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वक्त की नब्ज: बीमार स्वास्थ्य सेवाएं

उम्मीद करते हैं कि इस बार प्रधानमंत्री नहीं भुलाएंगे उन मासूम बच्चों को, जो मुजफ्फरपुर के उस अस्पताल में मरे हैं। इस बार परिवर्तन यह देखने को मिला कि गरीब माता-पिता भी समझ गए हैं कि उनका अधिकार है सरकार से बेहतर सेवाएं मांगना।

Author June 23, 2019 5:26 AM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

बच्चों को मरते देखना हमेशा कठिन होता है। जब मरते हैं लापरवाही के कारण तो कठिनाई बढ़ जाती है सौ गुना। मुजफ्फरपुर के उस अस्पताल में जो एक सौ सत्तर बच्चे मरे हैं पिछले हफ्ते वे जिंदा होते, अगर बिहार सरकार ने अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर इतनी लापरवाही न बरती होती। जिस श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में बच्चे मरे हैं, उसमें पीने के पानी तक की सुविधा नहीं थी। ऊपर से गंदगी इतनी थी अस्पताल के गलियारों और बरामदों में कि इलाज का नाम लेना ही ऐसी जगह में पाप होगा। कैसे बचते बच्चे? भारत के बच्चों की जानें वैसे भी इतनी सस्ती हैं कि विशेषज्ञों का अनुमान है कि अपने देश में इक्कीस बच्चे हर मिनट मरते हैं। हर वर्ष एक हजार में से इकसठ बच्चे ऐसे हैं, जो अपने पांचवें जन्मदिन तक जीवित नहीं रह पाते और जो मरते हैं ऐसी बीमारियों के कारण जो लाइलाज नहीं हैं।

ऐसा नहीं कि मुजफ्फरपुर के उस अस्पताल के डॉक्टरों ने विशेष तौर पर लापरवाही दिखाई। ऐसा भी नहीं कि जिस गंदगी को हमने उस अस्पताल में देखा वह खास थी। यही हाल आपको दिखेगा सरकारी अस्पतालों में बिहार और उत्तर प्रदेश में हर जगह। मेरी आदत है कि जब भी किसी गांव या छोटे शहर में पहुंचती हूं, तो जरूर देखने जाती हूं वहां के स्कूल, अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र। अक्सर इनको देख कर शर्म आती है। उत्तर प्रदेश में मैंने ऐसे अस्पताल देखे हैं, जिनकी दीवारें और छतें गिर चुकी हैं। उनमें न मरीज होते हैं न डॉक्टर। ये वे अस्पताल हैं, जिसके निर्माण से विधायक, सरपंच और सांसदों ने पैसा बनाए हैं। जिन अस्पतालों में इलाज हो रहा होता है, वहां इतनी लापरवाही से होता है कि गरीब लोग भी निजी अस्पतालों में जाने की कोशिश करते हैं। निजी तौर पर मुझे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को इतना बेहाल देख कर तकलीफ इसलिए होती है क्योंकि चालीस वर्ष पहले जब मैंने पत्रकारिता में पहला कदम रखा, तो मैंने दिल्ली के अस्पतालों पर कई लेख लिखे थे। इमरजेंसी का दौर था। राजनीतिक चीजों पर लिखने की इजाजत नहीं थी, सो हम लोग इस किस्म के मुद्दे उठाने की कोशिश करते थे, जो सामाजिक लगते थे ऊपर से, लेकिन अंदर से राजनीतिक हुआ करते थे। इन लेखों को लिखने के लिए मैंने दिल्ली के तकरीबन हर सरकारी अस्पताल में इमरजेंसी कक्ष में कई घंटे बिताए और करीब से देखा उनका हाल। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मुजफ्फरपुर के उस अस्पताल को देख कर ऐसा लगा मुझे जैसे चालीस सालों में हमारी स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं हुआ है।

न समस्याएं बदली हैं और न ही वे अधिकारी और राजनेता, जिनको हमने जिम्मेदारी दी है इस देश के लोगों को सेहतमंद रखने की। फर्क आया है अगर तो सिर्फ यह कि अब निजी टीवी चैनल खुल गए हैं कई सारे और जब बच्चे मरने लगते हैं किसी अस्पताल में तो टीवी पत्रकार पहुंच जाते हैं राजनेताओं से पहले। दुनिया को जानकारी मिल जाती है उस अस्पताल के हाल की। बाद में शर्मिंदा होकर पहुंचते हैं आला अधिकारी और राजनेता। बड़े-बड़े वादे करने के बाद अपने काफिलों में रवाना हो जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ और होता ही रहेगा। इस बार लेकिन अगर प्रधानमंत्री चाहते हैं तो उसी व्यापक पैमाने पर परिवर्तन ला सकते हैं देश की स्वास्थ्य सेवाओं में, जिस तरह स्वच्छ भारत आंदोलन शुरू करके लाए हैं पिछले पांच वर्षों में। प्रधानमंत्री अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं में दखल नहीं देते हैं, क्योंकि यह काम मुख्यमंत्रियों के जिम्मे आता है। इस बार लेकिन मोदी दखल दे सकते हैं, इसलिए कि देश के तकरीबन सारे बड़े राज्यों में अब मुख्यमंत्री उन्हीं के हैं। अपने पहले कार्यकाल में भी ऐसा ही था, लेकिन शायद इस तरफ ध्यान ही नहीं गया प्रधानमंत्री का, क्योंकि इतना कुछ और था सुधारने के लिए। इस बार अगर सुधार लाना चाहते हैं, तो शुरुआत उनको करनी चाहिए, राजनेताओं और सरकारी अफसरों के लिए निजी अस्पतालों में इलाज करवाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा कर। जब उनके बच्चों का इलाज होने लगेगा सरकारी अस्पतालों में तो ये अस्पताल अपने आप सुधर जाएंगे।

कब तक यह हाल रहेगा कि भारत में दुनिया के सबसे बेहतरीन निजी अस्पताल भी यहां हैं और सबसे बदतर सरकारी अस्पताल भी? हमारे निजी अस्पताल अब इतने अच्छे हो गए हैं कि विदेशों से मरीज आते हैं यहां इलाज करवाने। विदेशों में भी सबसे अच्छे डॉक्टर भारत से ही निर्यात होकर जाते हैं। दूसरा सुधार जो अब लाजमी हो गया है वह यह कि जिस लाइसेंस राज ने चिकित्सा शिक्षा को जकड़ कर रखा है उसको समाप्त करना होगा। मेडिकल कॉलेज इतने थोड़े हैं अपने देश में इस लाइसेंस राज के कारण। यानी सरकार के पास क्षमता नहीं है नए मेडिकल कॉलेज खोलने की, लेकिन निजी निवेशकों को भी इस क्षेत्र में आने नहीं देते हैं वे लोग, जो इस लाइसेंस राज से लाभ उठाते हैं। जब तक इन चीजों में सुधार नहीं आएगा तब तक मरते रहेंगे हमारे बच्चे सरकारी लापरवाही के कारण। इस बार भी बिहार के ‘सुशासन बाबू’ मुख्यमंत्री उतनी जल्दी भुला देंगे, जितनी जल्दी भुला सकते हैं कि उनके शासनकाल में बिहार के इतने बच्चे मरे सरकारी लापरवाही के कारण। उम्मीद करते हैं कि इस बार प्रधानमंत्री नहीं भुलाएंगे उन मासूम बच्चों को, जो मुजफ्फरपुर के उस अस्पताल में मरे हैं। इस बार परिवर्तन यह देखने को मिला कि गरीब माता-पिता भी समझ गए हैं कि उनका अधिकार है सरकार से बेहतर सेवाएं मांगना। सो, जिस ‘नए भारत’ का निर्माण मोदी करने जा रहे हैं, उसमें पुराने भारत की बुरी आदतें नहीं रह सकती हैं।

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