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दूसरी नजरः जलन से बेहतर बराबरी

कुछ दिन पहले भाजपा के एक भोंपू नेता ने एक अखबार के संपादकीय पेज पर लिखते हुए ‘आर्थिक वृद्धि पर आला दर्जे की चर्चा’ के लिए श्री अरुण जेटली और मुझे धन्यवाद दिया।

Author August 26, 2018 4:04 AM
अगर श्री जेटली की यह बात सही मान ली जाए कि यूपीए के दस साल के कार्यकाल में कोई सुधार नहीं हुए, तो दुनिया के इतिहास में भारत एकमात्र ऐसा देश होगा जिसने बिना किसी सुधार के दो-अंक वाली वृद्धि दर हासिल कर ली

कुछ दिन पहले भाजपा के एक भोंपू नेता ने एक अखबार के संपादकीय पेज पर लिखते हुए ‘आर्थिक वृद्धि पर आला दर्जे की चर्चा’ के लिए श्री अरुण जेटली और मुझे धन्यवाद दिया। उन्होंने हिचकते हुए यह स्वीकार किया कि इस चर्चा में मैं जीत गया था, लेकिन आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अर्थव्यवस्था चौपट कर दी थी। शुक्रिया, लेकिन कोई शुक्रिया नहीं। एक दिन पहले श्री जेटली ने टिप्पणी करते हुए था कि ‘अपने शासन में यूपीए ने कोई सुधार नहीं किया।’ पहली बात तो यह कि यूपीए ने कोई भ्रम में रहते हुए राज नहीं किया, बल्कि दस साल तक देश में सफलता से शासन किया और फिर सत्ता से विदाई ली। दूसरी बात, अगर श्री जेटली की यह बात सही मान ली जाए कि यूपीए के दस साल के कार्यकाल में कोई सुधार नहीं हुए, तो दुनिया के इतिहास में भारत एकमात्र ऐसा देश होगा जिसने बिना किसी सुधार के दो-अंक वाली वृद्धि दर हासिल कर ली (दस सालों के दौरान औसत सालाना वृद्धि आठ फीसद से ज्यादा)।

सही साबित हुआ यूपीए

शायद आपमें से कुछ को यह घटनाक्रम पता नहीं होगा, जिसकी वजह से यह बहस उठी। बात ये थी कि जीडीपी के पिछले वर्षों के आंकड़े (बैक सीरीज डाटा) जारी हुए थे, ताकि 2012-13 के बाद की वृद्धि दर की उसके पिछले वर्षों से तुलना की जा सके, जबकि आधार वर्ष बदल दिया गया था, और इसके लिए नई विधि अपनाई गई थी। उसके नतीजे सारणी में देखें। नतीजे स्पष्ट हैं: यूपीए के दस साल के कार्यकाल में आजादी के बाद पहली बार दशकीय वृद्धि दर सबसे ज्यादा रही है (बाजार मूल्यों पर 8.2 फीसद और फैक्टर कॉस्ट पर 8.13 फीसद)। जब यूपीए ने सत्ता छोड़ी थी, तब 2013-14 में बाजार मूल्यों पर वृद्धि दर सुधर कर 6.39 फीसद पर आ गई थी। मोदी सरकार को पूर्व सरकार से विरासत में एक मजबूत और आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था मिली थी। 2013-14 में सकल जमा पूंजी निर्माण 31.3 फीसद रहा था। कारोबारी निर्यात 315 अरब डॉलर की नई ऊंचाई को छू चुका था। इसी तरह विदेशी मुद्रा कोष 304.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया था।

एनडीए सरकार के सत्ता में आने के चार महीने के भीतर ही कच्चे तेल और वस्तुओं की कीमतों में भारी गिरावट आई। सरकार के लिए यह अचानक से बड़ा खजाना हाथ लगने से कम नहीं था। अंदरूनी और बाहरी हालात उच्च वृद्धि के लिए पूरी तरह से अनुकूल थे, लेकिन सरकार ने इस मौके को गंवा दिया। पहले साल में कुछ उम्मीदें बनी थीं और दूसरे साल की शुरुआत भी ठीक ही लगी थी। पहली सबसे बड़ी जो भारी भूल हुई, वह आठ नवंबर, 2016 को हुई नोटबंदी थी। इसके बाद तो और बड़ी भूलें होती गर्इं, जैसे- जल्दबाजी में गलत तरीके से जीएसटी लागू करना और कर आतंकवाद। 2015-16 से 2017-18 के बीच वृद्धि दर में डेढ़ फीसद की गिरावट आ गई, जिसके बारे में नोटबंदी के ठीक बाद मैंने भविष्यवाणी कर दी थी।

असल सुधार

सुधार एक ऐसा शब्द है जिसके कई अर्थ होते हैं। सामान्य रूप से यह आर्थिक सुधारों से जुड़ा है। लेकिन अर्थव्यवस्था के बाहर भी ऐसे सुधार हैं, जो आर्थिक सुधारों जितने ही महत्त्वपूर्ण हैं, और ये अंतत: आर्थिक सुधारों को ही आगे ले जाने वाले होते हैं। दिमाग में तत्काल इसका एक उदाहरण यह आया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण, जिसकी वजह से बावन फीसद आबादी के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे खुले। 2006 में यूपीए द्वारा किया गया यह बड़ा सुधार था।

मैंने 29 नवंबर, 2015 को एक लेख लिखा था। उसमें मैंने उन वास्तविक सुधारों की एक सूची दी थी, जो 1991 में शुरू हुए आधुनिक युग में मुझे जरूरी लगे थे। मैंने ग्यारह सुधारों की एक सूची बनाई थी, जिनमें सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल भी था, जो सरकारी परियोजनाओं और आधार से जुड़े प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के लिए निजी संसाधन जुटाने से जुड़ा था। ये दोनों ही विचार यूपीए सरकारों के थे।

फिस्कल रिस्पांसबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट (वित्तीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम) एनडीए की पहली सरकार के दौरान संसद ने पास किया था। लेकिन यह अधिसूचित यूपीए के पहले कार्यकाल में हुआ। यह वास्तविक सुधारों के तहत ही आता है। इसी तरह, मूल्य वर्धित कर (वैट) यूपीए के पहले कार्यकाल में लागू किया गया था। 2005 में स्पेशल इकॉनोमिक जोन एक्ट पास होने के बाद विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना की गई। 2017 के आखिर तक दो सौ बाईस विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित किए जा चुके थे। इनसे कारोबारी निर्यात को जबर्दस्त बढ़ावा मिला, जो कि दस साल में बढ़ कर चार गुना हो गया था। हवाई अड्डों, बदरगाहों और बिजली क्षेत्र की क्षमता बढ़ाने में पीपीपी मॉडल बड़ा कारगर साबित हुआ। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम से ग्रामीण कृषि आय बढ़ी, भुखमरी से निजात मिली और ग्रामीण भारत में मांग का सृजन हुआ। मिड-डे मील योजना के तहत बड़ी संख्या में बच्चों को शामिल किया गया था।

दूसरे बड़े काम

सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और भोजन के अधिकार को संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से वैधानिक संरक्षण हासिल है। यूपीए के कार्यकाल में राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन (एनएचएम) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) से कृषि वृद्धि दर में 3.7 फीसद की औसत वृद्धि दर्ज की गई। स्वास्थ्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) दो बड़े काम रहे। इसी तरह उचित मुआवजे का अधिकार कानून से भूमि अधिग्रहण में समानता और पारदर्शिता आई। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण कानून, कंपनी कानून और लोकपाल व लोकायुक्त कानून बन चुके थे। महिला आरक्षण विधेयक, 2008 तो सत्ता का चेहरा ही बदल देता, लेकिन यह संसद में उसी स्थिति में अटका पड़ा है क्योंकि यूपीए के पास संख्याबल की कमी थी और एनडीए के पास इच्छा की। सन 2008 में हुआ नागरिक परमाणु समझौता ( द सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट) तो इतिहास में मील का पत्थर बना रहेगा।

जिन सुधारों का मैंने ऊपर जिक्र किया है, उनमें से हर सुधार बड़ा और नए रास्ते पर ले जाने वाला था। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वित्त मंत्री ने इनमें से किसी को भी स्वीकृति नहीं दी और यहां तक कि वे इस इस तथ्य को नहीं पचा पाए कि आजादी के बाद सर्वाधिक दशकीय वृद्धि दर यूपीए की ही देन रही है। बाकी बचे सात महीनों में यूपीए-एक का रिकार्ड छू पाना तो उनके बस में है नहीं, लेकिन यूपीए-दो की बराबरी के लिए वे कोशिश कर सकते हैं।

औसत वृद्धि दर फैक्टर कॉस्ट पर जीडीपी नई सीरीज  – औसत वृद्धि दर बाजार मूल्यों पर जीडीपी नई सीरीज 

एनडीए-1 (1999-2004) 5.69 – 5.68
यूपीए-1 (2004-2009) 8.87- 8.36
यूपीए-2 (2009-2014) 7.39 – 7.68
एनडीए-2 (2014-2018) उपलब्ध नहीं – 7.33

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