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पुस्तकायन: घेरे में स्त्री

नीलाप्रसाद जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: बर्बर दामिनी बलात्कार कांड और उस घटना के प्रतिक्रियास्वरूप आम जनमानस में उपजे आक्रोश के परिप्रेक्ष्य में मूल्यमंथन की प्रक्रिया को बल देती अशोक गुप्ता की पुस्तक प्रतिघात एक जरूरी हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है। एक समसामयिक विषय, उस पर पांच लेख, पांच कहानियां और फिर विशेषज्ञों द्वारा […]

Author September 30, 2014 11:07 AM

नीलाप्रसाद

जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: बर्बर दामिनी बलात्कार कांड और उस घटना के प्रतिक्रियास्वरूप आम जनमानस में उपजे आक्रोश के परिप्रेक्ष्य में मूल्यमंथन की प्रक्रिया को बल देती अशोक गुप्ता की पुस्तक प्रतिघात एक जरूरी हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है। एक समसामयिक विषय, उस पर पांच लेख, पांच कहानियां और फिर विशेषज्ञों द्वारा उस घटना के कानूनी पहलुओं की शिनाख्त करते विशिष्ट लेख! पाठकों को ठोस हकीकत से वैचारिक टकराहट की तैयारी कराना, फिर कहानियों की दुनिया में उसी हकीकत का सामना कर रहे पात्रों से भेंट-मुलाकात कराते घुमा लाने के बाद मुद्दे के कानूनी यथार्थ के सामने पटक देना।

दामिनी कांड अब भी एक ज्वलंत मुद्दा है, भले दिल्ली की त्वरित अदालत ने एक नाबालिग को छोड़ कर सभी बलात्कारियों को फांसी की सजा सुना दी है। देश के किसी न किसी हिस्से में कोई न कोई दामिनी हर बाईस मिनट में बलात्कार का शिकार हो रही है। उसमें भले इस दामिनी-सी दृढ़ता या साहस न हो, न ही उसे उमड़ते जनसैलाब का समर्थन प्राप्त हो। वह भी अन्याय-अत्याचार की उसी जमीन पर खड़ी, उन्हीं सामाजिक-कानूनी समस्याओं से रूबरू है, जिनसे किताब परिचित कराने की कोशिश करती है।

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‘यौन अपराधों के परोक्ष कारक’ से शुरू करके ‘यह तो बस पहली दस्तक है’ तक में लेखक जोर देकर कहते नजर आते हैं कि ‘यौन शुचिता का बलात क्षय अस्मिता का क्षय नहीं है।… इस प्रसंग को बड़े फलक पर देखो।’ वे राजनीतिक दलों के अपराधी चरित्र, न्याय करने वालों की मर्दवादी निगाह और अपराधियों और सत्ता के गठबंधन पर भी सवाल उठाते हैं। लेखक की राय में ‘अगर समाज स्त्री को यौन शुचिता के आरोपित मूल्य से मुक्त कर दे, विवाह संस्था में प्रेम और सामंजस्य के लिए जगह बने तो समाज में यौन अपराध कम हो सकते हैं।’

वे उस पुरुष सत्तात्मक सोच का अपने लेखों और कहानियों के माध्यम से विरोध करते हैं, जो स्त्री को भोग की वस्तु मानता है और बलात्कृत को अस्पृश्य, त्याज्य, जूठी, धिक्कार योग्य! यौन जबर्दस्ती की शिकार किसी लड़की की जिंदगी तिरस्कृत जिंदगी नहीं- इस बात पर जोर देती इस किताब में भारतीय विवाह पद्धति में स्त्री-पुरुष संबंधों की स्वाभाविक जड़ता और गैर-बराबरी से उपजी कुंठा और यौनिक अतृप्ति के कारणों की पड़ताल बहुत तार्किक ढंग से की गई है। इन लेखों के निष्कर्षों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भले जरूरी लगे, इसमें उठाए गए मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है।
लेखों के बाद इस किताब में पांच कहानियां संकलित हैं। कहानियों की नायिकाएं जुझारू, अपनी देह का इच्छा के विरुद्ध इस्तेमाल किए जाने पर भी निडर होकर परिस्थितियों से लड़ने और उसे अपने पक्ष में गढ़ने की क्षमता रखने वाली हैं। वे सबल, दृढ़, भविष्य के प्रति आशावान और उदाहरण बन सकने लायक चरित्र हैं। काश, भारतीय समाज ऐसे स्त्री-पुरुष चरित्रों से भरा पड़ा होता और स्त्री की यौन शुचिता उसके भविष्य, उसकी जिंदगी की उड़ान में आड़े न आती, जैसे आती रही है। काश कि घटनाएं ऐसे ही अपने पक्ष में मोड़ी जा सकतीं, जैसे कहानी में दर्शाई गई हैं। ऐसा क्यों लगता है कि इस संग्रह की कहानियों के चरित्रों के जीवन में द्वंद्व उन्हें उस तरह नहीं लीलता, जैसे आम जीवन में सबों को लील लेता है। वे योजना बना कर चलने वाले चरित्र हैं- अगर ठान लेते हैं तो विद्रोह कर बैठते हैं, परिस्थितियों को अपने अनुसार ढाल लेते हैं, कहें तो घर-परिवार-रिश्तेदारों-प्रेमी तक को अपने पक्ष में कर लेते हैं और फिर उन्हें उनके विद्रोह का मनचाहा परिणाम भी मिल जाता है।

‘नीले समुंदर का पाठ’ कहानी में विवाह से पहले मंगेतर से मिलने गई नायिका का बलात्कार होता है, तो विवाह के बाद यह पता चलने पर कि वह गर्भवती हो गई है, पति उसे उस बच्चे को जन्म देने देता है। बच्चे को भी इस सच का पता है और बिना किसी दुविधा या पेच के वह परिवार हंसी-खुशी जी रहा है। इसी तरह ‘तिलचट््टे का मुखौटा’ कहानी में प्रेमी को पाने की आशा मृतप्राय होती देख नायिका अपने साथ बलात्कार का ढोंग करती है और समाज में हुई बदनामी के मद्देनजर पहले से अंतर्जातीय विवाह का पूरे दम से विरोध कर रहे पिता, प्रेमी के पिता के घर आने और नायिका का हाथ मांगने पर इनकार नहीं कर पाते।

‘एक बूंद सहसा उछली’ कहानी में तो मांग कर ली गई तीन दिनों की स्वतंत्रता नायिका के जीवन भर की स्वतंत्रता के द्वार खोल देती है। आश्चर्य कि स्वतंत्रता के तीसरे दिन जब वह निर्वस्त्र पार्क में खड़ी देखी जाती है, तब भी सास को अपने पक्ष में करने में सफल हो जाती है। ऐसे उदाहरण कई हैं।
पर वास्तविकता का सामना करती एक कहानी है ‘थैंक्यू कावेरी’, जहां बलात्कार की शिकार स्त्रियां भले खुद को अपवित्र मानने और जीने का हक छोड़ देने से इनकार करती हैं, वे आखिरकार समाज के वर्तमान ढांचे और पुरुषसत्तात्मक सोच के दायरे को तोड़ने में असमर्थ हारने या मरने को ही विवश होती हैं- एक अपवाद को छोड़ कर!

भले ये अपवाद चरित्रों की कहानियां हैं, इन्हें प्रतीकात्मक कहानियां मानना चाहिए, जो भविष्य के मीठे स्वप्न दिखाती हैं- वह दिन, जब स्त्री उठ खड़ी होगी, अपनी वर्जनाएं त्याग कर, दृढ़ता से यौनिक अत्याचार की शिकार होने पर भी समाज में जीने का हक पूरे दमखम से छीन लेगी और अपनी निजता, आत्मसम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करेगी। वहां पुरुष सहयोगी की भूमिका में होगा और उसे आगे आने, यौन अशुचिता के भ्रमजाल को तोड़ने और अपनी अस्मिता के साथ जीने में सहायक भूमिका निभाएगा।

पुस्तक के तीसरे और आखिरी खंड को घोषित तौर पर विशिष्ट खंड माना गया है। इसमें कमलेश जैन ‘दामिनी कांड के परोक्ष संदर्भ’ शीर्षक निबंध में कहती हैं: ‘कुल मिला कर भारतीय संस्कृति, धर्म, समाज और राजनीतिक इच्छाशक्ति ने उसे कुछ नहीं दिया, सिर्फ छीना है- बल से, छल से, तिरस्कार से, अपमान से।’ इन बयानों से भावनात्मक रूप से एकाकार हो ही रही थी कि लेख एक प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका के विवादित संपादक के चरित्र, लेखन और आत्मकथ्य पर निशाना साधने में कई पृष्ठ लगाता मूल मुद्दे को भुला बैठा-सा लगा। पर कमलेश जैन फिर से मूल मुद्दे पर लौटीं और कानूनी जानकारियों में इजाफा किया। फिर उन्होंने कानूनी मसलों से इतर राह अख्तियार कर ली और इस पुस्तक में संकलित कहानियों पर अपनी टिप्पणियां और मंतव्य दिए।

इसके बाद आखिरी लेख अरविंद जैन का (भले दो दशक पहले लिखा) है- ‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा’। लेख में दी गई जानकारियां ज्ञान बढ़ाती, चौंकाती हैं तो रुलाती भी! रुलाती इसलिए कि महिलाओं को उसी भारतीय समाज का हिस्सा बने रह कर जीने की मजबूरी है, जिसमें यौन हिंसा के अपराधी को बचाने की ढेर तरकीबें कानून ने निकाल रखी हैं। परिणामस्वरूप पीड़िता को न्याय मिलने की आशा नगण्य है।

इस लेख में उद्धृत सर्वोच्च न्यायालय के तमाम फैसलों की लेखक द्वारा संवेदनशील व्याख्या पुरुष न्यायाधीशों की मानसिकता, पुरुष मानसिकता की शिकार न्याय की भाषा और मर्दवादी न्यायाधीशों के स्त्री-विरोधी व्यक्तिगत पूर्वग्रह के मद्देनजर उनके अपमानित करने वाले विद्वेषपूर्ण और अन्यायपूर्ण फैसलों को इस तरह उजागर करते हैं कि लेखक के प्रति आदर जिस अनुपात में बढ़ता है उसी अनुपात में भारतीय न्याय व्यवस्था से हताशा! यह लेख इस किताब का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

प्रतिघात: अशोक गुप्ता; नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 295 रुपए।

 

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