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रोजी के संघर्ष में भाषा का सवाल

भाषा का न तो मानव-सभ्यता से परे कोई अस्तित्व है और न भाषा के बिना जीवन की पूर्णता की कामना की जा सकती है।

हिन्दी।

भाषा का न तो मानव-सभ्यता से परे कोई अस्तित्व है और न भाषा के बिना जीवन की पूर्णता की कामना की जा सकती है। जिस प्रकार जीवन की परंपरा में हम अलग-अलग समाज या समूह देखते हैं, उसी प्रकार भाषा की परंपरा में भिन्न भाषाएं और लिपियां प्रयोग में आती हैं, इसमें संकेत और कूट भाषा भी शामिल है। इन दोनों की परंपराओं के विकास का लंबा अनुक्रम रहा है और आगे भी न तो जीवन का विकास स्थिर है और न भाषा का। इसलिए भाषा का भविष्य मानवीय सभ्यता के भविष्य के साथ जुड़ा है। हां, भाषाओं के समूह में से किस भाषा का अपना जीवन सुनिश्चित रहेगा या अमुक भाषा का कौन-सा रूप बचा रहेगा, जैसे सवाल हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे। किसी भाषा में कितने नए शब्द जुड़ेंगे और कितने सामयिक प्रयोग से बाहर हो जाएंगे, जैसे मुद्दे व्यापक समाज और सत्ताओं के रुख से तय होते हैं।

मात्र किसी भाषा की संरचना या वैज्ञानिकता के भरोसे उस भाषा की गतिकी का निर्धारण नहीं होता है। अगर ऐसा होता तो तमाम अवैज्ञानिकताओं के साथ अंग्रेजी के स्थान पर सबसे वैज्ञानिक भाषा संस्कृत आज विश्वभाषा होती। भाषा को न तो किसी कारखाने में शुद्ध किया जा सकता है और न किसी संग्रहालय में रख कर उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है, बल्कि इसकी उन्नति-अवनति या विस्तार-संकुचन सबके लिए समाज निर्धारक होता है। किसी बहुभाषिक समाज में विविध कार्यों हेतु किसी एक भाषा के चयन के पीछे की मानसिकताओं और तर्कों से ही भाषा का भविष्य तय होता है। देश में जब घोषित हिंदी प्रदेशों से कोई भोजपुरी मातृभाषी छात्र महानगरों में जाकर तीन महीने में अंग्रेजी सिखाने वाली दुकानों में दाखिला लेता है या जब हिंदी का कोई प्रोफेसर अपनी संतानों को बचपन से ही अंग्रेजी पढ़ाने की तैयारी करता है, तो हमें भाषाओं के भविष्य का एक सहज अनुमान लगाना चाहिए। अगर अंग्रेजी इस स्थिति में है, तो इसके लिए उसको सिर्फ शेक्सपियर या वर्ड्सवर्थ के प्रति कृतज्ञ होने से काम नहीं चलेगा, बल्कि यहां उसको अपने औपनिवेशिक विस्तार से आगे माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी सूचना-क्रांति के नियंताओं के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने अंग्रेजी को पारभासिक पटल पर पहुंचाया है। अगर किसी देशी भाषा में वे सभी सुविधाएं उपलब्ध रहें, जो अंग्रेजी में हैं, तो शायद ही कोई रोजी-रोटी की मजबूरी में विदेशी भाषा सीखने के लिए संघर्ष करे।

संपर्क की सहजता और तकनीक के प्रभाव ने भाषाओं के प्रभाव और संरचना दोनों को प्रभावित किया है। भाषाओं का बाह्य विस्तार उनमें आंतरिक संकुचन की शर्त पर होता है। किसी लोक-भाषा के राजभाषा, राष्ट्रभाषा और विश्वभाषा के लुभावने जुमलों के मध्य उस भाषा में आंतरिक खोखलेपन का होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। साथ ही, किसी स्थानीय भाषा के अंतर-सामाजिक विस्तार में भाषा का रूप भी बदलता है, जैसे- हिंदी में मुंबईया हिंदी, दक्खिनी हिंदी और बिहारी हिंदी जैसे विशेषणों की व्याप्ति के साथ अंग्रेजी में भी ब्रिटिश इंग्लिश, अमेरिकन इंग्लिश और इंडियन इंग्लिश जैसे विशेषण इसकी कहानी कहते हैं। इस क्रम में भाषाओं के तकनीकी समायोजन के क्रम में भी अनेक भाषाई और लिपिगत परिवर्तन होते हैं। हिंदी और देवनागरी के उदाहरण से इसे देखें तो समझा जा सकता है कि देवनागरी का संस्कृत वाला मौलिक रूप शुरू में जब मुद्रण में आया तो अनेक परिवर्तन हुए और आगे टाइपराइटर और कंप्यूटर के युग तक आते-आते अनेक परिवर्तन ग्राह्य हो चुके हैं। हिंदी वर्णमाला ने कई स्वर और व्यंजन खो दिए हैं और इसके चलते कई स्वाभाविक ध्वनियां भाषा-प्रयोग से बाहर हो चुकी हैं। आगे भी इसमें परिवर्तन की गुंजाइश बनी रहेगी। जैसे-जैसे व्यापक संपर्क के कारण भाषा में ध्वनियों का ह्रास होगा वैसे-वैसे वर्णमाला में संकोच होता जाएगा।

इस क्रम में प्रकृति में संक्रमण से भी भाषाओं में संकुचन होता है। घटती जैव-विविधताओं से मनुष्य के जीवन में संकुचन हो रहा है, अगर मनुष्य के जीवन में संकुचन हो रहा हो, तो इसको ध्वनित करने वाली भाषाओं में अवश्यंभावी संकुचन को कोई नहीं रोक सकता है। भाषाओं के तकनीकी प्रसंगों के चलते ही एसएमएस की अलग भाषा विकसित हुई थी और यह परिवर्धित रूप में आज वाट्सएप आदि के संदेशों में दिखता है, इसमें इमोजी का भी समायोजन हुआ है, जिसमें मनुष्य की एक पूरी भावना को महज एक आभासी चित्र से दर्शाया जाता है। तात्पर्य यह कि भाषा का प्राय: बाह्य विस्तार उनमें आंतरिक संकुचन की शर्त पर होता है। इस प्रकार भाषा अपने विस्तार के साथ जातीय तत्त्वों से मुक्त होती जाती है और यहां तक आते-आते उनमें हर्ष-विषाद, प्रेम-विछोह जैसे सहज भावों को अभिव्यक्त करने की क्षमता क्षीण होती जाती है। इसके साथ ही विस्तार पाने वाली भाषाएं अपने समीपी छोटी-छोटी भाषाओं के संकुचन की भी जिम्मेदार होती हैं। इसलिए जब हम किसी भाषा के विस्तार का जश्न मना रहे होते हैं, उसी समय अनेक भाषाएं दर्द से कराह रही होती हैं, लेकिन बड़ी भाषाओं के जश्न का शोर इतना व्यापक होता है कि स्थानीय दर्द कोई सुनने वाला नहीं होता है। इस क्रम में रोजी-रोटी के आगे संबंधित भाषा के लोग भी उससे मुंह मोड़ लेते हैं और समीपी वृहत्तर भाषाओं को और मजबूत करने का काम करते हैं। सही मायनों में उसी भाषा को विकासशील कहा जाना चाहिए, जो अपनी सामाजिक व्यापकता के साथ आंतरिक संप्रेषण और बौद्धिक क्षमता में भी विस्तार कर पाए।

जब वैश्विक राजनीति में राष्ट्रवाद का एक नया दौर चल रहा हो, तो उसमें भाषा का सवाल और महत्त्वपूर्ण हो जाता है। भूमंडलीकरण का सबसे बड़ा पैरोकार अमेरिका जब अपनी किलेबंदी में लगा हो और अपेक्षाकृत आत्मगुंथित तरह का माना जाने वाला समाज चीन इस जगह को भरने की दावेदारी कर रहा हो, तो इनके मध्य में क्रमश: अंग्रेजी और चीनी के संघर्ष को भी देखना चाहिए। हालांकि एक दौर तक प्रतिरोध के बावजूद चीन में अंग्रेजी के प्रति नरमी भी देखने को मिली थी। दूसरे, खुद मंदारिन भाषा की संरचना उसके व्यापक विस्तार में बाधक है। बहरहाल, वर्तमान जिस संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, उसमें पूंजी प्रधान नियंता होती जा रही है, ऐसे में हिंदी भी इस संघर्ष में लगातार शामिल रहेगी। ऐसा इसलिए कि हिंदी का अपना व्यापक बाजार है, जो दिनों-दिन व्यापक होता जा रहा है और हिंदी की इस व्यापकता का आभास सिर्फ बॉलीवुड को नहीं, सूचना-प्रौद्योगिकी, मीडिया, प्रकाशन आदि क्षेत्रों के रहनुमाओं को भी है। अनेक भविष्यवाणियां हुई हैं कि अंग्रेजी 2050 तक विश्व-भाषा की भूमिका से बाहर हो जाएगी, ऐसे में चीनी और अपनी सर्वग्राह्यता के गुण के कारण हिंदी पर इस रिक्तता को भरने की जिम्मेदारी होगी।

पर गौरतलब है कि अंग्रेजी के वैश्विक संपर्क की भाषा बनने और लंबे समय तक सम्मान पाने में इसकी अकादमिक क्षमता की भी बड़ी भूमिका रही है, इसीलिए वैश्विक विस्तार के बावजूद उसमें खोखलेपन का भाव कम रहा है, लेकिन हिंदी को अभी यह सम्मान पाना बाकी है, अन्यथा वह विश्वभाषा बनने के बावजूद महज एक बाजारू भाषा रहेगी। भविष्य की सम्मानित भाषा बनने के लिए हिंदी को ऐसी समग्रता हासिल करनी होगी, जिसमें लोक-तत्त्व, वैज्ञानिक साहित्य, तकनीकी संवर्धन और जातीय के साथ पारभासिक संप्रेषण की क्षमताओं का सुंदर समन्वयन हो।

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