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वक्त की नब्ज़: नेहरू बनाम मोदी

तवलीन सिंह नरेंद्र मोदी की नजरों में जवाहरलाल नेहरू बहुत बड़े हीरो नहीं हैं। यह बात उनके किसी भी भाषण से मालूम हो सकती है। लेकिन पिछले हफ्ते इतने लोगों ने मोदी पर नेहरूजी की विरासत को हड़पने का इल्जाम लगाया कि उनके वारिसों को जवाब देना पड़ा। पंडितजी की 125वीं जन्मतिथि से जुड़े समारोह […]

Author November 16, 2014 13:10 pm

तवलीन सिंह

नरेंद्र मोदी की नजरों में जवाहरलाल नेहरू बहुत बड़े हीरो नहीं हैं। यह बात उनके किसी भी भाषण से मालूम हो सकती है। लेकिन पिछले हफ्ते इतने लोगों ने मोदी पर नेहरूजी की विरासत को हड़पने का इल्जाम लगाया कि उनके वारिसों को जवाब देना पड़ा। पंडितजी की 125वीं जन्मतिथि से जुड़े समारोह में सोनिया और राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नेहरूजी की विरासत को सुरक्षित रखने की शपथ दिलाई। समारोह में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष और उनके सुपुत्र ने स्पष्ट, गुस्सैल शब्दों में नेहरूजी की विरासत पर अपना अधिकार जताया।

इनकी तकरीरों से मामूल हुआ कि इनकी नजरों में इस विरासत का अहम हिस्सा है , सेकुलरिज्म। राहुलजी ने कहा कि इस सेकुलरिज्म को खतरा है उन लोगों से जो सड़कें तो साफ कर रहे हैं झाड़ू लेकर लेकिन साथ-साथ ‘जहर’ भी फैला रहे हैं भाईचारे को खत्म करने के लिए। सवाल यह है कि अगर सेकुलरिज्म की इतनी अहम जगह है पंडितजी की विरासत में तो कांग्रेस के नेता क्या कहेंगे उस हिंसा के बारे में जो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस सरकारों के होते हुए धर्म-मजहब के नाम पर फैलाए हैं। फेहरिस्त लंबी है सो इतना ही बता दें कि 30 वर्ष पहले दिल्ली शहर में सिखों के साथ क्या हुआ? जब भी यह सवाल उठता है कांग्रेस प्रवक्ता कहते हैं कि उनके नेताओं ने 1984 की हिंसा के लिए माफी मांग ली है। क्या कत्ले-ए-आम माफ किए जा सकते हैं।

मेरी अपनी राय में नेहरूजी की विरासत का सबसे अहम हिस्सा है उनकी आर्थिक नीतियां क्योंकि अब भी उनका असर दिखता है देश की अर्थव्यवस्था में, हमारी आर्थिक सोच में। नेहरूजी ने पूर्व सोवियत यूनियन से प्रेरित होकर ऐसी अर्थव्यवस्था की नींव रखी जिसके सारे कंट्रोल थे राजनेताओं और अधिकारियों के हाथों में। कारोबारियों के हाथों में नहीं। नेहरूजी ने योजना आयोग को स्थापित किया भारत की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए। किसी जमाने में इस आयोग का इतना नियंत्रण था अर्थव्यवस्था पर कि दिल्ली में तय होते थे दूर-दराज देहातों के आर्थिक फैसले।

नेहरूजी की बेटी ने उनसे प्रेरणा लेकर लाइसेंस राज कायम किया और नतीजा यह हुआ कि 1991 तक भारत की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हो गई थी कि देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। तब जाकर एक कांग्रेस प्रधानमंत्री ने लाइसेंस राज को खत्म करने की कोशिश शुरू की। ऐसा न करते नरसिंह राव तो मुमकिन है कि भारत आज भी दुनिया का सबसे गरीब देश होता। याद कीजिए कि गरीबी थोड़ी सी भी कम नहीं हुई थी नेहरूजी के शासनकाल में। इंदिराजी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा तो बुलंद किया लेकिन गरीबी कम नहीं हुई तब तक जब तक अर्थव्यवस्था में निजी निवेशकों को आने दिया आर्थिक सुधारों के तहत। तीस करोड़ भारतीय आज अगर मध्यम वर्ग में गिने जाते हैं तो उन सुधारों की वजह से।

नेहरूजी की विरासत में सबसे नाकाम नीतियां मिली हैं हमें शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में। माना कि नेहरूजी ने भारत में कई आइआइटी बनाए। लेकिन इनका लाभ मिला शहरी मध्यम वर्गीय बच्चों को। देहातों में आज भी शिक्षा का हाल यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे तकरीबन अनपढ़ रहते हैं। स्वास्थ्य सेवाएं आम जनता के लिए इतनी बदतर हैं कि छत्तीसगढ़ जैसी त्रासदी का हमें सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं में गंभीर सुधारों की जरूरत है। प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बिना कुछ नहीं होने वाला। शुरुआत उन्हें सुधारों की करनी होगी उन राज्यों में जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं।

मोदी का आर्थिक सोच नेहरूजी के आर्थिक सोच के विपरीत है। जहां नेहरूजी सब कुछ सरकार के हाथों में रखना चाहते थे वहीं मोदी बार-बार कहते हैं कि विकास और परिवर्तन तब आएगा देश में जब इन्हें लेकर जनआंदोलन शुरू होगा। पिछले सप्ताह जब वाराणसी के जयापुर गांव में गए थे तो उन्होंने गांववालों से कहा कि जब भी उनसे अपने ‘विजन’ के बारे में पूछा जाता है वे कहते हैं कि उनका कोई बड़ा विजन नहीं देश के लिए। छोटी-छोटी चीजों को वे ज्यादा अहम समझते हैं। इसलिए बातें उन्होंने की बेटियों को मां के गर्भ में न मारने की। गांववालों को राजी किया बेटियों के जन्म पर खुशियां मनाने के लिए। बातें कीं नौजवानों को विकास की यात्रा में साथ जोड़ने की।

‘पोलियो के ड्राप जब देने आते हैं सरकारी कर्मचारी तो क्यों नहीं इस गांव के नौजवान उनके साथ लग कर बच्चों को ये बूंदें देने में मदद कर सकते हैं?’ इस तरह मोदी ने याद दिलाया कि गांव की सफाई भी गांव के निवासियों की मदद से हो सकती है और पर्यावरण को बचाने का काम भी। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विकास और परिवर्तन लाने का काम सिर्फ सरकार का नहीं हो सकता है क्योंकि आम लोगों की मदद के बिना ये चीजें हो ही नहीं सकती हैं।

यह एक नई परिभाषा है, एक नए सोच की बुनियाद। नेहरूजी ने कभी इस तरह की बातें नहीं की थीं। इसलिए कि उन्हें विश्वास था सोवियत यूनियन पर जहां सारे राजनीतिक-आर्थिक फैसले कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारी किया करते थे। उस समय कौन जानता था कि सोवियत यूनियन की अर्थव्यवस्था इतनी खोखली थी कि एक दिन आर्थिक नाकामियों के बोझ के नीचे दब कर सोवियत यूनियन खत्म ही हो जाएगा। आज के दौर में अगर कोई राजनेता कहे कि हमें सोवियत यूनियन की नकल करनी चाहिए तो लोग उसे पागल समझेंगे। नेहरू की विरासत में से आज भी अगर हम ले सकते हैं कुछ तो यह कि उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थानों की हमेशा इज्जत की, उन्हें सुरक्षित रखा। ऐसा उनके वारिसों ने किया क्या?

 

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