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शिक्षा: शिक्षा की आधार-त्रयी

प्रबोधन, नायकत्व तथा सामंजस्य वे तीन तत्त्व हैं, जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों को परिभाषित करते हैं, इसलिए यही शिक्षा नीति का मूल आधार बनने चाहिए।

तस्वीर का प्रयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

यह सामान्य समझ है कि संवेदनशील आयु में अध्यापक ही बच्चे के व्यक्तिव को दिशा देते हैं। वे ही अनगढ़ बालक यानी व्यक्ति को ‘व्यक्तित्व’ में बदल देते हैं। ऐसा तभी संभव होगा जब अध्यापक में वे सभी ज्ञान, गुण और कौशल विद्यमान हों, जो वह बच्चे में प्रस्फुटित होते देखना चाहता है। उसे बच्चे के मनोविज्ञान, उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, परंपरा तथा पारिवारिक स्थिति से पूर्णरूपेण परिचित होना होगा। माना जाता है कि जन्म के समय बच्चा अनेक ईश्वरीय उपहार लेकर आता है, जिनमें कल्पना की उड़ान, विचारों की शक्ति, जिज्ञासा की प्रवृत्ति तथा सर्जनात्मकता का कौशल सम्मिलित होता है। भारत की प्राचीन संस्कृति में प्रारंभ से ही यह भी स्पष्ट कर दिया जाता रहा है कि बच्चे के जन्म लेते ही तीन ऋण भी उसके साथ जुड़ जाते हैं: पितृ ऋण, ऋषि ऋण, और दैव ऋण! इसका तात्पर्य परिवार तथा समाज के प्रति, ज्ञान देने वालों के प्रति तथा प्रकृति के प्रति कर्तव्य भाव को प्रारंभ से ही जागृत करना था। इसी सोच से भारत में कर्तव्यबोधक समाज की संरचना आगे बढ़ी।

शिक्षा बच्चों को यह तैयारी कराती है कि जो वरदान लेकर प्रत्येक व्यक्ति पृथ्वी पर आता है, उनका उपयोग उसे ऋण चुकाने में कैसे करना है! इन दोनों के समन्वय- यानी ईश्वरीय वरदानों का ऋण उतारने में उपयोग- से सामान्यतया जीवन का दर्शन, उद्देश्य, लक्ष्य, कार्य-पद्धति, उपलब्धियां निर्धारित होती हैं और जीवन यात्रा आगे बढ़ती है। हर सभ्यता की अपनी विशिष्ट ज्ञान परंपरा विकसित होती है, आगे बढ़ती और वही अपनी गतिशीलता से लोगों और समाज को गतिशील बनाए रखती है। वही जीवन को समझने और संतोषप्रद ढंग से जीने के लिए प्रेरित करती रहती है। इसके लिए विद्या, गुरु, शिक्षा, अध्यापक, परिवार, समाज को अपने अपने निर्धारित उत्तरदायित्व निभाने पड़ते हैं। प्राचीन भारत में ज्ञानार्जन परंपरा को अग्रेषित करने वाले साधक और चिंतक, मनुष्य और प्रकृति की संवेदनशील पारस्परिकता के महत्त्व को समझने के लिए घोर साधना और मनन-चिंतन करते थे। चूंकि अपनी आवश्यकताओं का निर्धारण करना और उसकी पूर्ति के लिए प्रकृति के संसाधनों का उचित उपयोग करना मनुष्य का ही कर्तव्य बनता था, इसलिए यह उसी का उत्तरदायित्व था कि उसकी पीढ़ियां दैव ऋण- मानव और प्रकृति के संबंध- के महत्त्व को समझें और तदनुसार अपने आचरण का निर्धारण करें। इसका अर्थ प्रकृति के प्रति आदर तथा सम्मान का भाव जगाना था। विश्व की कुछ सभ्यताओं में दर्शन अलग था: प्रकृति के सारे संसाधनों को मनुष्य के सुख-भोग के लिए निर्मित किया गया है, इसलिए इसका भरपूर उपभोग करो!

इस प्रकार सभ्यताओं के विकास में दो प्रवृत्तियां पैदा हुर्इं: एक तरफ अपरिग्रह, दूसरी ओर अपरिमित उपभोग और संचयन! परिणाम स्वरूप विश्व आज जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग जैसी समयाओं से जूझ रहा है। ऐसा तब हो रहा है जब मनुष्य की ज्ञान विज्ञान और प्रकृति के रहस्यों की समझ में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। शिक्षा का अभूतपूर्व प्रसार हुआ है, मगर वह मनुष्य की प्रकृति के साथ पारस्परिकता की संवेदनशील समझ उत्पन्न नहीं कर सकी है। सेंसेक्स और निफ्टी बढ़ते हैं, कितने ही चेहरों पर चमक आ जाती है। मगर ऐसे भी करोड़ों लोग हैं, जो भूखे सोते हैं। वे अंतिम पंक्ति में खड़े लोग हैं, जो पीने के पानी के लिए मोहताज हैं। आज वैज्ञानिक यह गणना करने लगे हैं कि अगर सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो यह पृथ्वी कितने वर्ष और जीवित रहेगी! वैश्वीकरण का युग सभ्यताओं के सम्मिश्रण का समय है, चमक-दमक से प्रभावित होने का समय है। इसलिए भारत में भी पारिवारिक संबंधों, अपनी संस्कृति और अपरिग्रह को भूलने वाले लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं। इस आत्मघाती प्रवाह के ठहराव और दिशा परिवर्तन की संभावना का स्रोत केवल एक है: अध्यापक! इस परिदृश्य के गहन विश्लेषण के आधार पर टिकी शिक्षा नीति ही कारगर हो सकेगी?

मनुष्य अधिकतर समस्याएं स्वयं पैदा करता है। वह समाधान भी निकाल लेता है। दैव ऋण और पितृ ऋण से जुड़े कार्य-क्षेत्रों में जो कुछ किया जा सकता है वह ऋषि ऋण यानी ज्ञान-प्राप्त कर और उसमें संवर्धन कर मिली क्षमता से निर्धारित होता है। इसका सीधा प्रयोजन यह है कि शिक्षा का संचालन हर स्तर पर कर्मठ, सक्षम, संवेदनशील और अनुकरणीय व्यक्तित्व वाले व्यक्ति ही करें। वर्तमान व्यवस्था में अधिकार और निर्देशन नौकरशाही के पास है, सारी विफलताओं का दारोमदार अध्यापक का ही मान लिया जाता है। यह तब संभव था जब व्यवस्था गुरुकुल जैसी प्रणाली में संचालित होती थी। कुलगुरु किसी दबाव में कार्य नहीं करता था। अगर कोई दबाव था तो वह था नैतिकता के दायरे में रह कर सतत अध्ययनशील बने रहना और नए ज्ञान की खोज में आलस न करना, ज्ञान के सर्जन और वितरण में कोई कोताही न करना! गुरु परंपरा में किसी भी प्रकार के आदेशों का पालन नहीं करना पड़ता था। संसाधनों की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। आज भी ऐसे अध्यापक हैं, जो सहृदय, संवेदनशील, कर्मठ और सत्य-शोधक माने जाते हैं। मगर सरकारी तंत्र और नौकरशाही में इन गुणों का महत्त्व शायद कभी अपवाद स्वरूप ही समर्थन और प्रोत्साहन पाता हो! ऐसे अध्यापक अनुकरणीय माने जाने चाहिए, ऐसों को ढूंढ़ा जाना चाहिए, उन्हें हर स्तर पर नेतृत्व संभालने के लिए तैयार किया जाना चाहिए।

शिक्षा दर्शन के अध्ययन और आध्यात्मिकता के प्रबोधन के क्षेत्र में जीवन लगाने वाले आचार्य किरीट जोशी ने एक वैकल्पिक संकल्पना प्रस्तुत की थी। शिक्षक जिन गुणों को विद्यार्थी में विकसित करना चाहता है, पहले वह उन्हें स्वयं समझे, वे उसके अपने व्यक्तित्व में कितने उभरे हैं, यह जाने और उसके बाद विद्यार्थी को उन्हें खोजने और ग्रहण करने में सहायक बने। ये तीन तत्व हैं: ‘इल्युमिनेशन’, ‘हीरोइज्म’ और ‘हारमनी’। इन्हें आधार-त्रय माना जा सकता है। इनमें से पहले- प्रदीप्ति/ प्रबोधन; यानी ‘इल्यूमिनेशन’- के अंतर्गत जीवन के लक्ष्य, महत्त्व और मूल्यों की समझ का विकसित होना, प्रेरणास्पद कार्यों की ओर अग्रसर होना, जीवन दर्शन का विस्तार और उसकी सार्थकता की पहचान, सर्जनात्मकता और सेवा के आनंद की अनुभूति, जैसे महत्त्वपूर्ण अवयव सम्मिलित होते हैं। जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता है, अतिरिक्त प्रबोधन बुद्धि तत्त्व को प्रज्वलित करता है। इसकी आभा में जीवन के हर क्षेत्र में वैचारिकता और सर्जनात्मकता के नए द्वार खुलते जाते हैं, सेवा और सद्भाव अतिरिक्त आनंद प्रदायक बन जाते हैं। इसके साथ जब दूसरा तत्त्व ‘हीरोइज्म’- ऊर्जावान वीरोचित व्यक्तित्व- जुड़ जाता है तब लक्ष्य प्राप्ति में विश्वास बढ़ता जाता है। उर्जावान व्यक्ति जब बुद्धितत्त्व से निर्देशित होता है, सेवा के महत्त्व से प्रेरणा लेता है, सम्यक कर्तव्य निर्वाह में संलग्न रहना चाहता है, तभी वह पूरी लगन के साथ लक्ष्य को संपूर्णता में प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति अधिक से अधिक कार्य करना चाहता है, उसे इसमें भरपूर आनंद और संतुष्टि प्राप्त होती है। ऐसा वातावरण बन जाता है, जिसकी संकल्पना शिक्षा शास्त्र से संबंधित हर पुस्तक और प्रतिवेदन में की जाती रही है: बच्चे की संपूर्ण प्रतिभा विकास के लिए उन्हें आनंददायक, संवेदनशील तथा अपनत्व भरा वातावरण मिलना ही चाहिए। प्रबोधित और उर्जावान व्यक्ति ही समाज और प्रकृति के साथ तीसरा तत्त्व- समन्वय- ‘हारमनी’- स्थापित करने में सक्षम हो जाता है। प्रबुद्ध उर्जावान व्यक्ति समन्वय की प्रक्रिया में भी अपने ज्ञान तथा कौशल के स्तर को लगातार बढ़ाता रहता है और यह बौद्धिक प्रखरता उसकी लगनशीलता, त्याग, कर्मठता, तथा परिष्करण से संभव होती है। प्रबोधन, नायकत्व तथा सामंजस्य वे तीन तत्त्व हैं, जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों को परिभाषित करते हैं, इसलिए यही शिक्षा नीति का मूल आधार बनने चाहिए।

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