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जनसत्ता तीरंदाज: सभ्यता का फूहड़पन

आज के ह्रासवाद की समस्या पुराने समय से ज्यादा जटिल है, क्योंकि इसने हमें व्यापक स्तर पर जोड़ कर कतरा-कतरा कर दिया है। इतिहास में शायद संगठित व्यवहार का यह पहला तजुर्बा है। पर साथ में यह व्यक्तिगत अलगाव का भी अनूठा काल है। हम बेहद जुड़ कर भी बेहद छिन्न-भिन्न हैं और इसका वास्तविक एहसास व्यापक है।

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अवनति का प्रथम लक्षण फूहड़पन है। इसमें व्यवहार से लेकर विचार तक, और व्यक्ति से लेकर समाज तक तमाम कर्ता और उनके कृत्य एक मुश्त और तेजी से असाधारण तरीके से साधारण होने लगते हैं। क्षय का मानक वास्तव में तीन चरणों में विभाजित है। यह फूहड़पन और साधारणता से होते हुए तुच्छता तक पहुंच कर ह्रासवाद को स्थापित करता है। एक चरण कब शुरू होकर दूसरे को सक्रिय कर देता है कहना मुश्किल है, क्योंकि इन तीनों चरणों में मूलभूत फर्क कोई नहीं है। तोला भर इधर या उधर और फूहड़ तुच्छ हो जाता है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार रॉस दोथत अपनी पुस्तक ‘द डाकेडेंट सोसाइटी : हाउ वी बीकेम द विक्टिम्स आफ आवर ओन सक्सेस’ में वर्तमान काल में संपन्न समाजों की अवनति के बारे में गहन विवेचना प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि संपन्नता से उत्पन्न ह्रास व्यक्ति में अलगाव पैदा कर देता है और वह अपने और किसी और के भी कृत्य को भावनात्मक दूरी बना कर देखने लगता है। दूसरे शब्दों में, वह सुन्न हो जाता है।

संपन्नता से पतन तक की घटनाएं इतिहास में पहले भी कई बार घटित हो चुकी हैं। पर तब और अब के बीच में टेक्नोलॉजी के प्रभाव का अंतर है। बीते जमानों में श्रेयोन्मुख समाज अपने अत्यधिक भोग और विलास की वजह से जाने और पहचाने जाते थे। शरीर का भोग और इंद्रियों का विलास इन कालों में अंतिम उपलब्धि थी। पर ऐसी स्थिति में सब कुछ शाश्वत था, वास्तविक था। हिंदुस्तान से लेकर चीन, अरब, ग्रीस या रोम, संपूर्ण विश्व की पतित व्यस्था लगभग एक जैसी ही थी। महाभोजों का आयोजन, शृंगार सम्मलेन और भव्य अखाड़ों में नर अथवा पशु की अंतिम सांस तक वाली रक्तरंजित लड़ाइयां ह्रासवाद से ग्रसित सभ्यताओं का प्रतीक थीं। उनके फूहड़पन की भव्यता पतन की फड़फड़ाती पताका थी।

विलास उन्मुख समाज का पेट कभी नहीं भरता है और न ही नीयत, और अंतत: वह अपने पर ही टूट पड़ता है। वह स्वयं-भक्षी हो जाता है। शायद वह इसको अपनी विशिष्ट उपलब्धि समझने लगता है। 1891 में छपे एक फ्रेंच उपन्यास ‘ल ब्यास’ में बेलगाम विलासिता में लिप्त एक पात्र अपने मित्र से कहता है- ‘क्या जमाना आ गया कि अब अपनी काम कामना पूरी करने के लिए सड़क से बच्चे उठाना मुश्किल हो गया है। अभिभावक सतर्क हो गए हैं, साले।’ विकृत भोग और प्रचंड व्यभिचारिता का इससे अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता है, जो राजा से प्रजा तक के मानस को ग्रसित कर चुकी हो।

पर तब सब कुछ वास्तविक था और संकट से निकलने के रास्ते भी वास्तविक थे। आज स्थिति भिन्न है। वास्तविक कुछ भी नहीं है- सब वर्चुअल है। टेक्नोलॉजी के अभूतपूर्व, अप्रत्याशित मकड़जाल ने हमें जकड़ लिया है। देखते-देखते असल, आभासी हो गया है और सिर्फ आभास तक सीमित होने की वजह से हमें अपनी वास्तविकता से अलगाव हो गया है। अगर हम देखें तो पता चलेगा कि टेक्नोलॉजी के वर्चुअल भोग में हमारी उमंग परवान चढ़ रही है।

जैसे ही कुछ वास्तव हमारे सामने आता है, हमें शारीरिक और बौद्धिक थकान आ जाती है। ट्विटर और फेसबुक पर हम भीषण युद्ध लड़ते हैं, पर अपनी बात कहने और दूसरों की सुनने के लिए गली के नुक्कड़ तक जाने से बचते रहते हैं। शायद इसीलिए आज की राजनीति सोशल मीडिया पर सिर्फ स्व- प्रदर्शन तक सीमित हो गई है। वास्तव में जो हो रहा है या नहीं हो रहा है, उससे हमें मतलब नहीं रह गया है। जो भी किया-धरा है अगर वह हमारी आभासी उपस्थिति को शांत या उद्वेलित करता है, तो उसी से हम निभ जाते हैं। हमारे साहस की परकाष्ठा आभासी घमासान है।

मानवीय भाव भी टेक्नोलॉजी की वेदी पर चढ़ गए हैं। प्रेम और शृंगार संबंधहीन गति को प्राप्त हो चुके हैं। हम प्रेम ‘टिंडर’ पर तलाशते हैं और प्रेम की अभिव्यक्ति का नजारा पोर्न साइट्स पर देख कर ठंडे पड़ जाते हैं। टेक्नोलॉजी से प्राप्त तुरंत तृप्ति की मानसिकता ने न्यूनकारी विलासिता को पोषित उस स्तर तक कर दिया है कि वास्तविक गलन ओझल वेब पर ओस की तरह झलकने लगी है।

आज के ह्रासवाद की समस्या पुराने समय से ज्यादा जटिल है, क्योंकि इसने हमें व्यापक स्तर पर जोड़ कर कतरा-कतरा कर दिया है। इतिहास में शायद संगठित व्यवहार का यह पहला तजुर्बा है। पर साथ में यह व्यक्तिगत अलगाव का भी अनूठा काल है। हम बेहद जुड़ कर भी बेहद छिन्न भिन्न हैं और इसका वास्तविक एहसास व्यापक है। पर हम कर कुछ नहीं सकते हैं। हम कोने में बैठ कर वीडियो गेम जैसी जिंदगी जीने के आदी हो चुके हैं।

आज की सफल, संपन्न सभ्यता की विलासिता और भोग टेक्नोलॉजी है। इसमें हम पूरी तरह से लिप्त हो चुके हैं और शायद इसीलिए अपनी सोच का जो उपयोग करता है, उसे हम गालीनुमा बुद्धिजीवी की संज्ञा देकर दरकिनार करते हैं। इसी तरह से वाकपटुता और स्वप्रदर्शन आभासी सभ्यता का पुरुषार्थ माना जाने लगा है और चाल-चरित ट्विटर के एक सौ चालीस करैक्टर हो गए हैं। अगर यह हमारी सभ्यता का फूहड़पन नहीं तो और क्या है?

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