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कभी-कभार: अनुपस्थित श्रोता

अशोक वाजपेयी दिल्ली में अंगरेजी का बोलबाला है यह तो जगजाहिर है। अलबत्ता यहां के चिकने-चुपड़े लोग जब-तब सूफियाना संगीत आदि में दिलचस्पी लेते हुए पाए जाते हैं। उनमें से ज्यादातर के बारे में आमतौर पर यह धारणा है कि वे जैसे-तैसे दौलत-जायदाद, भौतिक साधन संपन्नता आदि बटोरने में लगे लोग हैं- सत्ता और शक्ति […]

Author November 16, 2014 12:04 PM
अशोक वाजपेयी

अशोक वाजपेयी

दिल्ली में अंगरेजी का बोलबाला है यह तो जगजाहिर है। अलबत्ता यहां के चिकने-चुपड़े लोग जब-तब सूफियाना संगीत आदि में दिलचस्पी लेते हुए पाए जाते हैं। उनमें से ज्यादातर के बारे में आमतौर पर यह धारणा है कि वे जैसे-तैसे दौलत-जायदाद, भौतिक साधन संपन्नता आदि बटोरने में लगे लोग हैं- सत्ता और शक्ति के उपासक और उसके रौब में आने वाले और वे पास हों तो उनका रौब डालने वाले लोग। उनके नाज-नखरों, पोशाक और भोजन आदि की रंगीन तस्वीरें खासकर अंगरेजी के तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों में हर दिन कई पृष्ठों में छाई रहती हैं। ये लोग पांच सितारा होटलों के अलावा कभी-कभार इंडिया हैबिटाट सेंटर, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर आदि में देखे जा सकते हैं। लेकिन, वे भूल कर भी, इन सेंटरों में होने वाले बौद्धिक आयोजनों में कभी नहीं झांकते। इसलिए अचरज नहीं हुआ जब इस बार इंडिया हैबिटाट सेंटर में आयोजित भारतीय भाषाओं के वार्षिक समारोह ‘समन्वय’ में ऐसे लोग नजर नहीं आए। भारतीय भाषाओं और उसकी बोलियों से उन्हें क्या लेना-देना, क्योंकि वे अंगरेजी के नकली स्वर्ग और खाती-पीती-उड़ाती दुनिया के विश्व-नागरिक हैं।

जो सत्र मैंने देखे-सुने उनमें श्रोता बहुत कम थे। भारतीय भाषाएं बोलने वाले इतने सारे समूह दिल्ली में हैं, पर उनकी उपस्थिति भी नगण्य ही थी। क्या देश की राजधानी में रहने, उसमें अंगरेजी के बढ़ते वर्चस्व में अपनी मातृभाषाओं और बोलियों के प्रति लगाव कम हो रहा है? बड़ी संख्या में कई भाषाओं और बोलियों के लेखक आदि पढ़ने-बोलने के लिए आए थे। उनसे मिलने, उन्हें सुनने, उनसे बहस करने का बहुत आत्मीय अवसर था: उसका समुचित उपयोग नहीं हुआ, यह खेद की बात है।

सबसे अधिक दुख लगा बस्तर की बोलियों पर एक सत्र में बहुत कम उपस्थिति देख कर। बस्तर एक आदिवासी अंचल है, जिसका क्षेत्रफल कई भारतीय प्रदेशों से बड़ा है। वहां आदिवासियों के अलावा ओड़ीसा, आंध्रप्रदेश, बिहार आदि अनेक प्रदेशों के लोग बसे हैं। उसमें अनेक बोलियां हैं और उनके कुछ विशेषज्ञ और बोलियों के क्षेत्र में वर्षों से सक्रिय लोग वहां की स्थिति के बारे में बताने आए। कई नई और अप्रत्याशित बातों का पता चला। देवनागरी को बहुत वैज्ञानिक मानने वाले कई लोग यह नहीं जानते कि हलबी, गोंड़ी आदि बोलियों की कई ध्वनियां देवनागरी में ठीक से लिखी नहीं जा सकतीं। यह भी कि हलबी बोली बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में बस्तर राज्य की राजभाषा थी। बस्तर में एक-दो नहीं, तीन महाकाव्य हैं। उसका इस समय नक्सली हिंसा का लगातार कुछ दशकों से ग्रस्त होना उसकी अपार सांस्कृतिक संपदा और भाषिक विपुलता को भी क्षति पहुंचा रहा है। एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि क्योंकि आदिवासी भौतिक संपदा में बहुत मितव्ययी हैं, उनकी बोलियों में शब्द भी कम हैं। वे अपना जीवन कम भौतिक साधनों और कम शब्दों से बखूबी और पूरी सघनता के साथ बिताते हैं: बहुतायत से आक्रांत राजधानी में यह जानना कितना विस्मयकारी है कि थोड़े से भी जीवन समृद्ध हो सकता है!
सार्वजनिक सेवा और संस्कृति

जब अभिनव रंगमंडल उज्जैन ने दिवंगत राजनेता अर्जुन सिंह की स्मृति में संस्कृति के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए एक वार्षिक लखटकिया सम्मान देने का निश्चय किया तो यह तय हुआ कि यह सम्मान बारी-बारी से राजनीति और सिविल सेवा के क्षेत्रों में किसी उपयुक्त व्यक्ति को दिया जाए। पहला सम्मान केरल के भूतपूर्व शिक्षा संस्कृति मंत्री और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्यसभा सदस्य रहे एमए बेबी को दिया गया। दूसरा सम्मान हाल ही में कलाविद् और लोककला के विशेषज्ञ डॉ. ज्योतींद्र जैन को दिया गया। दोनों बार चयन समिति में ओम थानवी और मेरे अलावा क्रमश: मणिशंकर अय्यर और जवाहर सरकार थे।

दो वर्षों का आवर्त पूरा हो जाने के बाद अब यह सच्चाई दरपेश है कि देश भर में राजनीति और सिविल सेवाओं के क्षेत्र में संस्कृति के क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण और अखिल भारतीय स्तर का योगदान करने वाले इतने कम हैं कि सम्मान की विचार-परिधि को विस्तृत करते हुए यह निर्णय करना पड़ा है कि राजनीति और सिविल सेवा की शर्तें हटा ली जाएं। अगली बार से यह सम्मान संस्कृति के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य करने वाले किसी भी व्यक्ति को दिया जा सकेगा। इस उलझन से यह मुद्दा भी उठता है कि हमारे यहां संस्कृति की चिंता और उसके लिए कुछ कारगर करने वाले लोग हमारे जीवन पर लगभग प्रभुत्व रखने वाली राजनीति और सिविल सेवाओं में इतने कम, इतने उदासीन और निष्क्रिय क्यों हैं!

हमेशा ऐसी स्थिति नहीं थी। नेहरू, मौलाना आज़ाद, राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, ज़ाकिर हुसेन, हुमायूं कबीर, ईएमएस नंबूदरीपाद, किशन पटनायक, हीरेन मुखर्जी, मधु लिमये, डांगे, आदि अनेक राजनेता थे, जिनमें गहरा संस्कृति-बोध था। स्वयं अर्जुन सिंह इसी परंपरा के राजनेता कहे जा सकते हैं। आज शायद किसी भी दल के राजनेता पर संस्कृति की समझ रखने और उसके लिए कुछ ठोस करने की कोशिश करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता! यही हाल सिविल सेवाओं का है। स्वतंत्र भारत में ऐसे सिविल सेवक हुए हैं, जिनमें एसएस रंधावा, जगदीशचंद्र माथुर, बालकृष्ण राव, कपिला वात्स्यायन आदि का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने संस्कृति के क्षेत्र में कुछ ठोस किया और लोकतांत्रिक समाज में संस्कृति के विस्तार, परिवर्द्धन और संरक्षण के लिए कुछ न कुछ मूल्यवान करने की जिम्मेदारी उठाई। यह सिलसिला अब खत्म हो गया लगता है। न तो राजनीति में, न ही सार्वजनिक सेवाओं में ऐसे व्यक्ति रह गए हैं या सामने आ रहे हैं, जो संस्कृति में कुछ करने की जरूरत महसूस करते हों और जो उस दिशा में प्रयत्नशील होने को महत्त्वपूर्ण मानते हों।

दोनों ही क्षेत्रों के कर्मी अब लोकप्रियता के शिकंजे में हैं। ऐसे कई लोग हैं, जिनकी सांस्कृतिक आकांक्षा बॉलीवुड संगीत सुनने-दुहराने की होती है। अपनी काली करतूतों को किसी शाम सूफी संगीत सुन कर अपने अंत:करण को शुद्ध करने का चस्का भी बहुतों को लगा है। यह सोच कर थोड़ी दहशत होती है कि हम ऐसे मुकाम पर, अपने इस बढ़ते लोकतंत्र में, पहुंच गए हैं जहां संस्कृति सार्वजनिक सेवा से बाहर होती गई है। सत्ता का, वह भी लोकतांत्रिक सत्ता का, संस्कृति से यह विच्छेद घातक है और अनेक विकृतियां पैदा कर रहा है।
स्वतंत्रता का प्रश्न

कई बार लगता है कि स्वतंत्रता का प्रश्न अब इतना शाश्वत हो गया है कि इन दिनों कोई उसे उठाना जरूरी नहीं समझता। इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वतंत्रता बहुत व्यापक हो गई है, हालांकि उसका भूगोल प्राय: हर क्षेत्र में विस्तृत हुआ है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस व्याप्ति के बावजूद वह लगभग असंभव और अप्राप्य बनी हुई है। यह भी कहा जा सकता है कि हर युग अपनी स्थानीयता में उसे रूपायित-कल्पित करता है और हर युग में उसके मार्ग में पुरानी-नई बाधाएं आती हैं। साहित्य के संदर्भ में इसका विपुल साक्ष्य है कि वह अपनी स्वतंत्रता दी हुई मान कर नहीं चल सकता। उसके लिए संघर्ष निरंतर करना होता है। कई बार यह संघर्ष नई भाषा, नए शिल्प या नई सच्चाई के लिए होता है, पर अपने गहरे आशयों में वह स्वतंत्रता के लिए ही होता है। साहित्य के कई आंदोलन और प्रवृत्तियां किसी न किसी तरह की स्वतंत्रता के लिए ही होते हैं।

हिंदी साहित्य के मामले में स्वतंत्रता के कुछ प्रकारों का जिक्र किया जा सकता है। जब बीसवीं शताब्दी में हमने यह छूट पा ली कि कोई भी विषय साहित्य का विषय हो सकता है, तो यह एक नए तरह की स्वतंत्रता पाना था: यह ऐसी स्वतंत्रता है, जिसे हमने अब तक बनाए रखा है। दूसरी स्वतंत्रता है साहित्य की भाषा को आम बोलचाल की भाषा के नजदीक ले आने की। कुछ अंतर भले अनिवार्यत: बना रहता है, पर यह कहा जा सकता है कि साहित्य की भाषा में इस प्रयत्न ने निर्णायक परिवर्तन किए हैं। यह भी ऐसी स्वतंत्रता है, जो हम तजने या सिकोड़ने को तैयार नहीं हैं। तीसरी स्वतंत्रता है लोकतांत्रिक प्रश्नवाचकता की। अब हम हर कुछ और हर कोई को प्रश्न के दायरे में ले सकते हैं: साहित्य, व्यवस्था, राजनीति, आर्थिकी, संस्कृति, धर्म, नैतिकता, अध्यात्म आदि सब पर प्रश्न उठाने का साहस रखता है। इस प्रश्नवाचकता पर कई तरह के दबाव, अलबत्ता, लगातार पड़ते रहते हैं, पर सौभाग्य से, यह साहस कम नहीं हुआ है। चौथी स्वतंत्रता है प्रयोग की निर्भीकता की। हम जैसा चाहें वैसा प्रयोग साहित्य में कर सकते हैं: उसके लिए हमें अलग से प्रयोगशील या प्रयोगवादी होने का दावा करने या उस तरह लांछित होने की दरकार नहीं रह गई है। पांचवीं स्वतंत्रता थोड़ी संदिग्ध स्वतंत्रता है- हमें यह छूट मिल गई है कि हम ‘निरी समसामयिकता’ तक अपने को सीमित करें। यह स्वतंत्रता एक स्तर पर हमें अतीतोन्मुखी होने से बचाती है, पर दूसरे स्तर पर वह हमें अपने ही समय में महदूद करती है, जबकि मनुष्य साहित्य जैसे परिसर में समय के पार जाने की क्षमता और आकांक्षा रखता आया है। यह नितांत समसामयिकता हमें कई बार अपनी जातीय स्मृति से भी वंचित करती है। छठवीं स्वतंत्रता है कल्पना की: वह बेरोकटोक साहित्य में कहीं भी जा सकती है। साहित्य यों तो हमेशा से कल्पना की रंगभूमि रहा है- बहुत सारे सच कल्पना से ही उपजते और आकार लेते हैं। पर हमारे समय में कल्पना को नई दिशाओं के उद्दीप्त करने और नए रूपाकार गढ़ने के अवसर बहुत बढ़ गए हैं।

पर कोई भी स्वतंत्रता अबाध नहीं होती: स्वतंत्रता कई स्तरों पर बढ़ी है, तो उस पर लगने वाली बंदिशें, सामने आने वाली बाधाएं भी बढ़ती रही हैं।

 

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