अंग्रेजी हम पर सरकारी भाषा बना कर थोपी गई थी और उसके जरिए निज भाषाओं को लगभग बोलियों में बदल दिया गया था। स्वतंत्रता पाने के बाद हिंदी का ‘सरकारी’ विकास शुरू हुआ था और उसके चलते क्षेत्रीय मुद्दे उठ खड़े हुए थे। इस जद्दोजहद में हिंदी विकृत होकर हिंगलिश बन गई है। आज हम न अच्छी हिंदी बोल-लिख पाते हैं और न ही अच्छी अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं।

भारत में भाषा और बोलियों की असंख्य धाराएं हैं। राष्ट्रीय भाषा में इन धाराओं का समावेश होना चाहिए। हर भाषा से उपयुक्त शब्द लेकर ही राष्ट्रीय भाषा का निर्माण हो सकता है। अगर तमिल, कन्नड़, तेलगु, मलयालम, गुजराती, उड़िया, मराठी, असमी, उर्दू, इंग्लिश आदि का समावेश किया जाए तो हिंदी ज्यादा सार्थक होगी और उसकी राष्ट्रीय पहचान बनेगी।

अंग्रेजी के साथ ऐसा ही हुआ है। उसने मुड़ कर लैटिन की तरफ नहीं देखा, बल्कि अपने इर्दगिर्द की भाषाओं से शब्द लेकर अपने को समृद्ध किया। इससे वह जल्दी सर्व स्वीकार्य हो गई।
हिंदी का काम अंग्रेजी से ज्यादा आसान है। ज्यादातर भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है। संस्कृत को आधार बना कर भारतीय भाषाओं के शब्दों को राष्ट्रीय हिंदी में पिरो लेना चाहिए। जो लोग हिंदी में दूसरी भाषाओं के शब्दों के प्रवेश का विरोध करते हैं, उन्हें अंग्रेजी से सबक लेना चाहिए।

हिंग्लिश से सबक लेकर वे हिंदी को परिवर्तनात्मक मोड़ दे सकते हैं। वे अन्य भारतीय भाषाओं से अपना परहेज त्याग कर उनको सहज हिंदी से जोड़ सकते हैं। अगर ठेठ तमिल, तेलगु, उर्दू, बंगाली आदि के शब्दों का चलन हिंदी में आम हो जाए तो हिंदी बोलचाल की महाभाषा से राष्ट्रीय महाभाषा बन सकती है।

महात्मा गांधी ने कहा था राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। यह बात सच है। राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का होना जरूरी है। हिंदी उसके लिए उपयुक्त भी है। पर कौन-सी हिंदी? क्लिष्ट संस्कृत वाली हिंदी या फिर हिंग्लिश वाली हिंदी? या फिर ब्रज, अवधी, भोजपुरी मिश्रित हिंदी?

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