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मतांतर: हकीकत से उलट

दीपशिखा जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: आजकल हमारे राजनीतिक और बुद्धिजीवी तबके में स्त्रियों का पहनावा और उनकी जीवन-शैली बहस का मुद्दा बना हुआ है। कई स्तरों पर स्त्रियों के पहनावे और कुछ स्त्रियों की जीवन-शैली को लेकर मंथन चल रहा है। कभी भारतीय संस्कृति की दुहाई दी जा रही है, तो कभी बाजारवाद को कोसने […]

Author September 30, 2014 11:21 AM

दीपशिखा

जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: आजकल हमारे राजनीतिक और बुद्धिजीवी तबके में स्त्रियों का पहनावा और उनकी जीवन-शैली बहस का मुद्दा बना हुआ है। कई स्तरों पर स्त्रियों के पहनावे और कुछ स्त्रियों की जीवन-शैली को लेकर मंथन चल रहा है। कभी भारतीय संस्कृति की दुहाई दी जा रही है, तो कभी बाजारवाद को कोसने के बहाने स्त्रियों के ‘वस्त्र विचार’ के आधार पर उनके ड्रेस-कोड निर्धारित किए जा रहे हैं। कभी यौन हिंसा की बढ़ती घटनाओं को पश्चिमी मूल्यबोध का प्रभाव बता कर उसे खास नजरिए से व्याख्यायित करने की कोशिश की जा रही है। एनके सिंह को (‘भारतीय समाज की त्रिशंकु दशा’: जनसत्ता, 9 अगस्त) भारतीय समाज में होने वाली यौन हिंसाओं का कारण पश्चिमी मूल्यबोध लगता है। उनके मुताबिक इसके लिए एक खास वर्ग जिम्मेदार है, जो समाज की कथित नैतिकता का पालन न करके लिव-इन में रहता है। इसके चलते ‘अचानक बलात्कार की शिकायतें इतनी बढ़ गई हैं कि ऐसा लगने लगा है कि पुलिस के लिए कानून-व्यवस्था से बड़ा काम इन मामलों को निपटाना हो गया है।’ क्या यौन हिंसा देश की कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला नहीं है?

जो वास्तव में बलात्कार को यौन हिंसा के रूप में न देख कर एक खास दृष्टिकोण से देखने और व्याख्यायित करने की कोशिश करते हैं उन्हें यह कानून-व्यवस्था का हिस्सा नहीं लगेगा। एनके सिंह ने पूरे लेख में निचले तबके और निम्न जातियों के साथ होने वाली यौन हिंसा की अनदेखी की है। इसका कहीं भी जिक्र नहीं है कि बलात्कार की घटनाएं किस तबके की स्त्रियों के साथ सबसे ज्यादा हो रही हैं।

क्या वे बता सकते हैं कि सत्तापक्ष और अभिजात वर्ग की ओर से दर्ज कराए गए बलात्कारों का प्रतिशत यौन हिंसा की हर रोज की घटनाओं में कितना है? क्या वाकई भारत में यौन हिंसा सिर्फ सत्तापक्ष और अभिजात वर्ग तक सिमट गई है, वह भी पश्चिमी मूल्यबोध से प्रभावित होकर? लिव-इन में रहने वाली स्त्रियों द्वारा दर्ज कराए गए यौन हिंसा के मामले क्या वास्तव में इतने अधिक हैं कि भारत में रोज होने वाले बलात्कारों को पश्चिमी मूल्यबोध का प्रभाव कह कर टाला जा सके?

दूसरी बात कि कोई स्त्री किसी व्यक्ति के साथ दस साल तक रहती रही और ग्यारहवें वर्ष में वह यौन हिंसा या घरेलू हिंसा के कारण अलग होना चाहती है, तो पूरे मामले का दोष सिर्फ स्त्री के मत्थे क्यों मढ़ा जाता है? क्या इसलिए कि एक समय के बाद वह अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहारों का प्रतिकार कर और अपने वाजिब हक के लिए लड़ रही है? क्या इस पूरे मामले में पुरुष किसी भी पक्ष से दोषी नहीं है? एनके सिंह ने लिखा है: ‘‘प्रश्न यह है कि क्यों समाज या पुलिस झेले उस नारी के ‘गलत फैसले’ का दंश, जिसके तहत वह दस साल तक ‘लिव-इन’ में रहती है और ग्यारहवें साल उसे उस संबंध में बलात्कार नजर आने लगता है?’’

प्रश्न यह भी है कि आपके अनुसार बलात्कार की परिभाषा क्या है? इसकी क्या गारंटी कि किसी के साथ दस साल रह लेने के बाद वह ग्यारहवें साल बलात्कार नहीं कर सकता? अगर कोई स्त्री किसी के साथ रहने का निर्णय अपनी मर्जी से करती है तो क्या वह आजीवन उस संबंध का निर्वाह करने के लिए बंध गई है, उस परिस्थिति में भी जब वह यौन हिंसा का शिकार हो रही हो? क्या किसी संबंध में रहने वाली स्त्री को अपने खिलाफ होने वाली किसी भी तरह की हिंसा का विरोध सिर्फ इस कारण नहीं करना चाहिए कि वह एक लंबा समय उस व्यक्ति के साथ गुजार चुकी है? ये प्रश्न सिर्फ लिव-इन के संबंधों में नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक रूप से स्वीकृत संस्थागत वैवाहिक संबंधों पर भी उसी तरह से उठते हैं। इन प्रश्नों का क्या जवाब होना चाहिए!

एनके सिंह के अनुसार, ‘हमारा कानून भी सहमति पर आधारित शारीरिक संबंधों की इजाजत देता है (अगर इसमें धन का आदान-प्रदान नहीं है) और यहां तक कि विवाहेतर संबंध भी तब तक मान्य है जब तक पत्नी इसकी शिकायत नहीं करती।’ भारत की पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में सहमति पर आधारित शारीरिक संबंधों को कितने स्वस्थ रूप में विकसित होने का अवकाश है, इसे यहां का बच्चा-बच्चा जानता है। खाप पंचायत जैसी संस्थाएं और उदारता का लबादा ओढ़े उससे भी ज्यादा विस्तृत और हर स्तर पर गहरे जकड़ी जातिवादी और पुरुषवादी मानसिकता सहमति पर आधारित विवाह को तो स्वीकार करने की स्थिति में ही नहीं हैं, ऐसी परिस्थिति में एनके सिंह इन मासूम तर्कों से भारतीय समाज की किस प्रगतिशीलता को स्थापित करना चाहते हैं?

वास्तव में इस सामाजिक संरचना में बिना विवाह, सहमति पर आधारित किसी स्वस्थ और सहज शारीरिक संबंध की कल्पना करना भी बेमानी है। जहां तक विवाहेतर संबंधों की बात है, ऐसी परिस्थिति में कोई पुरुष या स्त्री अपने साथी का यह यथार्थ जानने के बाद कितना खुश और संतुष्ट रह सकता है! स्त्रियों को चरित्रहीन साबित करने का तो यह परंपरागत और सर्वाधिक कारगर हथियार रहा है। जहां तक पुरुषों की बात है, अब भी भारतीय समाज में उन स्त्रियों का प्रतिशत बहुत कम है, जो इस मामले में कानून का सहारा लेती हैं। अधिकतर सब कुछ जानते हुए भी उसी व्यक्ति के साथ रहने को अभिशप्त हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि वह कौन-सी व्यवस्था है, जो इस स्थिति में भी स्त्री को उसी व्यक्ति के साथ रहने के लिए बाध्य किए हुए है? इस मानसिक जकड़न का मूल कहां है? ऐसी स्थिति के लिए अभी तक हमारा समाज कौन-सा समांतर विकल्प विकसित कर पाया है, जहां स्त्री अपने पुरुष साथी से अलग होने के बाद सहज-सामान्य जीवन जी सके।

एनके सिंह के लेख में दो स्तरों पर यथार्थ से मुंह चुराने और अपनी कमियों को दूसरे के मत्थे मढ़ने की कोशिश की गई है। पहला, एक बड़े तबके के जीवन यथार्थ और उसके जद्दोजहद की उपेक्षा करके और दूसरा, भारत की सामाजिक संरचना में व्याप्त क्रूरता की अनदेखी करके। पूरे लेख में भारत के सामंतवादी पितृसत्तात्मक समाज के यथार्थ को छिपाने के लिए पाश्चात्य मूल्यबोध की आड़ ली गई है। क्या वास्तव में किसी स्त्री का बलात्कार काम-पिपासा को शांत करने के लिए किया जाता है?

सर्वाधिक आपत्तिजनक यह है कि एनके सिंह को कैसे मालूम हुआ कि सोलह दिसंबर की रात में लड़का-लड़की बस में प्यार या प्यार की बातें कर रहे थे? और अगर ऐसी स्थिति बनती भी है तो ऐसी जघन्य घटना को इस रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता।

इस लेख को पढ़ने से ऐसा लगता है कि भारत में ही एकमात्र ऐसा समाज है, जहां सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ। सभ्यता के साथ सामाजिक संबंधों का विकास हुआ, वरना पूरा पश्चिम बिना किसी मानवीय समाज और मानवीय मूल्य के सदियों से चल रहा है। समाज विज्ञान की किस शाखा के अध्ययन से एनके सिंह ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘पश्चिमी समाज कॉन्ट्रैक्ट (संविदा) पर आधारित रहा है, जहां न तो प्यार या ममत्व में पूर्ण समर्पण है, न ही व्यक्तिगत नैतिकता के प्रति सार्थक आग्रह।’ उन्हें यह भी मालूम होना चाहिए कि भारत ही नहीं, हर समाज में बहुत-सी संस्थाएं हजारों साल में विकसित हुर्इं और समय के साथ-साथ परिवर्तित होती रही हैं। सभ्यता को जीवित रखने के लिए यह भी जरूरी है कि परिवर्तन की दिशा मानवीय हो, न कि मनुष्य-विरोधी। जिन पुरानी रूढ़ियों के टूटने का हार्दिक दुख एनके सिंह को है, उनके मनुष्य-विरोधी स्वरूप की भी छानबीन की जानी चाहिए और इस क्रम में प्रतिगामी रूढ़ियों और प्रगतिकामी परंपराओं का फर्क भी स्पष्ट होना चाहिए।

बढ़ती यौन हिंसा का कारण न तो टूटती रूढ़ियां हैं (खासकर वैसी, जिनके टूटने को लेकर खास मानसिकता के लोग जार-जार आंसू बहा रहे हैं) और न ही समाज की वैसी त्रिशंकु दशा, जिसकी व्याख्या एनके सिंह ने की है। यौन हिंसा इस त्रिशंकु दशा की उपज नहीं, बल्कि उसका मजबूत जमीनी आधार है, जिसे भारत की सामंतवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था से खाद-पानी मिलता है। जब तक इस सामाजिक संरचना की मूलभूत मानसिकता में परिवर्तन नहीं आएगा, परिस्थितियां ऐसी ही बनी रहेंगी।

 

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