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दूसरी नजर: सरकार के भीतर सरकार

क्या इससे ज्यादा विध्वंसकारी और दर्दनाक कुछ हो सकता है? (2008 से 2014 के दौरान दिमागी बुखार से छह हजार मौतें हुई थीं।) कुछ दिन पहले गुजरात के वडोदरा शहर में सेप्टिक टैंक खाली करने के दौरान सात सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई।

Author June 23, 2019 5:32 AM
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में दिमागी बुखार से अब तक हुई एक सौ सत्रह मौतों का जिक्र प्रासंगिक है।

हर सरकार उस वक्त सकते में पड़ जाती है, जब कोई गंभीर संकट उसके समक्ष खड़ा हो जाता है। गलती किसी की हो, लेकिन जिम्मेदारी कोई नहीं लेगा। आखिरकार, मामला सरकार के प्रमुख- मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के पास आकर रुक जाता है। हालांकि गहराई से जांच करने पर पता चलेगा कि वह कोई पहली/ पहला व्यक्ति नहीं है, जिसे जिम्मेदार ठहराया जाए, बल्कि शासन की संसदीय प्रणाली अलग तरह से चलती है।

क्रूर मौतें
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में दिमागी बुखार से अब तक हुई एक सौ सत्रह मौतों का जिक्र प्रासंगिक है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रबंधन सूचना तंत्र के अनुसार जिले में सभी एक सौ तीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और एकमात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को रेटिंग में पांच में से शून्य मिला था, क्योंकि इनमें से कोई भी केंद्र मूल्यांकन के लिए आवश्यक जरूरतें (जैसे चिकित्साधिकारी, नर्स/ दाई) पूरी नहीं करता था। मुजफ्फरपुर में श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल का शिशु रोग विभाग, जहां पीड़ित बच्चों का इलाज चल रहा है, आइसीयू के लिए निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करता है। इन तथ्यों को देखते हुए किसे ये जिम्मेदारी लेनी चाहिए? कोई नहीं लेगा, इसलिए हम छोटे-से स्वादिष्ट फल लीची को इसके लिए दोषी ठहरा देंगे! डॉक्टरों ने कहा कि जिन बच्चों ने रात में खाना नहीं खाया था, उन्हीं पर लीची खाने का असर पड़ा है। और भगवान के लिए सोचिए, रात में उन्होंने खाना क्यों नहीं खाया? क्योंकि वे गरीब हैं और उन्हें खाना मिलता ही नहीं है। क्या इससे ज्यादा विध्वंसकारी और दर्दनाक कुछ हो सकता है? (2008 से 2014 के दौरान दिमागी बुखार से छह हजार मौतें हुई थीं।) कुछ दिन पहले गुजरात के वडोदरा शहर में सेप्टिक टैंक खाली करने के दौरान सात सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई। ऐसा हादसा कोई पहली बार नहीं हुआ था और दुख की बात यह है कि ऐसा आखिरी भी नहीं होगा। सेप्टिक टैंक की सफाई कोई रॉकेट विज्ञान नहीं है, इस काम के लिए मशीनें हैं और केरल में एक स्टार्ट-अप ने इसका भारतीय संस्करण (बंदीकूट) तैयार कर दिया है। जब सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए सफाई कर्मियों को उतारना जरूरी ही हो, तो उन्हें विशेष कपड़ों, मास्क और आक्सीजन सिलेंडरों की जरूरत होती है। इनमें से एक भी उपकरण ऐसा नहीं है जिसे वडोदरा जैसा नगर निगम, जो गुजरात के सबसे अमीर निगमों में से है, पैसे की वजह से खरीद न पाए। फिर भी सात गरीब लोगों को मर जाने दिया गया। (2011 से 2018 के बीच भारत के सभी राज्यों में एक सौ चौदह सफाई कर्मचारी इसी तरह मारे गए।)

हैरानी भरी लापरवाही
स्तब्ध कर देने वाले आंकड़े और भी हैं। दिल्ली में रोजाना औसतन चार व्यक्ति सड़क हादसे में मारे जाते हैं। आप सोच सकते हैं कि कल फिर चार मारे जाएंगे, फिर अगले दिन चार और इसी तरह हर दिन अकेले दिल्ली शहर में रोजाना चार लोग सड़क हादसों का शिकार होते रहेंगे। दुनिया भर में पूरे साल में जितने लोग हवाई दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं वह तो इसका एक हिस्सा भर हैं! क्यों हमने हवाई यात्रा के लिए इतने कड़े कानून बनाए हैं और सड़क यात्रा के लिए इतने कमजोर कानून? (2011 से 2017 के बीच दिल्ली में सड़क हादसों में बारह हजार सात सौ चौबीस लोग मारे गए थे।) क्या आप कभी दिल्ली में बारापुला पुल से होकर गुजरे हैं, जिस पर दिल्ली सरकार का पीडब्लूडी विभाग ‘गर्व’ करता है और जिसे बनने में कई साल लग गए? यह पुल औसत दर्जे का है, डिजाइन भी इसका औसत ही है, इस पर यात्रा भी औसत ही है, लेकिन इसके निर्माण की गुणवत्ता बहुत ही खराब है। इस पुल पर बनी सड़क के किनारों की दीवारों नजर भर डाल लें, टूटी-उखड़ी हुई मिलेंगी, इसकी ऊंचाई में कोई समानता नहीं है, स्लैब तक नहीं जुड़े हैं, बहुत ही भद्दे तरीके से इन पर प्लास्टर और पेंट कर दिया गया है, और पूरी तरह से बदसूरत। फिर भी गुणवत्ता परीक्षण में इसे पास कर दिया गया, ठेकेदार को भुगतान हो गया (संभवत ससम्मान) और 2010 में इस पुल का उद्घाटन हो गया। बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगेगा जब इसे मरम्मत के लिए बंद कर दिया जाएगा।

इरादे और अमल
इनमें से कोई भी मामला- और दूसरे मामलों के बारे में भी आप सोच सकते हैं- ऐसा नहीं था, जो नीतिगत नाकामी का शिकार हुआ हो। किसी भी सरकार की नीति स्वास्थ्य सुविधाओं और अस्पतालों का निर्माण करने और उन्हें स्टाफ तथा अन्य सुविधाओं से युक्त बनाने के लिए है, सफाईकर्मियों द्वारा सीवर साफ करने की प्रथा को खत्म करने के लिए है, यातायात नियमों को लागू करने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है, गुणवत्ता पूर्ण निर्माण कार्य के लिए है और शहरों-नगरों को सुंदर बनाने के लिए है, आदि। विधायिका या कार्यपालिका (उदाहरण के लिए मंत्री) नीति बनाते हैं और स्वाभाविक तौर पर चाहते हैं कि उस नीति पर अमल अच्छे से हो। लेकिन इरादे और अमल में भारी अंतर होता है। क्यों? हमें यह कहते हुए हिचकिचाहट होती है, लेकिन इसे कहा जाना चाहिए- सरकार के भीतर एक और सरकार होती है, और इस दूसरी वाली सरकार ने पहली वाली सरकार को उसी तरह निराश किया है जैसे आमजन को, खासतौर से भारत के मामले में तो।

मैं दो परस्पर विरोधी उदाहरणों के साथ बात को बताता हूं। नोटबंदी एक बड़ी नीतिगत गलती थी, जिन मंत्रियों ने इस नीति की कल्पना की और इसे अंजाम दिया, पहली वाली सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। दूसरी ओर, जीएसटी एक अच्छी नीति थी। अगर नोटबंदी की तरह ही यह भी परेशानी का बड़ा कारण बनी तो इसकी दोषी दूसरी वाली सरकार है। स्वच्छ भारत एक अच्छी नीति है। लेकिन खुले में शौच मुक्ति के राज्यों और गांवों से जो फर्जी आंकड़े आए, वह दूसरी वाली सरकार का किया-धरा है। उज्ज्वला अच्छी नीति है, लेकिन साल भर में तीन सिलेंडर बदलने की नाकामी दूसरी वाली सरकार की है। जब हम वोट देते हैं तो हम पहली वाली सरकार को वोट देते हैं। दूसरी वाली सरकार पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है। उसके चयन, भर्ती, प्रशिक्षण, मूल्यांकन, नियुक्ति, तैनाती या पदोन्नति के बारे में हमें कुछ नहीं कह सकते। इसे चलते रहने देना संभव नहीं। हमें दूसरी वाली सरकार को नए सिरे से तैयार करना होगा। जैसे हम पहली वाली सरकार और इसके कर्ताधर्ताओं को हर पांच साल में ईनाम या सजा देते हैं, वैसे ही हमें दूसरी सरकार वालों को हर पांच साल या और जल्द ईनाम या सजा देने का उपाय करना होगा। असल चुनौती, जिसका आज हम सामना कर रहे हैं, नीति बनाने की नहीं है। यह नीति को दक्षतापूर्ण, आर्थिक रूप से कामयाब बनाने और उत्कृष्ट तरीके से लागू करने की है।

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