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प्रसंग: अहिंसा और वैचारिक विसंगतियां

प्रफुल्ल कोलख्यान जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: यह भारत के लिए गौरव की बात है कि महात्मा गांधी के जन्मदिन- दो अक्तूबर- को संयुक्त राष्ट्र की तरफ से विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मान्यता दी गई है। गांधी की अहिंसा अपने व्यवहार में आम आदमी की जीवनचर्या से जुड़ कर जीवन आदर्श बनने की तरफ […]

Author October 8, 2014 10:36 AM

प्रफुल्ल कोलख्यान

जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: यह भारत के लिए गौरव की बात है कि महात्मा गांधी के जन्मदिन- दो अक्तूबर- को संयुक्त राष्ट्र की तरफ से विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मान्यता दी गई है। गांधी की अहिंसा अपने व्यवहार में आम आदमी की जीवनचर्या से जुड़ कर जीवन आदर्श बनने की तरफ बढ़ती है। यह पूरी सभ्यता हिंसा पर टिकी है। ऐसा माना जाता है कि मनुष्य प्राकृतिक रूप से हिंसक प्राणी है। सांस्कृतिक रूप से उसे अहिंसा की तरफ बढ़ना है। संस्कृति के निर्माण में राजनीति की बड़ी भूमिका होती है, क्योंकि जीवन की भौतिक जरूरतों को पूरा करने की व्यवस्था राजनीति का दायित्व है। भौतिक जरूरतों को पूरा किए बिना कोई संस्कृति बन नहीं सकती।

गांधी जिस दौर में सत्य, अहिंसा की बात करते हुए राजनीतिक पटल पर प्रकट हुए उस समय दुनिया चारित्रिक रूप से बदल रही थी। औद्योगिक क्रांति के बाद विश्व नए रूप में उभर रहा था। उत्पादन के साधनों में बदलाव आने के साथ विश्व की भौतिक जरूरतें बदल और बढ़ रही थीं। राज्य और धर्म की परस्पर-आश्रयिता बदल रही थी। औद्योगिक क्रांति के साथ, राष्ट्रवाद की मार्फत राज्य और पूंजी के बीच ‘पवित्र परस्पर-आश्रयिता’ का संबंध विकसित हुआ। व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा में विश्व टकराव के बीज विकसित हो रहे थे। राज्यों की सामरिक क्षमता और युद्धक प्रभाव में भारी वृद्धि हो रही थी।धर्मनिरपेक्षता नए सिरे से प्रासंगिक हो रही थी, क्योंकि उसे राज्य से विलग होकर पूंजी के लिए स्थान छोड़ना था। ऐसे में गांधी ने सत्य और अहिंसा की बात को धर्म के क्षेत्र से थोड़ा बाहर निकाल कर, लेकिन धार्मिक आवरण का इस्तेमाल करते हुए राजनीति के क्षेत्र में लागू किया।

जब उदारीकरण-भूमंडलीकरण-निजीकरण में निहित आकांक्षाओं के कारण विश्व में नए किस्म के टकराव शुरू हुए तो गांधी के राजनीतिक सिद्धांत की व्यावहारिकता में नई चमक को विश्व समुदाय ने देखा-परखा और उनके जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मानने का फैसला किया। भारत को इस बात पर गर्व होना चाहिए, लेकिन सिर्फ गर्व करना काफी नहीं है। प्रधानमंत्री ने जापान में कहा कि अहिंसा के प्रति भारत की पूर्ण प्रतिबद्धता है। यह ‘भारतीय समाज के डीएनए में रची-बसी है और यह किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि से बहुत ऊपर है।’ उनका संदर्भ भारत के परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार का था।
मगर भारत की डीएनए रिपोर्ट बताने के बजाय दुनिया की वास्तविक स्थिति पर बात की जानी चाहिए। एक ओर लगातार युयुत्स मुद्रा में रहना, लगातार युद्ध की भाषा बोलना और दूसरी ओर अपने डीएनए में विश्व शांति और अहिंसा होने की बात कहना! इसे राजनीतिक संगति और आर्थिक समता के व्यवहार पर लाना होगा।

इसी तरह पांच सितंबर को भारत शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। सर्वेपल्ली राधाकृष्णन एक आदर्श शिक्षक तो थे ही, भारतीय और पाश्चात्य दर्शन में निहित वैश्विक आयामों के सामान्य पक्ष को दार्शनिक दक्षता से दुनिया के सामने लाने वाले महान व्यक्ति भी थे। हालांकि वे शिक्षामंत्री के रूप में भारत सरकार की शिक्षानीति का प्रारंभिक ढांचा तैयार कर नई शिक्षा प्रणाली को अधिक गतिमय बना सकते थे, मगर यह नहीं हुआ। राधाकृष्णन शिक्षामंत्री नहीं बने, पर उनके विचारों का महत्त्व इससे कम नहीं हो जाता। शिक्षा आयोग के रूप में उनके सुझावों पर ही 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग बना। आज जब कहीं-कहीं से पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के बजाय गुरु दिवस के रूप में मनाए जाने की आवाज आवाज उठ रही है तो एक डर हमारे अंदर सक्रिय हो रहा है। गुरु और शिक्षक में अंतर है, जैसे शिक्षा और विद्या में। डर यह कि शिक्षक दिवस को गुरु दिवस में बदल दिए जाने के बाद बारी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की आएगी।

जिस तरह भारत की डीएनए रिपोर्ट बांची जा रही है, उससे डर यह लगता है कि अचानक भारत सरकार दो अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाए जाने के स्वरूप में भी अंदर-अंदर बदलाव करने की योजना न बना डाले। जाहिर है, पूंजी और राज्य के अंतर्ध्वंस से बचाव का जो भी रास्ता बन सकता है, उसमें एक रास्ता गांधी-व्यवहार का भी है। इस समय कई जारी प्रसंगों की अंतर्वस्तु में बदलाव लाने का शासकीय प्रभाव जोर पकड़ता दिख रहा है। नया मिजाज जैसा भी हो, यह याद रखना जरूरी है कि गांधी सत्य और अहिंसा की व्यवहार्यता के लिए जिस जीवन-शैली की बात करते थे, हम उससे कहीं दूर जा खड़े हुए हैं। रूपक में कहें तो गांधी रेल के विस्तार के विरोधी थे और आज हमारी कोशिश बुलेट रेल चलाने की है!

अहिंसा को तरह-तरह से परिभाषित कर समझने की कोशिश की गई है। मन, कर्म और वचन के संदर्भ से भी हिंसा को समझा गया। आज जिस आक्रामक विकास के दौर से हम गुजर रहे हैं, उसमें संगठित हिंसा के लिए बड़ी जगह और एक तरह की मानसिक वैधता की स्वीकृति बनती जा रही है। गांधी जिस परिप्रेक्ष्य में अहिंसा को जरूरी मूल्य के रूप में अपने राजनीतिक व्यवहार में शामिल कर रहे थे, उस परिप्रेक्ष्य में एक की वंचना दूसरे के विकास की बुनियादी शर्त बनने लगी थी। प्रकृति चक्र में एक जीव दूसरे का भोज्य होता है। पर लगता है, प्रकृति चक्र का यह सिद्धांत अपने निकृष्टतम रूप में मानव संस्कृति में और भयानक ढंग से सक्रिय है। सांस्कृतिक रूप से अहिंसा की तरफ बढ़ना मुश्किल हो गया है। संस्कृति के निर्माण में गांधी-व्यवहार जिस राजनीतिक संस्कृति की जरूरत बता रहा था, वह राजनीतिक संस्कृति अंतत: चल नहीं पाई। क्योंकि अब राजनीति अर्थनीति से तय होने लगी है। आम नागरिक के जीवन की भौतिक जरूरतों को पूरा करने और मुनाफे में संतुलन बिठाना राजनीति का दायित्व हो गया। राजनीति पर अर्थनीति के नियंत्रण का नतीजा यह कि पलड़ा मुनाफे का भारी होता जा रहा है। इस संतुलन को कायम रखने के लिए गांधी के अहिंसा विचार की खास जरूरत है। असंतुलन सामान्य नागरिक जीवन को ही दूभर नहीं बनाता, बल्कि पूंजीवाद को भी दुर्निवार अंतर्ध्वंस की परिस्थितियों में धकेल देता है। इसलिए गांधी का अहिंसा विचार मनुष्य की परस्पर-आश्रयी सभ्यता में संतुलन का संदेश है।

 

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