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वक्‍त की नब्‍ज : तवलीन सिंह

घाटी में अमन का रास्ता पहले तो कश्मीर के राजनेताओं को स्वीकार करना होगा कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर कभी वापस नहीं आने वाला है। इसको जब स्वीकार करेंगे तो उनको दिखने लगेगा कि प्रधानमंत्री से वे आसमान भी अगर मांगेंगे तो वे शायद मना नहीं करेंगे। उनकी कश्मीर नीति सफल तभी मानी जाएगी, जब घाटी में शांति इस हद तक फैलेगी कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो सके।

कश्‍मीर में घारा 370 लगाने के बाद का दृश्‍य।

कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने सोच-समझ कर बोला होता पिछले सप्ताह, तो ध्यान में जरूर आता कि उनके बयान से कश्मीरी लोगों का कितना नुकसान होगा। महबूबा मुफ्ती ने अठारह महीने नजरबंदी से रिहा होने के बाद पत्रकारों से कहा कि भारत का झंडा कश्मीर घाटी में तभी फहराया जाएगा, जब कश्मीर का अपना झंडा फहराने का हक उनको वापस लौटाया जाएगा। लापरवाही से दिए गए इस बयान ने कई भारतीयों को उन दिनों की याद दिलाई, जब हम कश्मीर जाया करते थे छुट्टियां मनाने और कश्मीरी हमसे पूछा करते थे कि ‘क्या आप इंडिया से आए हैं?’

याद है मुझे, जब बचपन में मुझसे किसी शिकारावाले ने यह सवाल किया, तो मैंने गुस्से में आकर उससे पूछा था कि वह अपने आप को किस देश का नागरिक समझता है। उसने जवाब नहीं दिया, लेकिन कई कश्मीरी उस समय भी कहा करते थे कि मुसलिम होने के नाते उनका लगाव पाकिस्तान से ज्यादा है। यह वह दौर था जब अमन-शांति इतनी थी कश्मीर घाटी में कि हर दूसरी हिंदी पिक्चर घाटी में फिल्माई जाती थी और श्रीनगर में पर्यटक इतने हुआ करते थे कि होटल और हाउसबोट भरे रहते थे गर्मियों में।

फिर आया जिहादी आतंकवाद का दौर, जिसमें हिंसा और अराजकता इतनी फैलती गई कि मेरे जैसे लोग जो हर साल जाया करते थे कश्मीर, वहां से दूर भाग कर कुल्लू-मनाली जाने लगे। जिहादी आतंकवाद जैसे फैला उसके साथ फैला एक कट्टर किस्म का इस्लाम, जिसके आते ही सिनेमा घर, शराब की दुकानें और होटलों में बार, सब जबर्दस्ती बंद करवा दिए गए। बंद करवाने वाले लोग हथियारबंद युवक थे, जिन्होंने बेनकाब औरतों और बच्चियों पर तेजाब फेंकना शुरू किया। देखते ही देखते कश्मीर एक इस्लामी मुल्क बन गया, जिसमें न पंडितों की जगह रही और न पर्यटकों की।

मैं जाती रही कश्मीर, एक पत्रकार के नाते और जब भी गई, मैं मिली उन राजनेताओं से जो भारत के हमदर्द माने जाते हैं। उनसे जब मैं कश्मीर के बदलते चेहरे के बारे में पूछा करती थी, तो उनका एक ही जवाब हुआ करता था कि जिहादी आतंकवाद को रोक नहीं सकते हैं, इसलिए कि जिहादी इस्लाम को फैलाने के लिए घाटी में इस्लामी देशों से बहुत पैसा आ रहा है। सो, जब पिछले वर्ष संसद में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर रद्द किया गया, मोदी सरकार को समर्थन मिला पूरे देश का। कश्मीर के राजनेताओं को हजम करना पड़ेगा कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर की वापसी अधिकतर भारतीय नहीं चाहते हैं।

फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे राजनेताओं ने अगर रिहा होते ही मांग की होती राज्य का दर्जा वापस देने की और उसके बाद चुनावों की घोषणा की होती, तो उनके साथ न सिर्फ हमदर्दी होती देश की, बल्कि पूरा समर्थन भी। अफसोस की बात है कि पहले फारूक ने कहा कि उनको चीन ज्यादा पसंद है भारत से, क्योंकि चीन ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को दुबारा बहाल करने की मांग की है।

क्या फारूक साहब जानते नहीं हैं कि चीन ने अपने मुसलमानों को किस तरह कैद करके उनको जबर्दस्ती इस्लाम त्यागने पर मजबूर किया है? क्या जानते नहीं हैं कि मुसलमानों को अपने मजहब और अपनी सभ्यता को जिंदा रखने की इजाजत जितनी भारत में है वह शायद ही किसी अन्य गैर-इस्लामी मुल्क में होगी? सो, इस तरह के गैर-जिम्मेदार बयान देने से कुछ नहीं हासिल होगा।

माना कि मोदी सरकार से गलतियां हुई हैं अपनी कश्मीर नीति को लेकर। सबसे बड़ी गलती थी राज्य का दर्जा समाप्त करना और दूसरी गलती थी अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को जबर्दस्ती और कर्फ्यू लगा कर थोपना कश्मीर की जनता पर। एक न एक दिन इस अनुच्छेद को जाना ही था, क्योंकि इसने कश्मीरियों को इस भ्रम में रखा है कि वे भारतीय नहीं हैं, विदेशी हैं।

लेकिन अगर कश्मीर के लोगों को साथ लेकर यह कदम उठाया होता तो आज शायद वह परिवर्तन दिखता विकास के तौर पर, जो दशकों से नहीं दिखा है, क्योंकि अशांति के बीच सरकारें भी निवेश करने से कतराती हैं। निजी निवेशक कैसे आएंगे, जिनके बिना न कारखाने लगेंगे न उद्योग और न ही पर्यटन की सुविधाओं में निवेश करेगा कोई।

तो अब क्या होगा? पहले तो कश्मीर के राजनेताओं को स्वीकार करना होगा कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर कभी वापस नहीं आने वाला है। इसको जब स्वीकार करेंगे तो उनको दिखने लगेगा कि प्रधानमंत्री से वे आसमान भी अगर मांगेंगे तो वे शायद मना नहीं करेंगे। उनकी कश्मीर नीति सफल तभी मानी जाएगी, जब घाटी में शांति इस हद तक फैलेगी कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो सके। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक कश्मीर का विशेष दर्जा हटाने का कोई मतलब नहीं होगा। फिलहाल उस अंग्रेजी कहावत के मुताबिक गेंद कश्मीर के राजनेताओं के हाथ में है। जिधर चाहें फेंक सकते हैं।

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