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शिक्षा: सतत सीखने की ललक

शिक्षा के मूल उद्देश्य और लक्ष्य शास्वत हैं, मगर शिक्षा ग्रहण करने की हर परंपरा और विधा स्वभावत: गतिशील ही होगी, क्योंकि शिक्षा ही मानव सभ्यता को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, परिवर्तन करने और स्वीकार करने के लिए पीढ़ियों को तैयार करती है।

स्कूल से बाहर समाज में जो सीखने का अवसर मिलता है और समाज सिखाता है, वह स्कूल कभी नहीं सिखा सकता है।

अनुभव जीवन का सबसे सशक्त शिक्षक होता है। यह व्यक्तियों पर ही नहीं, राष्ट्रों पर भी लागू होता है। भारत की 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति इसका प्रमाण उपस्थित करती है। इस नीति के मूल तत्त्व और उनमें निहित व्यावहारिक संभावनाएं यह स्पष्ट रूप से इंगित करती हैं कि आगे की शिक्षा की जड़ें गहराई तक भारत की ज्ञानार्जन परंपरा, संस्कृति तथा मिट्टी से जुड़ी होंगी। जीवन पर्यंत सीखने रहने की आवश्यकता; जिसे भारत पहले ही अपने दर्शन में सम्मिलित कर चुका था; अब वैश्विक स्वीकार्यता पा चुकी है।

जून 1953 में आचार्य विनोबा भावे ने लिखा था कि उन्होंने सैंतीस वर्ष पहले महाविद्यालय छोड़ दिया था और: ‘ज्ञान प्राप्त करने के लिए निकल पड़ा था! महाविद्यालय में बहुत कुछ पढ़ाया गया, मगर उसमें ज्ञान सम्मिलित नहीं था। महाविद्यालय छोड़ने के बाद मेरे लिए ज्ञान प्राप्त करने के अनगिनत दरवाजे खुल गए। आज तक मैं आदर के साथ ज्ञान प्राप्त कर रहा हूं।’

शिक्षा के मूल उद्देश्य और लक्ष्य शास्वत हैं, मगर शिक्षा ग्रहण करने की हर परंपरा और विधा स्वभावत: गतिशील ही होगी, क्योंकि शिक्षा ही मानव सभ्यता को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, परिवर्तन करने और स्वीकार करने के लिए पीढ़ियों को तैयार करती है। समय के साथ और आज के वैश्विक संदर्भ में साक्षरता और शिक्षा का अंतर भली भांति समझा गया है।

ज्ञान की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए उसके साथ विवेक और विश्लेषण क्षमता की आवश्यकता को भी विकसित करना आवश्यक माना गया है। ज्ञान और विज्ञान से मनुष्य ने बहुत से समाधान ढूंढे हैं, मगर अपने को अनेक समस्याओं में भी जकड़ लिया है। हर समस्या का उत्तर हर व्यक्ति और हर देश अपनी शिक्षा-व्यवस्था में ही ढूंढ़ता है।

बीसवीं सदी में दो भयावह विश्वयुद्धों की विभीषिका से गुजरने के बाद वैश्विक सहयोग तथा सद्भावना बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ- अब यूएन- की स्थापना की गई। मगर हिंसा, अविश्वास, युद्ध, आतंकवाद, पांथिक उन्माद घटे नहीं, बीमारी, भुखमरी, कुपोषण से मुक्ति नहीं मिली। क्यों ऐसा होता रहा? सामान्य व्यक्ति से समाधान पर चर्चा करें तो अधिकांश यही उत्तर देंगे: बच्चों को सही शिक्षा मिलनी चाहिए! अपनी शिक्षा व्यवस्था से संतुष्टि शायद ही किसी समाज को कभी मिली हो!

शैक्षिक चिंतन और सुधार एक अत्यंत आवश्यक मानवीय गतिविधि है, जिसमें विमर्श की गुणवत्ता उच्चतम स्तर की होनी चाहिए। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ गीता प्रवचन में विनोबा लिखते हैं: ‘बहुतों को ऐसा लगता है कि अध्यात्म-विद्या का जीवन से कोई संबंध नहीं है। कुछ लोगों का ऐसा भी मत है कि अगर ऐसा कोई संबंध हो भी, तो वह नहीं होना चाहिए। देह से आत्मा को अलग समझाने की शिक्षा बचपन से ही देने की योजना की जा सके, तो वह बड़े आनंद की बात होगी।

यह शिक्षा का विषय है। आजकल कुशिक्षा के फलस्वरूप बड़े बुरे संस्कार हो रहे हैं। ‘मैं केवल देहरूप हूं’- इस कल्पना में से यह शिक्षा हमें बाहर लाती ही नहीं है। सब देह के ही चोंचले चल रहे हैं। पर इसके बावजूद देह को जो स्वरूप प्राप्त होना चाहिए, या देना चाहिए, वह कहीं दिखाई नहीं देता। इस तरह इस देह की वृथा पूजा हो रही है। वर्तमान शिक्षा पद्धति से यह स्थिति बन गई है। इस तरह देह की पूजा का अभ्यास दिन-रात कराया जाता है।’

सजग और सतर्क मनुष्य, समाज और राष्ट्र अपने अनुभव से लगातार सीखते रहते हैं। भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तो तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था को ही चलते रहने दिया; लेकिन नई शिक्षा नीति में उन अनेक तत्वों को सम्मिलित किया गया है, जो गांधी और विनोबा जैसों ने भारत के लिए उपयुक्त पाए थे। ये वे लोग थे, जिन्हें भारत की मिट्टी की समझ थी, जिनके आचार-विचार किसी बाह्य चकाचौंध से प्रभावित नहीं थे, वे भारत की ज्ञानार्जन परंपरा के मूल शास्वत तत्वों से परिचित थे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति उस वैचारिक आधार को स्वीकार करती है।

विनोबा के अनुसार सही अर्थ में शिक्षा वही है जो मनुष्य को- उसकी आत्मा को- परम सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार कर सके। इसके द्वारा ही सहज ज्ञान प्राप्ति की इच्छा-शक्ति व्यक्ति के अंतर्मन में सदा स्थान बना सकेगी। परिवर्तन की गति की वर्तमान तीव्रता के कारण लगातार नया सीखने का कोई विकल्प ही नहीं बचा है। भौतिकवाद की चकाचौंध में व्यक्ति और व्यवस्था इस सीमा तक डूब चुके हैं कि भौतिकता से आगे न व्यक्ति सोच पा रहा है, न ही राष्ट्र और न ही वैश्विक समाज। मनुष्य ने अपने को एक अत्यंत संकुचित भौतिवाद की सीमाओं में जकड़ लिया है।

विनोबा ने अपने समय में ही इसको पहचाना था और स्पष्ट किया था कि शरीर, मन और आत्मा के सर्वोत्तम/ सर्वोच्च विकास के साथ ही मनुष्य के अंतर्मन की उच्च भावनाओं को जागृत करना भी आवश्यक है। वे कहते थे कि नई तालीम का अर्थ है नए समाज की रचना करने वाली तालीम! यह केवल सीखने की विद्या नहीं, जीवन दर्शन है। इसे वही प्रदान कर सकते हैं, जो अनुभव-संपन्न, समर्थ हों और व्यक्तिगत जीवन में अपने को पवित्र पाते हों! सीखने के अवसर तो हर तरफ और हर जगह बिखरे पड़े हैं। सब्जी काटने, रोटी पकाने तथा रसोईघर के हर कार्य से सीखा जा सकता है।

समस्या समाधान के अनगिनत अवसर लगातार उभरते रहते हैं। विनोबा ने कितने ही वर्ष सारे देश में स्वच्छता का पाठ पढ़ाया, आज भी उसकी आवश्यकता है, आज के शिक्षित व्यक्ति को उसमें नए समाधान खोजना जारी रखना होगा, शिक्षित व्यक्ति का सतर्क, सेवा-भावी तथा संवेदनशील होना ही चाहिए।

विनोबा ने सर्वोदय को नई ऊंचाई दी, उसे परंपरागत दर्शन ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया’ से जोड़ा, उनके भूदान, संपत्तिदान, ग्रामदान, श्रमदान तथा जीवन दान से कितने युवा जुड़े, सामजिक परिवर्तन में लगे, स्त्री शिक्षा के महत्त्व को विनोबा ने सारे देश में लोगों को समझाया। गांधीजी ने कहा था कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।

विनोबा ने उनके इस कथन को अपने जीवन में पूरी तरह सार्थक करके दिखाया। इस समय जब सारा विश्व अशांति, हिंसा, आतंकवाद, युद्ध, हथियार, अविश्वास से घिरा है, विनोबा का यह कथन कि ‘हमारी तालीम पर यह जिम्मेदारी आती है कि हमारे लड़के बचपन से ही संयमी बनें, वीर्यवान बनें, निग्रही बनें। हस्त्संयतो, पाद्संयतो, वाचासंयात ऐसा बुद्ध ने कहा था। हस्त-कौशल तो हम देखें, लेकिन सस्त-संयम भी देखें। इंद्रिय कौशल के साथ इंद्रिय-संयम की भी शक्ति होनी चाहिए। जहां संयम शक्ति नहीं है, वहां जो कौशल होता है, वह मनुष्य को बर्बाद करने के काम आता है।’

परमाणु विखंडन से असीमित उर्जा स्रोत मनुष्य ने अपने ज्ञान, कौशल तथा कर्मठता से प्राप्त किए, मगर आवश्यक विवेक और संयम की अनुपस्थिति से हिरोशिमा और नागासाकी में उसका भायानक दुरुपयोग हुआ। मनुष्य को अपने को ऐसी स्थितियों से बचने के लिए जिस दृष्टिकोण-परिवर्तन की विश्व-व्यापी आवश्यकता है, उसे सही, संपूर्ण तथा गतिशील शिक्षा-व्यवस्था से ही प्राप्त किया जा सकता है।

नई शिक्षा नीति में मानवीय मूल्यों के साथ-साथ मानवीय कर्तव्यों और अधिकारों को भी महत्त्वपूर्ण ढंग से सम्मिलित किया गया है। अपेक्षा तो यही करनी चाहिए कि क्रियान्वयन के स्तर पर देश को चरित्रवान युवा पीढ़ी मिलेगी जो देश को अनुकरणीय व्यवस्था प्रदान कर सकेगी।

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