Editorial: Writer and reader - Jansatta
ताज़ा खबर
 

साहित्य: लेखक और पाठक

लेखक और पाठक के संबंधों पर विचार किया जाता है, तो संदर्भ आमतौर पर साहित्य रहता है। ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं के संदर्भ में ऐसी चर्चा नहीं या कम ही हुई है। इसका कारण शायद यह है कि साहित्य में इतर विषयों के लोग भी रुचि लेते हैं। साहित्य हृदय को भी स्पर्श करता है, केवल […]

Author February 22, 2015 2:42 PM

लेखक और पाठक के संबंधों पर विचार किया जाता है, तो संदर्भ आमतौर पर साहित्य रहता है। ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं के संदर्भ में ऐसी चर्चा नहीं या कम ही हुई है। इसका कारण शायद यह है कि साहित्य में इतर विषयों के लोग भी रुचि लेते हैं। साहित्य हृदय को भी स्पर्श करता है, केवल विचारों को उद्बुद्ध करके नहीं रह जाता।

मिल्टन ने लिखा है कि यश-लिप्सा बड़े व्यक्तियों की सबसे बड़ी कमजोरी होती है। लेखकों में यह कमजोरी एक ओर पुरस्कार की लालसा में दिखाई पड़ती है, तो दूसरी ओर पाठक-वर्ग पाने की कामना के रूप में। विशाल पाठक-समुदाय उसे गर्व की अनुभूति देता है।

प्रश्न यह उठता है कि क्या लेखक की रचना के केंद्र में भी पाठक रहता है? रचनात्मक लेखन में भी हम कहीं-कहीं पाठक को रचना केंद्र में देखते हैं। सम्मेलनी कवि जो कविता को लतीफेबाजी के स्तर पर ले जाता है, वह पाठकों (श्रोताओं) की वाहवाही बटोरने के लिए ही तो। इसीलिए ऐसे लेखन को रचनात्मक नहीं माना जाता। रचनात्मक लेखन में जहां कोई निर्दिष्ट प्रयोजन एक प्रकार से नियामक होता है, वहां केंद्र में पाठक को ही समझना चाहिए। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि लेखक के सामने पाठक की सत्ता किसी व्यक्ति-विशेष के रूप में नहीं, एक रुचि-विशेष के रूप में है।

रचनाकार जब इन बातों के प्रति सजग रह कर उस काट की रचना करने की जुगत में रहता है, तब वह ‘जेनुइन’ रचना-कर्म के प्रकृत पथ से हट जाता है। वहां रचना की कोई स्वतंत्र हैसियत नहीं रह जाती है। वह उस प्रयोजन का साधन होकर दोयम दर्जे की चीज होकर रह जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि मैं रचना में प्रयोजन का निषेध कर रहा हूं। प्रयोजन तो प्रकृति-काव्य का भी होता है और प्रेम-गीत का भी। प्रकृति-काव्य का प्रयोजन प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण होता है। प्रेम-गीत में प्रेमी या प्रेयसी के सौंदर्य का चित्रण प्रयोजनभूत रह सकता है।

इसी तरह, रचना का कोई सामाजिक प्रयोजन भी हो सकता है। विश्व की महान कृतियों में हमें सामाजिक प्रयोजन मिलेंगे। इसलिए रचना में प्रयोजन का निषेध नहीं किया जा सकता। स्थिति चिंतनीय तब होती है, जब प्रयोजन रचना पर हावी होकर उसकी नकेल थाम लेता है। तब रचना साहित्य की नहीं, प्रयोजन की भाषा बोलने लगती है। कविता में राजनीति बेशक रहे, पर आवश्यक यह है कि भाषा वह कविता की बोले। कुंवर नारायण जब यह बात कहते हैं, तब वे कविता पर राजनीति के हावी होने का ही निषेध करते हैं, उसके उसमें रहने का नहीं।

रचना में प्रयोजन निबद्धता मोटे तौर पर दो प्रकार की मिलती है। एक तो वह, जिसमें प्रयोजन मुखर होता है, लेकिन रचना का नियमन सूत्र लेखक अपने हाथ में रखता है। दूसरा रूप वह होता है जिसमें पाठक रचना पर इतना अधिक हावी हो जाता है कि रचनाकार की हैसियत कमजोर पड़ जाती है। इस तरह की रचनाओं के कई रूप मिलते हैं। एक रूप में पाठक की प्रशंसा से प्रलोभित होकर वह उनकी रुचि-कुरुचि को उत्तेजित करने के लिए अपने लेखन में मनमानी जोड़-तोड़ करने में भी संकोच नहीं करता है। इससे पाठकों से तो उसका नाता जुड़ जाता है, लेकिन रचनाशीलता से नाता कट जाता है। इन रचनाओं में बेतुके प्रसंगों का आतंक छाया रहता है; पात्र इकहरे रहते हैं और रचनाएं सपाट होकर रह जाती हैं। एक अन्य रूप तात्कालिक प्रसंगों से प्रेरित रचनाओं का होता है। इनकी यह उपादेयता तो होती है कि जिस प्रसंग-विशेष के आकर्षण में ये लिखी जाती हैं, उसकी चेतना पाठकों में जगाती हैं; भावनाओं में ज्वार भी उठाती हैं, लेकिन ये होती अल्पजीवी ही हैं। ये दरअसल प्रसंग-प्रेरित नहीं, प्रसंग-पीड़ित और प्रसंगबद्ध होती हैं और उस बद्धता में ही निश्शेष हो जाती हैं। प्रसंग की तात्कालिकता बीत जाने पर इनका प्रभाव भी रीत जाता है। प्रयोजन की सीमा ही रचना की सीमा हो जाती है। इनमें अपवाद भी मिल जाते हैं, लेकिन तब उनके महत्त्व के कारण कुछ और होते हैं।

स्पष्ट है कि रचना के केंद्र में पाठक का रहना रचना के हित में नहीं है। उससे रचनाकार अपने प्रयोजन का भी ठीक से निर्वाह नहीं कर पाएगा। अभिनेता अपना अभिनय प्रेक्षकों के लिए ही करता है, लेकिन उनकी ओर मुखातिब होकर और उन पर उसका प्रभाव जांचते हुए नहीं। अगर वह इस फेर में पड़ेगा तो अभिनय कर ही नहीं पाएगा। अभिनय करते हुए वह संबंधित चरित्र के भावों को ही भरसक जीने की चेष्टा करता है, तभी प्रभावशाली अभिनय कर पाता है। यही बात लेखक और पाठक के संबंधों के विषय में भी समझनी चाहिए। लेखक रचना को प्रभावशाली बना कर ही पाठकों को प्रभावित कर पाता है। पाठकों को प्रभावित करने के लिए वह लिखेगा तो रचना कमजोर पड़ जाएगी।

एक नया रचनाकार तात्कालिक महत्त्व के प्रसंगों पर लिखने से प्रारंभ कर सकता है और उस रूप में कुछ ख्याति भी पा सकता है, लेकिन उसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपने रचनाकार-व्यक्तित्व का विकास भी करे। इसके लिए उसे अपने प्रारंभिक रचना-पैटर्न के दायरे से बाहर आना होगा। जो पाठक उसके प्रारंभिक पैटर्न के प्रशंसक और आदी होंगे, उन्हें उसका नया रूप एकाएक रास नहीं आएगा। नई रचनाएं उन्हें दुरूह जान पड़ेंगी। उधर लेखक अपने प्रशंसक-पाठक खोना नहीं चाहेगा। मुक्तिबोध का मत है कि यह द्वंद्व ही लेखक का बड़ा आत्मसंघर्ष होता है। उसे अपने बद्ध पैटर्न से बाहर आना ही होगा, अन्यथा वह अपना विकास नहीं कर सकेगा। उसका नया रचना-रूप दुरूह तो हो सकता है, लेकिन उसे समझे बिना पाठक अपने समय की रचनाशीलता के साथ नहीं चल पाएगा।

एक अच्छी नई रचना एक भूमिका यह भी निभाती है कि वह पाठकों की रुचि का संस्कार करती है। आमतौर पर पाठकों की रुचि विगत युग के रचना-स्वभाव की अभ्यस्त होती है। उसे नए युग के रचना-स्वभाव की दिशा में ले जाने का कार्य नई रचना को ही करना होता है। अगर वह पाठकों की कुंठित या अभ्यस्त रुचि की ही बंधक बनी रही, तो यह भूमिका कौन निभाएगा?
अगर कोई रचना किसी पाठक या पाठकों को समझ में नहीं आती है, इसलिए वह अनर्गल है, ऐसी धारणा बना लेना उचित नहीं होगा। कितने ही प्रसिद्ध चित्रकारों के चित्र हमें समझ नहीं आते हैं, लेकिन हम उन पर सम्मति व्यक्त करने से बचते हैं। शास्त्रीय संगीत भी आखिर कितने लोग समझ पाते हैं? फिर, हम साहित्य की बाबत ही तत्काल फैसला करना क्यों चाहते हैं? इसका अर्थ यह नहीं है कि अनर्गल पुस्तकें नहीं लिखी जा रही हैं। लेकिन उचित होगा कि पाठक इसका फैसला प्रबुद्ध लोगों को करने दें। समय खुद बड़ा निर्णायक होता है।

साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित और पाठकों में भी लोकप्रिय लेखकों के विषय में अगर ऐसी शंका होती है (कि वे पाठकों को ध्यान में रख कर लिखते हैं) तो उसे भी निर्मूल समझना चाहिए। इस श्रेणी के समकालीन लेखकों में मन्नू भंडारी का नाम उल्लेखनीय है। अपनी रचना-प्रक्रिया पर विचार करते हुए उन्होंने अपनी रचना और पाठकों के संबंध के विषय में जो कुछ लिखा है, वह यहां द्रष्टव्य है-

‘मेरे अपने लिए पाठक की बहुत अहमियत है। वह पाठक कौन है, कैसा है, कहां है, इसका कोई अहसास रचना करते समय मुझे नहीं होता, न ही अदृश्य पाठक मेरे लेखन की दिशा निर्धारित करता है- बिल्कुल नहीं। उसकी भूमिका तो रचना छपने के बाद शुरू होती है।’

मोहनकृष्ण बोहरा

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App