ताज़ा खबर
 

दूसरी नजरः शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में नाकामी

इक्कीसवीं सदी में यह हाल है कि देश में करीब उनचास फीसद बच्चे ऐसे हैं जो एक साल से ज्यादा नहीं जी पाते।

Author October 21, 2018 3:46 AM
रोजगार नहीं है, हवा सांस लेने लायक नहीं है, पानी पीने लायक नहीं है, सड़कें (कुछ हाइवे छोड़ दिए जाएं) जानलेवा हैं, कानून-व्यवस्था की स्थिति बदतर है, और भीड़ हिंसा और भीड़ न्याय अब नई, लेकिन सामान्य बात हो गई है।

दुनिया का हर छठा व्यक्ति भारत में रहता है। भारत में रहने वालों का जीवन स्तर अच्छा है या खराब? कुछ सर्वेक्षणों के मुताबिक भारत में रह रहे ज्यादातर लोगों का कहना है कि वे खुश हैं। संतोष का यह अहसास इस तथ्य के बावजूद बना हुआ है कि रोजगार नहीं है, हवा सांस लेने लायक नहीं है, पानी पीने लायक नहीं है, सड़कें (कुछ हाइवे छोड़ दिए जाएं) जानलेवा हैं, कानून-व्यवस्था की स्थिति बदतर है, और भीड़ हिंसा और भीड़ न्याय अब नई, लेकिन सामान्य बात हो गई है। ये सारे मामले ऐसे हैं जो स्पष्ट रूप से सामने हैं और चिंता का विषय हैं। लेकिन एक-दो मसले ऐसे भी हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता, पर वे बड़ी और गंभीर चिंता का विषय होने चाहिए। ये दोनों हमारे बच्चों से जुड़े हैं। इक्कीसवीं सदी में यह हाल है कि देश में करीब उनचास फीसद बच्चे ऐसे हैं जो एक साल से ज्यादा नहीं जी पाते।

शिक्षा और स्वास्थ्य

एक बच्चे के अधिकार क्या हैं? घर, देखरेख करने वाले माता-पिता, सुरक्षा और साथी बच्चों के अलावा एक बच्चे के ऐसे अधिकार भी हैं जो सरकार को सुनिश्चित करने चाहिए। और ये हैं- संपूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार। विश्व बैंक हर साल विश्व विकास रिपोर्ट छापता है। ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स (एचसीआइ) यानी मानव सूचकांक इस सालाना रिपोर्ट का एक हिस्सा है। वर्ष 2019 की इस रिपोर्ट में एक सौ सत्तावन देशों के लिए एचसीआइ तैयार किया गया है। यह सूचकांक इस बात का पैमाना है कि जो बच्चा आज पैदा हुआ है, अठारह साल का होने तक उसे कितनी मानव पूंजी (शिक्षा, स्वास्थ्य, ज्ञान, कौशल आदि) सुलभ कराई जा सकती है। इसकी व्याख्या यह है-‘यह सूचकांक संपूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य के मानक स्तर के सापेक्ष कामगारों की अगली पीढ़ी की उत्पादकता के संदर्भ में तैयार किया गया है। एक अर्थव्यवस्था, जिसमें आज जो बच्चा पैदा होता है, अगर वह मानक स्तर की संपूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य हासिल कर सकता है तो सूचकांक पर उसका मूल्य एक होगा।’

लेकिन कोई भी देश इस पैमाने पर पूरा एक अंक हासिल नहीं कर सका, क्योंकि हर देश के पास हमेशा शिक्षा और स्वास्थ्य के मानक लक्ष्य होंगे, जिन्हें उन्हें हासिल करना होगा। एचसीआइ में सिंगापुर 0.88 के साथ सिंगापुर पहले स्थान पर रहा। मानव पूंजी वाले इस सूचकांक (एचसीआइ) में जो पहले दस देश हैं, उनका अंक 0.80 से ऊपर रहा है। इन देशों में सिंगापुर, कोरिया गणराज्य, जापान, हांगकांग, फिनलैंड, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, नीदरलैंड और कनाडा हैं। एशियाई इस पर गर्व कर सकते हैं कि पहले चार स्थानों पर एशियाई देश काबिज हैं।

इस पैमाने पर पांच बड़े देशों का स्थान ठीक स्थिति में है, लेकिन बहुत अच्छा नहीं। ब्रिटेन (एचसीआइ 0.78) पंद्रहवें स्थान पर, फ्रांस (0.76) बाइसवें, अमेरिका (0.76) चौबीसवें, रूस (0.73) चौंतीसवें और चीन (0.67) छियालिसवें नंबर पर है। एक सौ सत्तावन देशों में से छियानवे देशों का एचसीआइ अंक 0.51 से ऊपर रहा, जो यह दर्शाता है कि संपूर्ण मानव विकास की दिशा में प्रगति हुई है।

दंभ और हकीकत

जो बाकी बचे इकसठ देश हैं, जिनका एचसीआइ 0.50 या इससे नीचे है, उनमें भारत भी शामिल है। भारत का एचसीआइ 0.44 है और सूचकांक में स्थान एक सौ पंद्रहवां है। एनडीए सरकार ने बड़े ही दंभ के साथ बयान जारी करके इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। सरकार ने कहा- ‘भारत सरकार ने एचसीआइ को खारिज करने का फैसला किया है और सरकार सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण जीवन मुहैया कराने के लिए अपने महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों को जारी रखेगी।’ अगर एचसीआइ की यह रिपोर्ट मुझे व्यथित करती है, तो सरकार के बयान पर मुझे गुस्सा दिलाता है। किसी ने भी सरकार को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया कि एचसीआइ में इतने नीचे पायदान पर बने रहने के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार है। आजादी के बाद सारी सरकारों ने जिम्मेदारियों को स्वीकार किया है। मुझे सबसे ज्यादा हैरानी तो इस बात से है कि सरकार अपनी खामियों को स्वीकार करना ही नहीं चाहती।

एचसीआइ कोई हवा से निकला पैमाना या अंक नहीं है। यह छह पहलुओं पर आधारित है और हरेक पक्ष का अंक दिया जाता है। भारत के मामले में, औसत घरेलू आय के हिसाब से देखें तो पांच साल तक के बच्चे की जीवन संभाव्यता 0.96 यानी संतोषप्रद है। वयस्कों में यह दर 0.83 है, जो तर्कसंगत कही जा सकती है। भारत को जो चीज नीचे की ओर ले जाती है, वह है- ‘स्कूल जाने से पहले की उम्र’ और ‘पांच साल से नीचे के उन बच्चों का वर्ग जो विकसित नहीं हो पाए’। पहले वाले वर्ग का स्कोर 5.8 साल है, जबकि बाद वाले वर्ग का 0.62, और इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि पांच साल से कम के बच्चों का उम्र के अनुपात में कद का नहीं बढ़ पाना।

इसके कारण तलाशने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। जब ‘शिक्षा का अधिकार’ के तहत बच्चों का बड़े पैमाने पर नामांकन किया जा रहा था, तब स्कूलों और शिक्षकों की गुणवत्ता और निर्देशों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसी तरह, आंगनवाड़ी और खाद्य सुरक्षा के अधिकार में भी जरूरी दखल की जरूरत थी, लेकिन गर्भवती महिलाओं और दुग्धपान कराने वाली महिलाओं को पर्याप्त पोषण दे पाने में ये नाकाम रहे। पांच साल तक के बच्चों को भी पोषण नहीं मिल पाया। इसकी वजह यही थी कि योजनाओं को लागू करने में ढेरों खामियां रहीं और इनके लिए पर्याप्त पैसा भी खर्च नहीं किया गया।

घोर लापरवाही

एचसीआइ को ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआइ) के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जिसे ड्यूश वैल्थहंगरलाइफ और कंसर्न वर्ल्डवाइड ने मिल कर प्रकाशित किया है। भारत में सात में एक बच्चा कुपोषण का शिकार है, पांच में से दो बच्चे उम्र के हिसाब से बहुत ही के वजन के हैं, और पांच में से एक बच्चा कद के अनुपात में बहुत ही कम वजन का है। इसका कारण इन बच्चों को पोषण नहीं मिलना है। एक तरफ तो हमारे यहां गेहूं और धान भरा पड़ा है, और दूसरी ओर हम अपने बच्चों को पर्याप्त खाना तक नहीं दे पा रहे हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की सलाह पर यूपीए ने इस मामले में सरकार के दखल की आवश्यकता महसूस की और मनरेगा तथा खाद्य सुरक्षा कानून बनाया। यूपीए की इन दोनों ही पहलों की 2014 से एनडीए ने घोर लापरवाही करते हुए उपेक्षा कर दी। इसका नतीजा एचसीआइ में एकदम नीचे पहुंच जाने, जीएचआइ के एकदम ऊपर पहुंचने और मानव विकास सूचकांक में एक सौ उनतालीसवें पायदान पर आ जाने के रूप में सामने आया है। एक सौ नवासी देशों के मानव विकास सूचकांक में हम एक सौ उनतालीस वें स्थान पर हैं।

इस हकीकत को नजरदांज करते हुए सरकार ने जो प्राथमिकताएं तय कर रखी हैं, वे हैरत में डालने वाली हैं- जैसे, मंदिर बनवाना, गौरक्षा, एंटी रोमियो स्क्वाड, घर वापसी (धर्म परिवर्तन), समान नागरिक संहिता, मूर्तियां खड़ी करना, शहरों के नाम बदलना आदि। इनमें से कोई भी काम हमारे बच्चों को संपूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा नहीं देने वाला।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App