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पुस्तकायन: उम्मीद का स्वर

सुखप्रीत कौर जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: लाल सिंह दिल पंजाबी के चर्चित कवियों में हैं। उनकी चर्चा हिंदी में बहुत कम हुई है। हिंदी में पंजाबी के दलित कवियों की चर्चा यों भी बहुत कम हुई है। इस खाली जगह को भरने का प्रयास किया है सत्यपाल सहगल ने। उन्होंने लाल सिंह दिल की प्रतिनिधि […]

Author October 8, 2014 10:21 AM

सुखप्रीत कौर

जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: लाल सिंह दिल पंजाबी के चर्चित कवियों में हैं। उनकी चर्चा हिंदी में बहुत कम हुई है। हिंदी में पंजाबी के दलित कवियों की चर्चा यों भी बहुत कम हुई है। इस खाली जगह को भरने का प्रयास किया है सत्यपाल सहगल ने। उन्होंने लाल सिंह दिल की प्रतिनिधि कविताएं हिंदी अनुवाद में सुलभ कराई हैं। लाल सिंह दिल ने अपनी कविताओं में पंजाब के दलितों, दबे-कुचले लोगों को वाणी दी है। वे खुद भी इसी वर्ग से थे। इस वर्ग के जीवन को उन्होंने नजदीक से देखा और खुद भुगता था।

पंजाब का दलित प्रश्न इसलिए भी विशिष्ट है कि सिख धर्म में जातिगत भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। मगर सिखों में भी वर्ग बन गए- जट््ट सिख, खत्री, अरोड़ा और सबसे निचले पायदान पर मजबी सिख (दलित)। सामाजिक स्तर पर भी भेदभाव बना रहा। गांवों में तो उच्च और निम्न जातियों के गुरद्वारे भी अलग-अलग हैं। यह भेद मृत्यु के बाद भी बना रहता है। मुर्दे को जलाने के लिए श्मशान घाट अलग-अलग हैं। शायद इसीलिए लाल सिंह दिल कहते हैं: ‘मुझे प्यार करने वाली/ पराई जात कुड़िए/ हमारे सगे मुरदे भी/ एक जगह नहीं जलाते।’

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लाल सिंह दिल की कविताएं उस दर्द से उपजी हैं, जो अपनी ही धरती, अपने ही देश में बेगाने होने के अहसास से पैदा होता है: ‘एक मेरे वतन की दूसरी शक्ल है/ एक मेरी कौम कोई और भी है/ जहां कहीं एक भी मुहल्ला/ अध-भूखा/ अध-सोया/ सो रहा है-/ कहीं भी जहां मेहनतकश/ दुख रहे अंगों का दिल बहलाने के लिए/ तारे गिनें/ मेरे देश से दूर/ जहां कहीं भी वह मेरा वतन है/ कहीं भी बसती वह मेरी कौम है।’ लाल सिंह दिल दुनिया के सारे मजदूरों को अपनी कौम का मानते हैं। यहां उन पर दलित अस्मिता की जगह मार्क्सवाद का असर ज्यादा है।

पंजाब में ज्यादातर दलित खेतिहर मजदूर हैं। लेकिन मेहनत के बावजूद जमीन पर इन लोगों का कोई हक नहीं होता। मेहनत की एवज में उनको बहुत कम मजदूरी मिलती है। यही स्थिति कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की है। लाल सिंह दिल के शब्दों में: ‘जमीन जट्ट की मां है/ सरमाया सरमाएदार का है/ नौकरियां रिश्वत की हैं/ पर तुम्हारा कौन है।… हमारे लिए/ पेड़ों पर फल नहीं लगते/ हमारे लिए/ फूल नहीं खिलते/ हमारे लिए/ बहारें नहीं आतीं/ हमारे लिए इंकलाब नहीं होते।’ दिल के निजी जीवन में भी कम संघर्ष नहीं था। यहां तक कि उनकी मृत्यु भी किसी सुखद स्थिति में नहीं हुई। अपने जुझारू जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने लिखा: ‘इच्छा पूरी हो जाती गर मेरी कोई/ तो दुनिया से जाने का मैं मन बनाता।’

लाल सिंह दिल ने अपनी कविताओं में दलित स्त्री-जीवन का भी चित्रण किया है। दलित स्त्री दलितों में भी दलित मानी जाती है। पग-पग पर उसका शोषण होता है। उसकी छवि हमारे मानस की औरत से अलग है। ये औरतें हैं ‘जो खुरलियां साफ करती/ गोबर उठाती/ गेंहूं की बालियां चुनती/ कितना काम करती हैं/ यह गाएं बेगानी बेटियां।’ पर ये औरतें कमजोर नहीं हैं। आमतौर पर औरत को पुरुष के मुकाबले कमजोर समझा जाता है और दलित, मेहनतकश औरत को तो और भी कमजोर माना जाता है। लेकिन लाल सिंह दिल इस धारणा को तोड़ते हैं। वे औरत की तुलना धरती से करते हुए कहते हैं: ‘लोग कहें कि बैल के सींगों पर धरती/ मैं असहमत हूं/ पर मेरा विश्वास अटल है/ कि अपने हाथ पर धरती औरत ने है उठाई हुई/ इसलिए तो महक धरती की उसके बदन जैसी है/ इसलिए तो लहलहाएं फसलें पल्लुओं की तरह।’

हमारे समाज में नैतिकता को बहुत महत्त्व दिया जाता है। खासकर औरत को बचपन से ही नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है। पुरुष निर्मित नैतिकता की हदों को पार करने वाली औरत को हमारे समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता, उनको समाज का हिस्सा नहीं माना जाता। समाज से बहिष्कृत कर हाशिए पर ढकेल दी गई इन औरतों को लाल सिंह दिल अपनी बहन-बेटियां और आने वाले इंकलाब की बहन-बेटियां बना कर तथाकथित सामंती नैतिकता के मुंह पर जोरदार तमाचा मारते हुए कहते हैं: ‘दोस्तो! मरजी जितना घिनौना आप मुझे समझो/ ये वेश्या औरतें, लड़कियां/ मेरी माएं, बहनें और बेटियां हैं/ और आपकी भी/ ये गाएं पूजने वाले हिंदुस्तान की/ माएं, बहनें और बेटियां हैं/ ये आने वाले इंकलाब की/ माएं, बहनें और बेटियां हैं।’
लाल सिंह दिल सत्तर के दशक में सशस्त्र वामपंथी आंदोलन में सक्रिय थे। इसलिए उनकी उस दौर की कविताओं में क्रांतिकारी स्वर मिलता है। इस समय उन्होंने प्रतिहिंसा की वकालत करने वाली कविताएं लिखीं और माना कि सत्ता के दमन को हथियारबंद क्रांति से ही खत्म किया जा सकता है। 1971 में प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘सतलुज दी हवा’ में ‘सतलुज की हवा’, ‘रिहाई की खुशी में गीत’, ‘बेलचक’, ‘कंगला तेली’, ‘लाल पूरब’ और ‘उठे गुरिल्ले’ कविताओं में उन्होंने अपनी इसी विचारधारा को अभिव्यक्त किया है।

मगर 1997 तक आते-आते उनका स्वर बदलने लगा। इसका कारण शायद यह रहा कि सशस्त्र क्रांति की विसंगतियों को वे समझ चुके थे। क्रांति का दावा करने वाले वामपंथियों की कथनी और करनी का अंतर उनकी समझ में आ गया था। शायद इसीलिए शुरू में वामपंथ की तरफ झुकाव होने के बावजूद उन्होंने ऐसे दोहरे चरित्र वाले वामपंथियों पर व्यंग्य करते हुए लिखा: ‘हम कामरेड चंगे ओ लोगो/ हम कामरेड चंगे/ दुनिया भर का भाषण दें हम/ जान देने से संगे ओ लोगो/ हम कामरेड चंगे…, इंकलाब का नाम क्यों लें हम/ यह कुर्बानियां मंगे ओ लोगो, हम कामरेड चंगे…।’

लाल सिंह दिल उम्मीद के कवि हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में समाज की निराशा से मुठभेड़ करते हुए जीवन के प्रति गहरी आस्था रखी है। मनुष्यता की वकालत की है। उनकी कविता उम्मीद की कविता है। ‘गीत कोई मेहनत के गाए/ छोड़ रांझा हीर भट्टी दुल्ला/ झोली में से छीने न कोई दाने/ न कोई उतारे पहिरन औ’ पल्ला’।

लाल सिंह दिल प्रतिनिधि कविताएं: चयन और अनुवाद- सत्यपाल सहगल; आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला (हरियाणा); 250 रुपए।

 

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