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अप्रासंगिक: वक्तव्य का मंतव्य

आखिर वह वक्तव्य आ गया जिसका देश और दुनिया बेसब्री और बेचैनी से इंतजार कर रही थी। प्रधानमंत्री ने, पद ग्रहण करने के नौ महीने बाद कहा है कि सरकार बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक, किसी भी धार्मिक समूह को एक-दूसरे के खिलाफ घृणा फैलाने की इजाजत नहीं देगी। उसी समय वित्तमंत्री ने भी कहा कि धार्मिक […]

Author February 22, 2015 14:57 pm

आखिर वह वक्तव्य आ गया जिसका देश और दुनिया बेसब्री और बेचैनी से इंतजार कर रही थी। प्रधानमंत्री ने, पद ग्रहण करने के नौ महीने बाद कहा है कि सरकार बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक, किसी भी धार्मिक समूह को एक-दूसरे के खिलाफ घृणा फैलाने की इजाजत नहीं देगी। उसी समय वित्तमंत्री ने भी कहा कि धार्मिक सहिष्णुता भारत की परंपरा में है और नफरत के कुछ अपवादों से यह विच्छिन्न नहीं होती।

धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए, जिसकी हर सरकार उसके इस संवैधानिक वायदे की रक्षा की शपथ लेकर ही काम संभालती है, क्यों यह एक असाधारण क्षण माना गया? क्या इसलिए कि जो भारत की किसी भी सरकार के लिए अत्यंत स्वाभाविक होना चाहिए, वह इस सरकार के लिए स्वत:स्फूर्त नहीं था? पिछले छह महीने से इस सरकार के आलोचकों के अलावा इसके प्रशंसक और हितचिंतक भी मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हमलों और घृणा अभियान पर इस सरकार की चुप्पी को लेकर बेचैन थे। हालत कुछ ऐसी थी मानो पूरी दुनिया इस सरकार से एक वक्तव्य भर के लिए दुहाई दे रही हो।

वक्तव्य सरकार के दृढ़ संकल्प की अभिव्यक्ति है, इस प्रकार के विश्लेषण के बावजूद क्यों इस पर भरोसा नहीं हो रहा कि इसके बाद भारत के अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ अभियान रुक जाएगा? एक कारण इसके वक्त का है। यह माना जा रहा है कि तुरत-तुरत प्रदर्शित किए गए प्रधानमंत्री के निजी मित्र बराक ओबामा की नसीहत, जिसमें उन्होंने भारत की स्थिति को महात्मा गांधी के लिए स्तब्धकारी बताया, और दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद सरकार के पास कोई चारा नहीं रह गया था। पिछले छह महीने से सरकार समर्थक मीडिया और उद्योग जगत भी लगातार मेहनत कर रहा था कि सरकार की ओर से बस एक वक्तव्य आ जाए। इसका एक कारण सामने का बजट सत्र है। पिछले सत्र में इसी सवाल पर विपक्ष ने राज्यसभा में सामान्य विधायी कामकाज नहीं होने दिया था और ‘आर्थिक सुधारों’ के लिए जरूरी विधेयक अटक गए थे। इस बार भी विपक्ष उसी मुद््दे को उठा कर फिर राज्यसभा को बाधित करे तो ‘विकास’ दुखदायी तरीके से बाधित होगा। संपादकीय लिखे गए कि सरकार विपक्ष के पास यह बहाना न रहने दे। तो क्या यह वक्तव्य कॉरपोरेट जगत के इशारे पर विपक्ष से संसदीय प्रतिरोध के लिए बहाना छीन लेना था?

दूसरे, कोई भी वक्तव्य एक संदर्भ और परंपरा में ही अर्थ और शक्ति ग्रहण करता है। जिस वित्तमंत्री ने भारत के लिए धार्मिक सहिष्णुता को स्वाभाविक बताया, उन्होंने ही अभी दिल्ली में मतदाताओं को इमाम बुखारी के ‘फतवे’ के खिलाफ मतदान करने को कहा था। आम आदमी पार्टी के पक्ष में बुखारी के वक्तव्य को जिस तरह वित्तमंत्री और उनके दल ने फतवा कह कर प्रचारित किया और हिंदुओं को समझाने की कोशिश की कि मुसलमानों के आम आदमी पार्टी के एकजुट समर्थन के बाद उनका एकमात्र कर्तव्य भारत की एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी के पक्ष में एक-एक मत देने का ही है, वह कोशिश इतनी दयनीय रूप से सांप्रदायिक थी कि अर्णव गोस्वामी जैसे ‘राष्ट्रभक्त’ ने भी उन्हें जम कर लताड़ लगाई। यह साफ था कि बुखारी का इस्तेमाल भारतीय जनता पार्टी कर रही है। हिंदू मतदाता ने इसे घटियापन मान कर उसके झांसे में आने से इनकार किया। तो क्या हिंदू जनता खुद को हिंदू वोट बैंक बनाने की हरकतों से बेजार हो रही है?

प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर भरोसा न होने का एक कारण यह है कि इसमें भारत के हालिया यथार्थ का वर्णन भी नहीं है। भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं: शारीरिक और शाब्दिक। यह हमला कोई हिंदू धार्मिक समूह नहीं कर रहा है। मसलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिंदू परिषद कोई धार्मिक समूह नहीं है न भारतीय जनता पार्टी। मोहन भागवत ने मुसलमानों और ईसाइयों को चोरी गया हिंदू माल कहा और अपना राज आ जाने पर उन्हें वापस ले लेने को वाजिब ठहराया। उन्होंने अनेक मंचों से भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया। क्या इसके लिए सरकार उन पर मुकदमा चलाएगी? क्या प्रवीण तोगड़िया पर कानूनी कार्रवाई होगी जिन्होंने मुसलमानों को मकान न देने संबंधी भाषण दिया? उत्तर हमें पता है।

संदर्भ फौरी है और दीर्घगामी भी। व्यक्ति क्या दो सुथरे हिस्सों में खुद को बांट सकता है? यानी जब वोट लेना हो तो मुसलिम या ईसाई विरोधी सुप्त विद्वेष और घृणा को सुलगा दिया जाए? अभी साल भी नहीं गुजरा, भारत में मटर और मटन खाने वालों के अंतर पर कौन जोर दे रहा था? कौन गुलाबी क्रांति और हरित क्रांति के बीच का अंतर समझा रहा था? कौन बंगाल, बिहार और असम में चेतावनी दे रहा था कि उसके सत्ता में आते ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को बोरिया-बिस्तर बांध लेना होगा? किसने गुजरात गौरव यात्रा के समय ‘हम पांच हमारे पचीस’ कह कर मुसलमानों को लांछित किया था? किसने कहा था कि 2002 के मुसलमानों के कत्लेआम के बाद उनके कैंप उखाड़ना इसलिए जरूरी है कि गुजरात की आबादी बढ़ाने के लिए फैक्टरी नहीं चलने दी जा सकती? मुसलमान और ईसाई आबादी को क्यों भारत के लिए चिंता का विषय बताया जाता रहा है और क्यों हिंदू आबादी बढ़ाने के आह्वानों को उचित ही माना जाता रहा है?

पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ठीक ही लिखा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सत्ता हासिल करने के लिए हिंदू पहचान का आह्वान करता है और सत्तारूढ़ हो जाने के बाद उसे भारतीय पहचान में आसानी से पर्यवसित कर देता है। यह सुविधा सिर्फ उसे और उसके राजनीतिक दल को प्राप्त है। भारत में वोट के लिए हिंदू गोलबंदी क्यों नहीं दिखती और क्यों अल्पसंख्यक गोलबंदी राष्ट्र-विरोधी और सांप्रदायिक मान ली जाती है?

प्रधानमंत्री के वक्तव्य का आशय विश्व हिंदू परिषद और संघ ने क्या ग्रहण किया? उनका कहना है कि हिंदू कभी आक्रामक हो नहीं सकते और न नफरत फैला सकते हैं, इसलिए यह वक्तव्य उनके लिए है ही नहीं। फिर यह किसको लक्ष्य करता है?

एक साथ अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक उल्लेख का आशय तब समझ में आता है जब दिल्ली में गिरजाघरों और मिशनरी स्कूल पर हुए हमलों की जांच के दरम्यान दिल्ली पुलिस यह बताना जरूरी समझती है कि पिछले साल तकरीबन साढ़े तीन सौ मंदिरों में भी चोरी हुई है। इस तरह गिरजाघरों पर हमले की गंभीरता अपने आप खत्म हो जाती है।

भारत के लोगों के डीएनए में सहिष्णुता है, अर्थहीन वाक्य या जुमला भर है। इसी को दूसरे तरीके से यों कहा जाता है कि भारत धर्मनिरपेक्ष सिर्फ इसलिए है कि यहां हिंदू बहुसंख्यक हैं। इस तर्क से हिंदू स्वभावत: धर्मनिरपेक्ष होते हैं और बाकियों को इसके लिए अपने स्वभाव के विरुद्ध प्रयास करना पड़ता है।

आज का अपेक्षित बयान था कि भारत में अल्पसंख्यकों पर हमला या उनके खिलाफ घृणा-प्रचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दूसरे, प्रश्न धार्मिक समूहों का नहीं, सांप्रदायिक राजनीति का है। उस शब्द से वैसे ही बचा गया है जैसे धर्मनिरपेक्षता से बचा जाता है। आखिर कुछ महीने ही हुए जब जापान में गीता को भारत के प्रतिनिधि ग्रंथ की तरह दूसरे राज्यप्रमुख को उपहार में देने के बाद भारत की धर्मनिरपेक्ष जमात की खिल्ली यह कह कर उड़ाई गई थी कि वह प्रधानमंत्री के इस कदम से जरूर दुखी होगी। यह भी कहा गया था कि भारत के पास गीता से बढ़ कर दुनिया को देने को कुछ नहीं है।

पदग्रहण के बाद लाल किले से आह्वान किया गया कि दस साल के लिए धार्मिक हिंसा पर लोग खुद रोक लगाएं। ‘दस साल’ के लिए? हमेशा के लिए क्यों नहीं? क्या इसलिए कि उस समय प्रधानमंत्री को दस साल तक बने रहने का आश्वासन था, जिस अवधि में उन्हें फिर से हिंदू-पुरुष का अवतार न लेना होगा?

और हम हमलों का इंतजार क्यों करें? संघ और भाजपा ने इतने सालों से इतनी नफरत पैदा कर डाली है कि वह हमारी सामाजिक नसों में समा गई है। इस नफरत का शिकार मुसलिम नामधारी ही हो, जरूरी नहीं। कोल्हापुर के कॉमरेड गोविंद पंसारे की हत्या का जिम्मा कौन लेगा? विरोध सांप्रदायिक घृणा की भाषा को राजनीतिक गोलबंदी का आधार बनाने का होना चाहिए।

अंतिम बात यह कि जब शासनतंत्र ही पूरे सार्वजनिक स्थान का हिंदूकरण करने लगे तो क्या किया जाए? विश्वविद्यालय आयोग में सरस्वती की आदमकद प्रतिमा हो या माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान में नारद मुनि की या राजस्थान उच्च न्यायालय के सामने मनु की? वह क्या घृणा-प्रचार है? तो क्या भारत के खामोश हिंदूकरण की इजाजत है जिसके लिए किसी प्रत्यक्ष आक्रमण की जरूरत नहीं होगी? बेहतर हो कि विजयदेव नारायण साही को याद करें जिन्होंने सांप काटे भाई को जगाए रखने की कविता लिखी थी, अभी वह जहर के नशे में सोया कि जागना नामुमकिन होगा।

अपूर्वानंद

 

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