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मुद्दाः मां का दूध और बच्चे की सेहत

स्तनपान के प्रति जागरूकता लाने के लिए हर साल अगस्त के प्रथम सप्ताह को पूरे विश्व में स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है।

Author August 5, 2018 5:33 AM
विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान मां के दूध के महत्त्व के बारे में बताया जाता है, जो बच्चे के विकास के साथ-साथ देश के विकास के लिए भी बेहद जरूरी है।

सुनीता मिश्रा

स्तनपान के प्रति जागरूकता लाने के लिए हर साल अगस्त के प्रथम सप्ताह को पूरे विश्व में स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य कामकाजी महिलाओं को स्तनपान संबंधी अधिकारों के प्रति जागरूक करना और कार्यालयों में बेहतर माहौल बनाना है, जिससे स्तनपान कराने वाली महिलाओं को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। स्तनपान सप्ताह में मां को अपने कार्य के साथ नवजात शिशुओं को जन्म से छह महीने तक स्तनपान कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्तन का दूध कोलेस्ट्रम संपूर्ण आहार होता है, इसे बच्चे के जन्म के तुरंत बाद देना शुरू कर देना चाहिए। सामान्यता बच्चे को छह महीने की अवस्था तक स्तनपान कराने की अनुशंसा की जाती है, लेकिन दो वर्ष तक मां का दूध मिलने से बच्चे का अच्छा विकास होता है। स्तन में दूध पैदा होना एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। मां का पहला दूध बेहद गाढ़ा, पीला, विटामिनयुक्त और बैक्टीरिया रहित होता है। इसमें पोषक तत्त्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसलिए बच्चा जब तक मां का दूध पीता है, तब तक उसके स्तन में दूध पैदा होता है और बच्चे के दूध पीना छोड़ने के बाद अपने आप दूध निकलना बंद हो जाता है।

दरअसल, पहली बार मां बनने वाली माताओं को स्तनपान की सही जानकारी न होने के कारण बच्चों में कुपोषण और संक्रमण हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अपर्याप्त स्तनपान के कारण भारत, चीन, नाइजीरिया, मैक्सिको और इंडोनेशिया में हर साल लगभग दो लाख बच्चों की मौत हो जाती है। वहीं राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में देश में कुल 93.4 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार थे। पिछले साल राज्यसभा में स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने बताया था कि देश के पच्चीस राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल मिलाकर 966 पोषण पुनर्वास केंद्र हैं। 2015-16 में लगभग 1,72,902 बच्चों को इन केंद्रों में भर्ती कराया गया था, जिसमें से केवल 92,760 बच्चों को सफलतापूर्वक बचाया जा सका। 2016 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तहत सत्रह राज्यों के आंकड़े जारी किए गए थे। इसमें बिहार पहले नंबर पर है, जहां पर करीब तैंतालीस फीसद बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। वहीं 42.8 फीसद आंकड़े के साथ मध्यप्रदेश दूसरे स्थान पर है। वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2012-13 के अनुसार जिले की शिशु मृत्यु दर पैंसठ है, जबकि प्रदेश की बासठ है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण सर्वेक्षण 2005-2006 के मुताबिक देश के करीब छियालीस फीसद बच्चे कुपोषित थे। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा लगभग छियालीस फीसद था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत में कुपोषण के कारण हर साल पांच साल से कम उम्र के लगभग दस लाख बच्चों की मौत हो जाती है। कुपोषण के मामले में भारत ब्राजील से सत्ताईस फीसद, चीन से छब्बीस फीसद और दक्षिण अफ्रीका से इक्कीस फीसद पीछे है। यहां तक कि बांग्लादेश की स्थिति भी भारत से बेहतर है। संयुक्त राष्ट्र बालकोष (यूनीसेफ) के रैपिड सर्वे ऑफ चिल्ड्रेन 2013-14 के अनुसार भारत में पांच साल से कम उम्र के 29.5 फीसद बच्चों का वजन सामान्य से काफी कम था।

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन बच्चों के कुपोषण की स्थिति को तीन मुख्य मानकों पर आंकता है, जिसमें अविकसित, कमजोर या शक्तिहीन और सामान्य से कम वजन शामिल हैं। गौरतलब है कि भारत में केवल तेईस फीसद माताएं शिशु जन्म के एक घंटे के भीतर उन्हें स्तनपान कराती हैं। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा सिर्फ 7.2 फीसद है, जो कि सभी राज्यों में शिशु स्तनपान के अनुपात में अट्ठाईसवें स्थान पर आता है।

पिछले दिनों केरल हाईकोर्ट ने एक पत्रिका के कवर पेज पर छपे नवजात को स्तनपान कराती मॉडल के खिलाफ दायर याचिका खारिज करते हुए कहा था कि अश्लीलता चित्र में नहीं, देखने वालों की आंखों में होती है। हमें नहीं लगता है कि इस तस्वीर में कुछ भी अश्लील है। इसके संदेश में पुरुषों के लिए कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। इस पत्रिका का उद्देश्य महिलाओं को स्तनपान के लिए जागरूक करना था। पर विरोध करने वालों ने तस्वीर को कामुकता भड़काने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताते हुए मामला दर्ज कराया था। पिछले साल एक ऑस्ट्रेलियाई सांसद ने अपनी दो महीने की बच्ची को संसद में स्तनपान करा कर इतिहास रचा था। उसने ऑस्ट्रेलियाई संसद में महिला सांसदों को स्तनपान की अनुमति दिलाने की लड़ाई लड़ी थी। उसके बाद पिछले साल वहां की संसद ने कानून में बदलाव कर इसकी अनुमति दी थी।

हम अक्सर टीवी और अखबारों में बच्चों को स्तनपान कराने वाले विज्ञापन देखते हैं। सरकार खुद महिलाओं को इसके लिए प्रोत्साहित करती है। मगर शहरी महिलाओं में अब भी बहुत-सी ऐसी हैं, जो अपने शारीरिक सौष्ठव के लिए बच्चों को स्तनपान कराने से बचने लगी हैं। मां का दूध पीने वाले बच्चों को बमुश्किल कोई बीमारी घेरती है। बाजार का दूध पीने वाले बच्चे अक्सर डॉक्टर के पास पहुंचे रहते हैं। मगर लोगों की मानसिकता यह बन चुकी है कि बच्चे को स्तनपान पर्दे के अंदर ही कराना चाहिए।

इस कारण माताएं छोटे बच्चों को लेकर घर से बाहर निकलने में झिझकती हैं। गौरतलब है कि भारत में हर साल लगभग एक लाख बच्चे स्तनपान न कराने की वजह से मरते हैं। वे ऐसी बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं, जिन्हें स्तनपान के जरिए रोका जा सकता है। एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि स्तनपान कराने वाली महिलाओं को कई लाभ होते हैं। उन्हें अवसाद, मोटापा और ब्रेस्ट कैंसर, गर्भाशय में कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियां का खतरा कम होता है। वहीं मां के दूध में जरूरी पोषक तत्त्व जैसे एंजाइम्स, एंटीबॉडीज, लिविंग सेल्स और हार्मोन्स पाए जाने के कारण नवजात का संपूर्ण विकास होता है। जन्म के तुरंत बाद बच्चों को स्तनपान कराने वाली महिलाओं को प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव पर नियंत्रण में मदद मिलती है और उन्हें इससे होने वाली कई समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है।

अक्सर प्रसव के बाद महिलाओं का वजन बढ़ जाता है। कई बार देखा गया है कि वे इसके कारण तनाव में रहने लगती हैं, ऐसे में स्तनपान कराना उनके लिए बेहद लाभकारी सिद्ध होता है। डॉक्टरों के अनुसार अगर मां बच्चे को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराएं, तो नवजातों को मरने से बचाया जा सकता है। बहरहाल, मां का दूध जिन बच्चों को नहीं मिल पाता है, उन्हें बचपन से ही कई बीमारियां घेर लेती हैं। उनका सही ढंग से विकास नहीं हो पाता। विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान मां के दूध के महत्त्व के बारे में बताया जाता है, जो बच्चे के विकास के साथ-साथ देश के विकास के लिए भी बेहद जरूरी है। यह तो भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी खूबसूरती है, जिसे विदेश में खुल कर अपनाया जा रहा है। ऐसे में अपने बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए पढ़ी-लिखी और कार्य करने वाली महिलाओं को भी स्तनपान कराना चाहिए।

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