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पुस्तकायन: मुसलिम समाज का सच

सुनील यादव एम फीरोज खान की पुस्तक मुसलिम विमर्श: साहित्य के आईने में वैज्ञानिक तरीके से मुसलिम समाज की सरंचना, उसके रीति-रिवाज और मान्यताओं पर बात करती है। यह पुस्तक दो खंडों में विभक्त है। पहला खंड मुसलिम समाज के विविध पहलुओं पर है और दूसरा, मुसलिम रचनाकारों की हिंदी में लिखी सर्वश्रेष्ठ कृतियों के […]

Author November 16, 2014 11:49 am

सुनील यादव

एम फीरोज खान की पुस्तक मुसलिम विमर्श: साहित्य के आईने में वैज्ञानिक तरीके से मुसलिम समाज की सरंचना, उसके रीति-रिवाज और मान्यताओं पर बात करती है। यह पुस्तक दो खंडों में विभक्त है। पहला खंड मुसलिम समाज के विविध पहलुओं पर है और दूसरा, मुसलिम रचनाकारों की हिंदी में लिखी सर्वश्रेष्ठ कृतियों के मूल्यांकन का है।

‘हिंदी प्रदेश और मुसलिम समाज’ अध्याय में विस्तार से मुसलिम समाज की सरंचना, इस्लाम के उदय और विकास, मुसलिम समाज के रीति-रिवाज, त्योहार, मुसलमानों की शैक्षणिक और रोजगार की स्थिति पर विस्तार से विचार किया गया है। अरब की परिस्थितियों में उपजा इस्लाम जब हिंदुस्तान में आया तो भाई-चारे और समता के सिद्धांत पर यहां के लोगों को आकृष्ट किया और सामाजिक रूप से पिछड़े भारतीयों ने इसे ग्रहण किया। हालांकि आंशिक सच यह भी है कि मुसलिम आक्रमणकारियों और मुसलिम राजाओं ने बलात धर्म परिवर्तन कराया। मुसलमानों को भी जाति प्रथा का ग्रहण लगा, लिहाजा शूद्र जाति से धर्मांतरित मुसलमान शेखों और सैयदों की तुलना में नीची जाति की श्रेणी में ही रहे। भारतीय समाज की कल्पना मुसलमानों के बिना नहीं की जा सकती। राही मासूम रज़ा ने लिखा है कि ‘हिंदुस्तान के मुसलमानों ने हिंदू संस्कृति और सभ्यता को अपने खूने-दिल से सींच कर भारतीय संस्कृति और सभ्यता बनाने में बड़ा योगदान दिया है।’ अंगरेजों ने मूल या स्थानीय और बाहरी जैसे आख्यान रच कर भारत को दो बड़े समुदायों के आधार पर बांट दिया। यही वह विष था, जिसने भारत में सांप्रदायिक ताकतों को जन्म दिया। एम फीरोज ने इस पुस्तक में इन सभी बातों पर विस्तार से चर्चा की है।

यह किताब इस बात का बहुत साफ और सटीक मूल्यांकन करती है कि मुसलमानों के भी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन परस्पर भिन्न हैं और एक ही भूभाग में रहने वाले हिंदू और मुसलमानों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन में समानता देखने को मिलती है। हिंदू और मुसलमानों की यह सांस्कृतिक एकता ‘मुसलिम आस्मिता’ का सवाल उठाने वाले कट्टर हिंदूवादियों के तर्कों को भी खारिज कर देती है कि मुसलिमों की जनसंख्या वृद्धि दर अन्य समुदायों की वृद्धि दर से ज्यादा है। इसका मुख्य कारण मुसलमानों में शिक्षा का अभाव है। महिला साक्षरता दर की कमी और महिलाओं के विवाह की औसत आयु का कम होना है। भारतीय मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में देश के अन्य समुदायों से पीछे है। इस समुदाय में बड़े पैमाने पर फैली गरीबी और बेरोजगारी इसके लिए जिम्मेदार है। मुसलिम समुदाय की वे बिरादरियां, जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक है, वे शिक्षा के मामले में भी आगे हैं। आधुनिक सोच और शिक्षा से वंचित मुसलिम समाज का एक बड़ा तबका मुल्ला-मौलवियों के प्रभाव से ग्रस्त जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। उनकी साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है।

फिर मुसलिम समाज को व्याहारिक रूप से समझने के क्रम में एम फिरोज खान मुसलिम समाज संबंधी रचनाओं का विश्लेषण करते हैं। हिंदी उपन्यास ने भारतीय समाज के विविध पहलुओं को छुआ है। अब उपन्यास के जनतंत्र में ऐसे लोग जगह पा रहे हैं, जो कभी हाशिए पर ढकेल दिए गए थे। यह हिंदी उपन्यास की चौहद्दी का विकास ही है कि आज मुसलिम, दलित और आदिवासियों के जीवन पर उपन्यास लिखे जा रहे हैं।

सबसे पहले शानी ने यह सवाल उठाया था कि हिंदी उपन्यास में मुसलमान कहां हैं। ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के इकतालीसवें अंक में नामवर सिंह से बात करते हुए उन्होंने पूछा था कि ‘‘क्या किसी भी देश का भौगोलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मानचित्र बारह-पंद्रह करोड़ मुसलिम वजूद को झुठला कर पूरा हो सकता है… नामवरजी, कई वर्ष पहले आपने कहा था कि हिंदी साहित्य से मुसलिम पात्र गायब हो रहे हैं। मुसलिम पात्र जब थे ही नहीं, तो गायब कहां हो रहे हैं। प्रेमचंद में नहीं थे, यशपाल में आंशिक रूप से थे।… गोदान, जो लगभग क्लासिकी पर जा सकता है और हमारे भारतीय गांव का जीवंत दस्तावेज है, उसमें गांव का कोई मुसलमान पात्र क्यों नहीं है, क्या अपने देश का कोई गांव इनके बिना पूरा हो सकता है? प्रेमचंद फिर भी उदार हैं, जबकि यशपाल के ‘झूठा सच’ में नाममात्र के मुसलिम पात्र नहीं, हाड़-मांस के जीवंत लोग हैं। लेकिन उसके बाद अज्ञेय, जैनेंद्र, नागरजी या उनकी पीढ़ी के दूसरे लेखकों में क्यों नहीं? और उससे भी ज्यादा तकलीफदेह यह है कि आजादी के बाद के, मेरी पीढ़ी के कहानीकारों में और उसके बाद के कहानीकारों में भी नहीं हैं।… हिंदी में ही क्यों नहीं हैं, जबकि तेलुगू में हैं, असमिया में हैं, बांग्ला में हैं।’’

शानी का ‘काला जल’ आने से पहले हिंदी उपन्यास में मुसलिम जीवन एक तरह से हाशिए पर था। ‘काला जल’ में शानी ने भारतीय मुसलमान के दुख-दर्द पिरोने के क्रम में मुसलिम समाज के आचार-व्यवहार, रूढ़ियां, रीतियां, भय, अंधविश्वास, तीज-त्योहार, स्त्री की दयनीय दशा, अशिक्षा आदि का प्रामाणिक चित्रण किया है।

इसी प्रकार नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘जीरो रोड’ के संदर्भ मे एम फिरोज लिखते हैं कि ‘जीरो रोड’ में लेखिका ने सांप्रदायिकता के स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए हिंदू मुसलमानों में व्याप्त घृणा और उसके परिणामस्वरूप, उसकी प्रतिक्रिया और व्यक्ति मन में चढ़े जुनून का चित्रण कर यह संदेश दिया है कि जुनून में व्यक्ति मानवता तक भूल जाता है और दंगा-फसाद हो जाता है, जबकि आम आदमी ऐसा करना नहीं चाहता। दंगा-फसाद कुछ ही व्यक्तियों की देन है।’

‘विभाजन और मुसलिम उपन्यासकर’ इस किताब का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। मुसलिम उपन्यासकारों के उपन्यासों से गुजरते हुए इस अध्याय में विभाजन की त्रासदी के मूल कारणों और विभाजन के बाद बदलते मुसलिम मानस को समझने की कोशिश की गई है। एम फिरोज इसके लिए शानी, बदीउज़्ज्मा, राही मासूम रज़ा, नासिरा शर्मा, मेहरुन्निसा परवेज़, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यासों की गहराई से पड़ताल करते हैं। वे लिखते हैं कि ‘विभाजन के पश्चात प्रभावित मुसलिम समाज का उल्लेख नासिरा शर्मा, रही मासूम रज़ा, बदीउज़्ज्मा, आदि उपन्यासकारों ने किया है। विवेच्य संवादों में व्यक्त मानसिकता से स्पष्ट है कि अधिकतर मुसलमान न पाकिस्तान बनने के पक्ष में थे और न पाकिस्तान के प्रति उनमें कोई रुचि थी… अर्थ कि अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुए उससे प्रभावित होने वाले जीवन और संबंधों पर अपने-अपने ढंग से असगर वजाहत, शानी, मेहरुन्निसा परवेज़ ने प्रकाश डाला है।’

एम फीरोज ‘छाकों की वापसी’ को भारत विभाजन के दस्तावेज के रूप में पढ़े जाने का आग्रह करते हैं। वे लिखते हैं कि ‘बदीउज्ज्मा ने विभाजित भारत के मुसलमानों की मनोदशा का बड़े ही स्वाभाविक और सुंदर ढंग से चित्रण किया है… पाकिस्तान निर्माण के पीछे आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को मुख्य रूप में बदीउज्ज्मा के ‘छाकों की वापसी’ में देखते हैं। पाकिस्तान की परिकल्पना और उसके विरोध को दो पात्रों के बीच हुई बहस जीवंत कर देती है।’ इस विषय पर ‘छाकों की वापसी’ के हबीब भाई का यह वक्तव्य बहुत मत्त्वपूर्ण है: ‘‘बहुत तकलीफदेह हकीकत है… की बिहारी मुसलमान की बंगाली मुसलमान के साथ गुजर नहीं हो सकती।… मैं समझता हूं कि बिहार के हिंदू इन बंगाली मुसलमानों से यकीनन बेहतर थे।’’

इसी क्रम में एम फीरोज मेहरुन्निसा परवेज़ का उपन्यास ‘कोरजा’ और नासिरा शर्मा के ‘ज़िंदा मुहावरे’ का मूल्यांकन करते हैं। अगर वे ‘कोरजा’ को मुसलिम संस्कृति और जीवन के व्यापक चित्रण के रूप में मूल्यांकित करते हैं, तो ‘जिंदा मुहावरे’ को ‘देश विभाजन के बाद व्याप्त आशंका, अशांत, द्वंद्व, संघर्ष विघटन’ के विविध परिदृश्य के रूप में। अगर संपूर्णता में देखें तो यह पुस्तक समाज और साहित्यिक संदर्भों के साथ मुसलिम समाज का एक समाजशास्त्रीय आख्यान रचती है।

मुस्लिम विमर्श: साहित्य के आईने में: एम फीरोज खान; वाङ्मय प्रकाशन, 205 ओहद रेजीडेंसी, पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, अलीगढ़; 295 रुपए।

 

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