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पुस्तकायन: सन्नाटे को भेदते हुए

ज्योति चावला ‘शब्द वहां ज्यादा हैं जहां उनकी जरूरत नहीं है/ और जहां होनी चाहिए थी भाषा की मजबूत उपस्थिति/ वहां दूर तक फैली है चुप्पी।’ इन पंक्तियों से रचनाकार के वैचारिक तेवर का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां कवि की चिंता एक व्यापक समस्या की ओर संकेत करती है, जहां कवि यह महसूस […]

Author November 16, 2014 11:59 AM

ज्योति चावला

‘शब्द वहां ज्यादा हैं जहां उनकी जरूरत नहीं है/ और जहां होनी चाहिए थी भाषा की मजबूत उपस्थिति/ वहां दूर तक फैली है चुप्पी।’ इन पंक्तियों से रचनाकार के वैचारिक तेवर का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां कवि की चिंता एक व्यापक समस्या की ओर संकेत करती है, जहां कवि यह महसूस कर रहा है कि चीजों को वास्तव में अपनी सही जगह पर होना चाहिए। सारी मुश्किलें तभी पैदा होती हैं, जब उन्हें उनकी नियत जगह से हटा दिया जाता है। मदन कश्यप एक सजग कवि हैं। एक कवि यह बेहतर महसूस कर सकता है कि शब्दों की सही जगह क्या हो। अगर शब्द अपने नियत स्थान से इधर-उधर भटक जाते हैं, तो व्याख्याएं बदल जाती हैं, सत्य नई परिभाषा गढ़ने लगता है।

अपनी बेहद प्रगतिशील वैचारिकी से आकर्षित करने वाले कवि मदन कश्यप का चौथा कविता संग्रह है- दूर तक चुप्पी। संग्रह की लगभग सभी कविताएं विषम पंक्ति में हैं। यह इस संग्रह की विशेषता है, पर कहीं-कहीं यह इसकी कमी भी हो जाती है। अपने चयन में इतने सीमित होने से मदन कश्यप की इधर की कई अच्छी कविताएं इससे बाहर छूट गई हैं।

मदन कश्यप अपने समय पर बेहद बारीकी से नजर टिकाए हुए हैं। वे इस चकाचौंध के पीछे के सारे सच को जानते हैं, इसीलिए उनकी कविता में चमकीला झूठ अलग-अलग रूपाकारों में आता है। उनके यहां बाजार पर लिखी कई कविताएं हैं और उनमें कवि के अलग-अलग मनोभाव दिखाई देते हैं। कभी यहां कविता सच की तरह आती है, कभी विडंबना की तरह, तो कभी व्यंग्य की तरह आती है- ‘एक हाथी बेच रहा है अपनी लीद/ एक बाघ बची हुई हड्डियों और/ मांस के कुछ सड़े-गले टुकड़ों का ढेर लगाए बैठा है’। मगर जब कवि कविता में व्यंग्य कर रहा हो तो उससे उसके भीतर की बेचैनी का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

मदन कश्यप के यहां स्त्री पर भी कई अच्छी कविताएं हैं। दुख, छत पर स्त्री आदि ऐसी ही कविताएं हैं। ‘छत पर स्त्री’ कविता को पढ़ कर लगता है कि एक ही व्यक्ति कितने अलग-अलग तरीके से सोच सकता है। दरअसल, कवि के लिए हर दृश्य में एक कविता है। उसकी कवि-दृष्टि हर उस चीज पर टिक जाती है, जिसमें कविता की संभावना है। ‘अदृश्य सीढ़ी से चढ़ कर छत पर आई वह/ जो कम से कम उस शाम की सबसे सुंदर स्त्री थी’। यहां स्पष्ट है कि सुंदरता से कवि का आशय दैहिक सुंदरता से नहीं है। बल्कि शायद वे यहां कहना चाहते हैं कि स्त्री ही है, जिसने जीवन को जीने योग्य बना रखा है और जिसकी उपस्थिति मात्र से कोई बेरंग-सी शाम सुंदर हो जाती है। स्त्री जीवन को मायने देने लगती है और वह निर्जीव-सी छत भी जीवंत लगने लगती है।

 

बाजार ने तकनीक को बढ़ावा दिया है। आज मामूली से मामूली व्यक्ति मोबाइल फोन आौर इंटरनेट से जुड़ा है। और यही अभिव्यक्ति अब छन कर कविता में भी आ रही है। मंगलेश डबराल की एक बेहद खूबसूरत कविता है- ‘यह नंबर अब मौजूद नहीं है’ और उसके बाद उसी क्रम में मदन कश्यप की कविता ‘निशानी’ हमारे जीवन में इस तकनीक के प्रवेश की ओर परोक्ष रूप से संकेत करती है। मदन कश्यप की यह कविता प्रेम में प्रेमपत्रों के महत्त्व की ओर संकेत करती है और परोक्ष रूप से लगभग व्यंग्य करते हुए यह भी कह जाती है कि एसएमएस के आधुनिक जमाने में चिट्ठियों की तरह अब प्रेम को भी कोई ताउम्र तहा कर, सहेज कर नहीं रखता। बद्रीनारायण की कविता ‘प्रेमपत्र’ यहां यों ही याद आ जाती है। दोनों की तुलना करना जैसे दो विपरीत समयों की तुलना करना है। जहां बद्रीनारायण की कविता में प्रेमपत्र को बचा ले जाने की जद्दोजहद और चिंता है, वहीं मदन कश्यप की कविता में वह जिद दम तोड़ने लगती है, क्योंकि तकनीक के इस युग में प्रेमपत्रों का होना या उन्हें संभाल कर रखना संभव ही नहीं है। निशानी की पंक्तियां- ‘चिट्ठियां तो थीं नहीं कि जुगा कर रखते/ बस कुछ एसएमएस थे/ काफी दिनों तक बचे रहे/ मगर एक दिन मिटना ही था मिट गए/ हमारे समय में प्रेम कोई निशानी नहीं छोड़ता’। बाजार के इस युग में जहां कुछ भी शाश्वत नहीं है, प्रेम का भी इस तरह वस्तुकरण हो जाना, कहीं भीतर तक चिंतित करता है।

 

कोई भी रचनाकार अपनी परंपरा की ही अगली कड़ी होता है। मदन कश्यप भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं। उनकी कविताओं को पढ़ कर यह और भी बेहतर समझा जा सकता है। उनकी कविताओं में उठाए गए सवाल कोई नए नहीं हैं, फिर भी कवि उन्हें अपने समय में रख कर उन पर फिर से चिंतन करता है। जब कवि लिखता है कि ‘एक दिन खाक में मिल जाएगा अत्याचारी/ फिर भी बचा रहेगा अत्याचार/ किसी और के द्वारा होता हुआ।’ तब अनायास जेहन में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ‘भेड़िए’ कौंध जाती है और लगने लगता है कि कविता के विकास की यात्रा में शिल्प बदला, कहन बदला लेकिन चिंताएं वहीं हैं, बल्कि और गहरी ही हुई हैं।

मदन कश्यप की कविताओं में अलग-अलग मनोभाव होने के बावजूद उनका नजरिया बिल्कुल स्पष्ट है। वे मानते हैं कि व्यवस्था के खिलाफ विरोध का स्वर अवश्य उठाना चाहिए, चाहे उससे कोई बदलाव हो या न हो, क्योंकि ‘किसी भी आपदा में सबसे पहले/ और सबसे ज्यादा मारे जाते हैं चुप्पे लोग’।
एक अन्य बेहद मार्मिक कविता है ‘लिखना’। पलामू के अकाल पर लिखी यह कविता भीतर तक झकझोर देती है। इसकी छंदबद्धता इसे और मारक बना देती है- ‘लिखना/ माई के बचने की कितनी है आस/ लिखना/ आदमी से कितनी बड़ी है धरती की प्यास’। कवि पूछता है कि ‘किस जाति का किस धर्म का है यह अकाल/ भूखों को कौन थमा रहा है इंद्रजाल’। ये युद्ध, ये अकाल, ये आपदाएं सिर्फ मनुष्य की बेलगाम इच्छाओं का परिणाम हैं। अगर मनुष्य इतने संयमित हो सकें तो शायद किसी तरह की अराजकता न फैले। दुनिया को जीत लेने वाले सिकंदर को भी आखिर में क्या मिला! संग्रह की अंतिम कविता ‘सिकंदर लौट रहा है’ में कवि ने इस ओर भी संकेत किया है: ‘अपनी ही जीती हुई धरती से/ पराजितों की तरह लौट रही है विश्वविजयिनी सेना/ सिकंदर लौट रहा है/ अपनी जीत को जहां का तहां छोड़ते हुए/ पराभव और व्यथा के साथ सिकंदर लौट रहा है।’

 

कवि अपनी विचारधारा में नहीं छिप जाता, बल्कि नंगे पांव दौड़ते हुए दंतेवाड़ा की धरती तक जाता है और शहर में बैठ कर भी दंतेवाड़ा को अपने भीतर जीवित रखता है। यही एक रचनाकार से अपेक्षा की जाती है। समग्र में ‘दूर तक चुप्पी’ एक अच्छा संग्रह बन पड़ा है, जिसका उसकी अपनी छोटी कविताओं, शिल्प और विषय की विविधता के लिए स्वागत किया जाना चाहिए।

 

दूर तक चुप्पी: मदन कश्यप; वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 200 रुपए

 

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