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प्रसंग: आदिवासी विमर्श के रोड़े

केदार प्रसाद मीणा जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: हिंदी का सबसे नया विमर्श आदिवासी विमर्श है। हालांकि हिंदी में आदिवासियों पर लंबे समय से लिखा जा रहा है, मगर जबसे आदिवासी क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ और उनके खिलाफ संघर्ष बढ़ा है, इनकी समस्याओं पर जोरशोर से लिखा जाने लगा है। वैसे ही जैसे दलितों […]

Author September 30, 2014 11:16 AM

केदार प्रसाद मीणा

जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: हिंदी का सबसे नया विमर्श आदिवासी विमर्श है। हालांकि हिंदी में आदिवासियों पर लंबे समय से लिखा जा रहा है, मगर जबसे आदिवासी क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ और उनके खिलाफ संघर्ष बढ़ा है, इनकी समस्याओं पर जोरशोर से लिखा जाने लगा है। वैसे ही जैसे दलितों की समस्याएं तो सदियों से रही हैं, इन पर मुल्कराज आनंद, हीराडोम जैसे साहित्यकार लिखते भी रहे हैं, मगर जब आंबेडकर से प्रेरित होकर कई दलित आंदोलन चले, तो दलितों पर लेखन बढ़ा और उसने हिंदी में दलित साहित्य विमर्श को जन्म दिया। तमाम कमजोरियों और भटकावों के बावजूद इसने हिंदी साहित्य को अधिक समृद्ध और सार्थक बनाया है।

दलित समाज से भिन्न अपने सामाजिक-सांस्कृतिक-भाषिक मूल्यों और भिन्न विद्रोही इतिहास के बावजूद राजनीतिक-साहित्यिक हाशियेपन के चलते आदिवासियों ने उम्मीद की थी कि यह दलित विमर्श अंकुरित हो रहे आदिवासी विमर्श का पथ-प्रदर्शक बनेगा। हालांकि कई मामलों में बना भी है और शायद बनता रहेगा, मगर अब इसका दूसरा पहलू नजर आने लगा है। आदिवासी विमर्शकार जानते हैं कि आदिवासी विमर्श दलित विमर्श से उतना ही भिन्न होने वाला है, जितना आदिवासी समाज इस समाज से है। यानी काफी हद तक सवर्णों से छुआछूत न बरतने वाला; अपने दुराग्रहों के चलते ही सही, इन पर न लिख सकने वाले हिंदी लेखकों से एक सीमा से अधिक न जाकर सवाल करने वाला सृजनात्मक विमर्श।

अन्य वैचारिक आंदोलनों के भटकावों से नहीं सीख कर दलित विमर्श भी काफी भटका है। अपनी सीमा में दलित सवालों पर बल देने वाली प्रेमचंद की रचना ‘रंगभूमि’ को जलाया जाना जरूरी समझा गया, बिना यह समझे कि ‘मनुस्मृति’ और ‘रंगभूमि’ में कितना फर्क है। अपनी समझ से दलित पक्ष को मजबूती से रखने वाले प्रेमचंद के योगदान को सराहे जाने के बजाय उन्हें ‘सामंत का मुंशी’ कहा गया। मगर इन घटनाओं से प्रेमचंद के कद पर कोई असर नहीं पड़ा, उल्टे दलित श्रम बेकार गया।

ये प्रसंग असल में सवर्ण समाज के ‘आग लगाने’ और आरोप लगा कर मानसिक दबाव बनाने के षड्यंत्रकारी मानसिकता का ही प्रभाव साबित हुए हैं। ऐसे ब्राह्मणवादी षड्यंत्रों का विरोध करते-करते अधिकतर दलित साहित्यकार वैसे ही होते चले गए। दलित साहित्य पहले दलित राजनीति का सहायक बना, फिर अनुगामी हो गया; पहले हिंदू धर्म के छद्म से लड़ा, फिर उसी के समान अपने धर्मों की स्थापना में लग गया; पहले इसके लेखक संघ बने, फिर लेखकों के निजी संघ बने।

दलित विमर्श के इन निरर्थक प्रसंगों से आदिवासी विमर्शकारों ने सीखा था कि व्यावहारिक राजनीति के दबावों और व्यक्तिगत सीमाओं के बावजूद वे अपने विमर्श में मुख्यधारा के फैलाए ऐसे षड्यंत्रों और सचमुच के ‘दिकुओं’ को पहचानेंगे और साहित्य-विमर्श को आदिवासियों की समस्याओं के निपटारे के लिए एक सृजनात्मक सेतु बनाएंगे। लेकिन पिछले दिनों इस विमर्श में घटी कुछ घटनाओं को देख कर आशंका होती है कि आदिवासी विमर्श उपरोक्त षड्यंत्रों से बच कर लगातार उजड़ते-मिटते जा रहे आदिवासियों की आवाज बनेगा या अंदर और बाहर से घुसे ‘दिकुओं’ के व्यक्तिगत उत्थान का हथियार बन कर रह जाएगा।

निर्मला पुतुल अपनी कविताओं में ऐसे ही ‘दिकुओं’ और उनके षड्यंत्रों का जिक्र बार-बार करती हैं। वे समाज की लड़कियों को इनसे सचेत करती हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि आदिवासी लड़कियों के आदिवासी शोषक जांचसिद्ध दोषी होकर भी इन्हीं के हितैषी बने घूम रहे हैं, एनजीओ आदि के माध्यम से इनके समाज में बाहरी लोग घुस कर इनकी भोली-भाली लड़कियों से झूठा प्रेम और व्यावसायिक विवाह करके इनके सब संसाधन छीन रहे हैं, उनके ‘जाहेरथान’, ‘अखड़ा’ पर कब्जा करते जा रहे हैं और आदिवासियों के ऐसे हितैषी बने घूम रहे हैं कि खुद असली आदिवासी ही शर्मिंदा हो जाएं। ऐसे कुछ ‘दिकू’ दिल्ली और रांची में आजकल खूब सक्रिय हैं। ये आदिवासी और गैर-आदिवासी सहृदयी लोगों और सरकारों से इनके विकास के लिए चंदा मांग कर अपना धंधा चला रहे हैं। इस काम में इनके सहयोगी कुछ आदिवासी ही बने हुए हैं, जैसे बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कराने में बहुत-से आदिवासी अंगरेजों के साथ मिले हुए थे।

ऐसे लोगों का फूल-पत्तियां लपेट कर आदिवासी लड़कियों को नचाना और इस तरह अपने दोष पर परदा डाल कर भ्रम कायम करना; विश्वविद्यालयों की आदिवासी गोष्ठियों में वहीं के इन मुद्दों के जानकार गैर-आदिवासी विद्वानों की उपेक्षा इसलिए करना कि कहीं वे इनसे अधिक अच्छा बोल कर चर्चा में न आ जाएं या समाज और राजनीति में सक्रिय आदिवासी समाज के भीतर के लुटेरों का जिक्र न कर दें, जो आदिवासी लड़कियों को प्लेसमेंट या फिर शादियों के नाम पर बर्बाद कर रहे हैं। ऐसी गतिविधियां आदिवासी विमर्श की राह में बड़ा रोड़ा बनने लगी हैं।

हिंदी दलित विमर्श में उठी आत्मघाती साहित्यिक राजनीति का प्रभाव अब आदिवासी विमर्श पर भी पड़ता दिखरहा है। इसकी झलक पिछले दिनों ‘जनसत्ता’ में भी (गंगा सहाय मीणा के लेख ‘प्रेमचंद साहित्य में आदिवासी’, 10 अगस्त) दिखी। किसी दिन फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के बारे में भी कहा जा सकता है कि उन्होंने ‘मैला आंचल’ में संथालों को पिटता दिखा कर आनंद प्राप्त किया या उन्हें अपमानित किया है, जो कि सत्य नहीं है। शुक्र है कि प्रेमचंद की जिन रचनाओं में आदिवासी ‘उस’ रूप में नजर आते हैं, वे अब तक जलाई नहीं गई हैं!

प्रेमचंद ने अपने समय में दलित लड़की के शोषक मातादीन ब्राह्मण के मुंह में हड््डी डलवा दी थी, शोषित के पक्ष में इससे अधिक क्रांतिकारी ढंग से कैसे लिखा जा सकता है! आदिवासियों को लूटने वाले महाजनों की जड़ें आदिवासी गांवों से अधिक ताकतवर इन मैदानी इलाकों में थी, जिसकी निंदा प्रेमचंद पुरजोर ढंग से करते हैं। ‘गोदान’ मूलत: महाजनी सभ्यता के विरोध का ही दस्तावेज है। प्रेमचंद इसकी जड़ों पर वार करते हैं, वे ‘दिकू’ महाजनों के मुंशी नहीं हैं। कुमार सुरेश सिंह ने अपनी किताब ‘बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन’ में लिखा है: ‘1925 के आसपास बड़े पैमाने पर भूमि-अंतरण के मामले सामने आए… मुंडाओं के बीच ही एक ऐसा वर्ग उभर कर आया, जिसने अपने ही लोगों से जमीन की खरीद-बिक्री शुरू की।’ आज की आदिवासी राजनीति भी ‘छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम’ में बदलाव कर आदिवासियों की जमीन बिकवा रही है, अब इसमें कोई ‘प्रेमचंद’ क्या करे?
प्रेमचंद आदिवासी मामलों के लेखक कतई नहीं हैं। उनके साहित्य में दिखी इनकी झलक इतनी ही है, जितनी उस जगह पर आदिवासी आबादी है। उन्हें वहां का समाज इसी नजर से देखता था, जिस नजर से मेहता देखता है, अगर इस नजर से प्रेमचंद ने न दिखाया होता तो शायद झूठ लिखा होता। प्रेमचंद को आदिवासी विमर्श में इस तरह घसीटने की शुरुआत असल में रांची के एक ‘दिकू’ ने ही की है, शायद इस बहाने प्रेमचंद को आदिवासी साहित्यकार साबित करने के लिए।

इनको प्रेमचंद से ही नहीं, आदिवासी समस्याओं पर आजकल बहुत अच्छा लिख रहे रणेंद्र और संजीव जैसे लेखकों से भी बड़ी आपत्ति है। इनकी रचनाओं के पात्रों की ऐसी डायरियों, जिनमें आदिवासी समाज का दर्द दर्ज है, को यह उनकी निजी डायरी कह कर इसके बहाने संपूर्ण रचना को खारिज कर रहे हैं। संजीव-रणेंद्र के आदिवासी इलाकों में काम करने वाले पात्र- सुदीप्त और किशन आदि सभी ‘दिकू’ नहीं कहे जा सकते। इनकी डायरियां महज उनकी निजी डायरियां नहीं हैं। ये आदिवासी विस्थापन और उसके खिलाफ संघर्ष के दस्तावेज भी हैं, क्योंकि न तो सरकारें इसको दर्ज करती हैं, न विस्थापित करने वाली कंपनियां। निरक्षर आदिवासी तो दर्ज कर ही नहीं सकते। ऐसे में इन लेखकों की रचना और इनके पात्रों की डायरियों का महत्त्व बढ़ जाता है।

प्रेमचंद को इस तरह बहस में घसीटने के पीछे ऐसे बुद्धिजीवियों का उद्देश्य यह है कि वे इस बहाने आज लिख रहे कई अच्छे लेखकों को हीन साबित करना चाहते हैं, ताकि अपने गठजोड़ और ‘दरबारियों’ के लिए कुछ ‘गुंजाइश’ निकाली जा सके। ठीक वैसे ही जैसे कुछ साल पहले दलित साहित्य में हुआ। प्रेमचंद, रेणु, संजीव और रणेंद्र आदि का साहित्य आदिवासी साहित्य न सही, पर आदिवासियों की समस्याओं पर लिखा गया महत्त्वपूर्ण साहित्य है। इन लेखकों के साहित्य को ‘दिकू’ साहित्य कहना आदिवासी विमर्श का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। अब देखना है कि आदिवासी संदर्भ में ऐसे साहित्य को हीन साबित करने की कुछ रणनीतिकारों की यह योजना किस दिन अपने अंतिम पड़ाव, कि ‘जन्मना आदिवासी ही आदिवासी साहित्य लिख सकता है’, पर पहुंचती है!

 

 

 

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