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कानून: मृत्युदंड बनाम जीवन का अधिकार

अरविंद कुमार पिछले दिनों मृत्युदंड से जुड़े तीन मामलों पर व्यापक चर्चा चली। पहला मामला है, ईरान की छब्बीस वर्षीय रेहना जब्बारी का, जिसे अपने बलात्कारी की हत्या करने के मामले में फांसी दे दी गई। ईरान के इस कदम की चौतरफा निंदा हो रही है। दूसरा मामला है, हमारे उच्चतम न्यायालय द्वारा बहुचर्चित निठारी […]

Author November 16, 2014 12:09 pm

अरविंद कुमार

पिछले दिनों मृत्युदंड से जुड़े तीन मामलों पर व्यापक चर्चा चली। पहला मामला है, ईरान की छब्बीस वर्षीय रेहना जब्बारी का, जिसे अपने बलात्कारी की हत्या करने के मामले में फांसी दे दी गई। ईरान के इस कदम की चौतरफा निंदा हो रही है। दूसरा मामला है, हमारे उच्चतम न्यायालय द्वारा बहुचर्चित निठारी हत्याकांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली की दया याचिका खारिज किए जाने का। कोली को बच्चों का अपहरण कर नरभक्षण के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई है। तीसरा मामला पांच भारतीय मछुआरों को श्रीलंका में मादक द्रव्य तस्करी के आरोप में फांसी की सजा सुनाए जाने का है।

इन तीनों मामलों के व्यापक सामाजिक और राजनीतिक महत्त्व के चलते भारत में मृत्युदंड की प्रासंगिकता पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। गौरतलब है कि गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार इस समय देश में चार सौ दो लोग विभिन्न अदालतों द्वारा मृत्युदंड की सजा के तहत जेलों में बंद हैं, जिनमें दस महिलाएं हैं। चौबीस कैदियों ने महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर कर रखी है, जिस पर अभी तक फैसला लंबित है।

हालांकि उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में व्यवस्था दी है कि मृत्युदंड विरले मामलों में दिया जाना चाहिए। भारतीय कानून में मृत्यदंड के प्रावधान के साथ-साथ राष्ट्रपति को मृत्युदंड से क्षमादान का अधिकार भी है। राज्यपाल को राज्य के कानून के अंतर्गत मृत्युदंड के अलावा दी गई अन्य किसी भी सजा में माफी देने का अधिकार है। राज्यपाल मृत्युदंड को उम्रकैद या फिर आजीवन कारावास में बदल सकते हैं, वह भी जब मृत्युदंड राज्य सरकार के कानून के अंतर्गत दिया गया हो। मृत्युदंड चाहे राज्य या केंद्र के कानून के अंतर्गत दिया गया हो, पूरी तरह माफी देने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को है। अपने इस अधिकार का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति किसी अपीलीय न्यायालय जैसा नहीं, बल्कि कार्यपालिका जैसा कार्य करते हैं, जिसमें मंत्रिमंडल की सलाह मानना उनके लिए बाध्यकारी है।

संविधान में क्षमादान का प्रावधान रखने का शायद दो मकसद था। पहला, कानून को लागू करने में न्यायालय से हुई किसी भी गलती को सुधारने का दरवाजा खुला रखना। दूसरा, ऐसी किसी भी सजा से माफी देना, जिसका राष्ट्रहित में व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव हो।

गौरतलब है कि भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, चीन और अरब देशों के साथ दुनिया के उन चुनिंदा बावन देशों में शामिल है, जिसने अभी तक मृत्युदंड के प्रावधान को समाप्त नहीं किया है। जबकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त 192 देशों में से 140 ने अपने यहां से मृत्युदंड का प्रावधान हटा दिया है। यूरोपीय संघ ने तो अपनी सदस्यता के लिए मृत्युदंड का न होना एक अनिवार्य शर्त बना दी है। नतीजतन, यूरोप में बेलारूस को छोड़ कर अन्य किसी भी देश में मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है।

अधिकार का दर्शन कहता है कि व्यक्ति को जीवन का अधिकार बिना किसी शर्त के सार्वभौमिक है, इसलिए उस पर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं लगनी चाहिए। जीवन किसी भी प्राणी को प्रकृति का दिया एक अनमोल उपहार है। ऐसे में नैतिक सवाल है कि अगर मनुष्य जीवन दे नहीं सकता तो उसे जीवन लेने का भी अधिकार नहीं होना चाहिए। अधिकार का दर्शन आगे जोड़ता है कि आत्मरक्षा ही एकमात्र ऐसा बिंदु है, जिसकी सूरत में एक प्राणी दूसरे प्राणी की जान ले सकता है। यानी मृत्युदंड राज्य की तरफ से दी जाने वाली सजा है, जोकि आत्मरक्षा की श्रेणी में नहीं आती, बल्कि एक गलती को सुधारने के लिए दी जाने वाली सजा है। क्या एक गलती को दूसरी गलती करके सुधारा जा सकता है? नहीं।

मृत्युदंड के खिलाफ दूसरा मजबूत तर्क न्याय दर्शन का है। न्याय प्रणाली मुख्यत: तीन मूल सिद्धांतों पर कार्य करती है। पहला, कोई भी व्यक्ति अपने मामले में खुद न्यायाधीश नहीं हो सकता है। यानी फैसला हमेशा तीसरा व्यक्ति सुनाएगा, जिसको आदर्श रूप से निष्पक्ष माना जाता है। दूसरा, हर व्यक्ति को अपने बचाव का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। यानी अगर किसी व्यक्ति को वकील नहीं मिलता है तो न्यायालय उसे वकील भी उपलब्ध कराएगा या उसे अपना बचाव खुद करने का मौका देगा। तीसरा, व्यक्ति को देश की उच्चतम अदालत तक अपील का मौका होना चाहिए।

न्याय का तीसरा सिद्धांत बताता है कि दरअसल, कोई भी निर्णय अपने आप में अंतिम नहीं होता, क्योंकि कानून चाहे कितना ही व्याख्यायित क्यों न हो, वह हमेशा आगे और व्याख्या की गुंजाइश छोड़े रखता है? न्यायाधीश भी मनुष्य ही होते हैं, इसलिए उनकी अपनी सीमाएं होती हैं, यानी उनसे भी मानवीय भूल हो सकती है। इसलिए न्यायालयों को हमेशा अपने पूर्व निर्णयों की समीक्षा करते रहना चाहिए। न्याय के इसी दर्शन ने न्यायिक पुनर्व्याख्या के सिद्धांत को प्रतिस्थापित किया है। अगर तार्किक तौर पर देखें तो न्याय का यह सिद्धांत भी मृत्युदंड के खिलाफ खड़ा होता है। अगर किसी व्यक्ति को एक बार दोषी ठहरा कर फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए और कुछ समय बाद अदालत को कुछ नए तथ्य हाथ लगें जिनसे यह साबित हो जाए कि उक्त व्यक्ति दोषी नहीं था, तो अदालत अपने पूर्व निर्णय को पलट नहीं सकती।

आधुनिक राज्य का कर्तव्य नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना है, न कि उनकी जान लेना। मगर मृत्युदंड का प्रावधान इस बात का परिचायक है कि राज्य मृत्युदंड देने के लिए बना है।

मृत्युदंड के खिलाफ तीसरा मजबूत तर्क उपयोगितावाद या फिर परिणामवाद का है। दरअसल, कानून की किताब में किसी भी तरह की सजा के प्रावधान का बृहद कानूनी और नैतिक पहलू होता है। कानूनी पहलू मुख्यत: यह देखता है कि पीड़ित पक्ष को देश के कानून के हिसाब से न्याय मिला या नहीं। नैतिक पक्ष का दायरा काफी बड़ा होता है, जो कि हमेशा किसी भी विषय पर आगे बहस की गुंजाइस छोड़े रखता है। कानून की उपयोगिता, नैतिक पक्ष का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। किसी भी कानून का मकसद दोषी को सजा दिलाने तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों को जुर्म करने से रोकना भी है। क्या मृत्युदंड का डर समाज में जुर्म को रोक पाता है? क्या इसके अलावा कोई अन्य तरीका नहीं है, जिससे जुर्म को रोका जा सके? इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि मृत्यदंड का डर जुर्म कम करने में मददगार साबित होता है। ऐसा बिलकुल नहीं कि जिन देशों में मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है वहां जुर्म बढ़ गया हो। मृत्युदंड के अलावा और भी तरीके हो सकते हैं, जिनसे जुर्म को कम किया या फिर रोका जा सके। एक सभ्य समाज में मृत्युदंड जैसी अमानवीय सजा की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

मृत्युदंड के खिलाफ नारीवादी धारा का आरोप है कि यह कानून महिला एवं पुरुष के बीच समान रूप से लागू नहीं होता। किसी भी कानून को बिना जाति, धर्म, लिंग और नस्ल का भेद किए समान रूप से लागू होना चाहिए। पर बलात्कार के मामलों में अक्सर यह देखने में आता है कि आरोपी सबूत छिपाने के मकसद से पीड़िता की हत्या कर देता है। इस प्रकार मृत्युदंड लैंगिक तौर पर पुरुषसत्तात्मक हो जाता है, जोकि जुर्म रोकने के बजाय महिलाओं को मारने के लिए उकसाता है। इनका कहना है कि मृत्युदंड समाज के कमजोर तबके के लोगों के लिए ज्यादा नुकसानदायक होता है, क्योंकि उनके पास कानून के सीमित ज्ञान के अलावा पर्याप्त संसाधन भी नहीं होता, ताकि वे अपने मामले में ठीक से बचाव कर सकें। समाज का संपन्न तबका ज्ञान और संसाधन की बदौलत अपना बचाव बेहतर ढंग से कर लेता है।

अनगिनत न्यायविदों, प्रोफेसरों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बार-बार आग्रह के बावजूद भारत में मृत्युदंड के प्रावधान का समाप्त न हो पाना दरअसल हमारे संविधान में नागरिकों को दिए गए जीवन के अधिकार को मुंह चिढ़ाना है। यह जीवन का अधिकार तब तक अधूरा है जब तक कि देश के कानून में मृत्युदंड का प्रावधान मौजूद है। देखना है कि पूरी दुनिया को सत्य, अहिंसा और मानवता का पाठ पढ़ाने वाला, अपने आप को प्राचीनतम सभ्यता कहने वाला देश अपने यहां से मृत्युदंड के अमानवीय प्रावधान को कब मृत्युदंड देता है।

 

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