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निनाद: साहसिक प्रयोग के गायक

कुलदीप कुमार कुमार गंधर्व अपने जीवनकाल में ही किंवदंतीपुरुष बन गए थे। सभी मानते थे कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के समकालीन परिदृश्य में- और, संभवत: समूचे इतिहास में- उन जैसा विवादास्पद और नवाचारी संगीतकार कोई दूसरा नहीं हुआ। उनकी उपस्थिति हमारे संगीत के जीवंत होने की साक्षी थी, इस बात का प्रमाण थी कि बात-बात […]

Author November 16, 2014 12:28 pm
कुलदीप कुमार

कुलदीप कुमार

कुमार गंधर्व अपने जीवनकाल में ही किंवदंतीपुरुष बन गए थे। सभी मानते थे कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के समकालीन परिदृश्य में- और, संभवत: समूचे इतिहास में- उन जैसा विवादास्पद और नवाचारी संगीतकार कोई दूसरा नहीं हुआ। उनकी उपस्थिति हमारे संगीत के जीवंत होने की साक्षी थी, इस बात का प्रमाण थी कि बात-बात पर परंपरा की दुहाई देने वाले शास्त्रीय संगीत में भी बिना शास्त्र की सीमा का उल्लंघन किए साहसिक और अर्थपूर्ण प्रयोग किए जा सकते हैं। कुमार गंधर्व के सभी प्रयोग सफल हुए हों, ऐसा भी नहीं। महान प्रतिभाएं अपनी सफलता और विफलता, दोनों में ही आने वाले पीढ़ियों के लिए अनेक सबक छोड़ जाती हैं।

विज्ञान की जानकारी रखने वाले जानते हैं कि आइन्स्टाइन लगभग तीन दशक तक क्वांटम मेकेनिक्स के खिलाफ विफल संघर्ष करते रहे, क्योंकि उन्हें पक्का यकीन था कि ‘ईश्वर चौपड़ नहीं खेल सकता’। उनके इस विफल सैद्धांतिक संघर्ष ने वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों की राहें आलोकित की हैं। कुमार गंधर्व के सभी प्रयोग और प्रयास सफल हुए या न हुए हों, लेकिन उन्होंने एक बार फिर इस सत्य का पुनराविष्कार अवश्य किया कि अगर परंपरा का नवीकरण न किया जाए तो वह सड़ने-गलने लगती है। उन्होंने इस सत्य के एक बार फिर दर्शन कराए कि परंपरा हमारे सिरों पर लदा हुआ अतीत का बोझ नहीं, बल्कि भविष्य की यात्रा तय करने के लिए मिला हुआ पाथेय है।

ऊपर से देखने पर लगता है कि कुमार गंधर्व के लिए यह सब करना काफी आसान रहा होगा। वे बचपन में ही अखिल भारतीय स्तर पर एक विलक्षण बाल-प्रतिभा के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। बिना संगीत सीखे केवल रेकॉर्ड सुन-सुन कर आठ-नौ साल की उम्र से ही वे अब्दुल करीम खां, फ़ैयाज़ खां और रामकृष्णबुआ वझे जैसे दिग्गज गायकों की गायकी को प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत कर सकते थे। यह नकल होते हुए भी नकल नहीं थी, क्योंकि वे तीन-साढ़े तीन मिनट के 78 आरपीएम वाले रेकॉर्ड सुन कर उसमें गाई गई चीज को दस-बारह मिनट में प्रस्तुत करते थे। यानी वे उस रेकॉर्ड की नहीं, गायकी की नकल पेश किया करते थे। इसीलिए शिवपुत्र कोमकली को दुनिया ने कुमार गंधर्व का नाम देकर सराहा।

मुझे कभी कुमारजी से मिलने का सौभाग्य नहीं मिला। अगर मिलता तो पूछता कि क्या बचपन में यह सब करते हुए उन्हें अच्छा लगता था? या वे उसी तरह मजबूरी में यह सब करते थे जैसे अक्सर बच्चे घर आए मेहमान के सामने माता-पिता के जोर देने पर कविता या कोई गाना सुना कर करते हैं? क्या नकल के प्रति चिढ़ उनमें अपने बचपन के इन्हीं अनुभवों के कारण तो पैदा नहीं हुई? कारण जो भी हो, परिपक्व कुमार गंधर्व में नकल के प्रति बेहद चिढ़ थी। और विडंबना यह कि उनका कार्यक्षेत्र यानी शास्त्रीय संगीत ऐसा था, जहां शिष्य अपने जीवन को तभी चरितार्थ समझता था जब वह गुरु की हूबहू नकल कर सके। श्रोता भी उसी की तारीफ करते थे, जो ऐसा कर दिखाए।

इसी की प्रतिक्रिया में कुमार गंधर्व घरानों और घरानेदार गायकी के ही खिलाफ हो गए और उन्हें ‘ताश का महल’ बताने लगे। ऐसा नहीं कि इस परंपरा के भीतर नया करने की गुंजाइश नहीं थी। अगर न होती तो एक घराने के सभी गायक एक जैसा ही गाते। लेकिन इसके साथ यह भी सही है कि घरानों में अनुकरण की प्रवृत्ति को एक गुण की तरह माना जाता था और इस कारण अनेक प्रतिभाएं अनुकरण के दुश्चक्र में फंस कर नष्ट हो जाती थीं।

इस संदर्भ में पिछली सदी के एक अन्य शीर्षस्थ गायक मल्लिकार्जुन मंसूर के जीवन की एक घटना याद आती है। वे बंबई (अब मुंबई) के किसी म्यूजिक सर्किल में गा रहे थे कि एक बुजुर्ग उठ खड़े हुए और बोले कि आप जैसे गा रहे हैं, बड़े खां साहब (यानी जयपुर-अतरौली घराने के संस्थापक उस्ताद अल्लादिया खां) तो इस राग को ऐसे नहीं गाते थे। मल्लिकार्जुन मंसूर ने कहा कि आप ठीक कहते हैं। मैं आपको अभी गाकर दिखाता हूं कि बड़े खां साहब इस राग में इस चीज को कैसे गाते थे। इसके बाद मंसूर ने ठीक उसी तरह गाकर दिखाया जैसे अल्लादिया खां गाया करते थे। और फिर मंसूर ने उन बुजुर्ग की ओर मुखातिब होकर कहा, ‘मैं गवैया हूं, बड़े खां साहब का स्टेनो नहीं।’

घरानों के भीतर से भी जो श्रेष्ठ कलाकार उभरे, वे भी यह दावा नहीं कर सकते थे कि उन्होंने अन्य घरानों से कुछ नहीं लिया। खुद अल्लादिया खां को ही लें। घराने की श्रेष्ठता के अभिमान के कारण वे बड़े मुहम्मद खां (जिनके बारे में मशहूर है कि इन्हीं की गायकी छुप-छुप कर सुन कर हद्दू खां-हस्सू खां ने अपनी गायकी बनाई थी, जिसे आज हम ग्वालियर घराने की गायकी के रूप में जानते हैं) के पुत्र मुबारक अली खां से बेहद प्रभावित होने के बावजूद कभी शागिर्द बन कर सीख नहीं पाए, हालांकि मुबारक अली खां ने खुद उन्हें अपना शागिर्द बनाने की इच्छा प्रकट की थी। लेकिन जयपुर में रह कर उन्होंने मुबारक अली को सुन-सुन कर ही बहुत कुछ सीखा, खासकर तानों के मामले में। शायद इसीलिए उन्होंने अपनी गायकी को जयपुर का नाम भी दिया।
यहां इस सब का उल्लेख करने का आशय सिर्फ इस तथ्य को रेखांकित करना है कि कुमार गंधर्व ने घरानों की इस जकड़न को महसूस कर लिया था। वे परंपराभंजक नहीं थे। उनका विरोध परंपरा के बहते पानी को बांध कर उसे सड़ांध फैलाने वाले जोहड़ में बदलने से था। उनके सभी शिष्यों ने अलग-अलग समय पर स्पष्ट रूप से यह कहा है कि परंपरागत बंदिशों और रागों को वे परंपरागत ढंग से ही सिखाते थे और राग संगीत की सीमाओं के प्रति सचेत होते हुए भी कभी उन्हें लांघते नहीं थे। एकाध बार अगर भूप में उन्होंने मूड के अनुसार मध्यम लगा भी दिया- और खुद गाना रोक कर बताया भी कि बहुत देर से मध्यम भूप (राजा) के दरबार में आने के लिए खड़ा था, तो मैंने सोचा उसे भी प्रवेश दे दूं- लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे भूप में मध्यम लगा कर गाते या सिखाते थे। यों फ़ैयाज़ खां की जयजयवंती पर भी उस समय के गुणीजनों को आपत्ति थी, लेकिन उनके प्रशंसकों के लिए तो ‘मोरे मंदर अब लौं नहीं आए’ ही प्रामाणिक जयजयवंती थी।

साहित्य के संदर्भ से देखें तो मुझे कुमार गंधर्व में निराला और धूमिल का अद्भुत मिश्रण नजर आता है। उनकी बनाई बंदिशों में जिस तत्त्व की ओर शायद अधिक ध्यान नहीं दिया गया है, वह है कि शृंगारपरक रचनाओं में भी प्रेम का भवन गार्हस्थ्य की नींव पर बनाया गया है। उनके द्वारा रचित राग मालवती की बंदिश ‘मंगल दिन आज बना घर आयो’ को भला कौन भूल सकता है? एक और रचना मैंने एक बार उन्हें गाते सुना था। शब्द भूल गया, लेकिन स्थिति यह है कि पत्नी अपने पति को याद करके कह रही है कि अब तो आ जाओ, तुम्हें ‘ललन पुकारे’।

आज यह देख कर अचरज होता है कि जिस गायक ने नकल का सदा विरोध किया और अच्छा-बुरा जैसा भी हो, नया रचने के लिए प्रेरित किया, उसकी भी अनुकृतियां पैदा हो गई हैं। आज जरूरत कुमार गंधर्व जैसा गाने की नहीं है, क्योंकि उनका गाना उन्हीं के साथ चला गया है। वैसा न कोई गा सकता है, और न किसी को गाने की कोशिश करनी चाहिए। हां, उन्होंने जिस राह पर चलने का प्रयास किया, उस पर और आगे निकालने की कोशिश जरूर की जानी चाहिए।

कुमार गंधर्व ने भजन को खयाल, टप्पा, तराना आदि की तरह ही शास्त्रीय संगीत की एक स्वतंत्र विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया। भजन गायकी को और नए आयाम दिए जाएं, हमारे संगीत के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर उन्हीं की तरह बंधनमुक्त होकर विचार किया और नया रचा जाए, यही उन्हें स्मरण करने का सबसे अच्छा ढंग होगा। यों भी कालिदास ने सौंदर्य की यही परिभाषा दी है कि वह क्षण-क्षण नया होता रहता है।

 

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