ताज़ा खबर
 

पुस्तकायन: उन्माद के साए में

जीवन एक नदी के समान है, जिसमें प्रवाह जरूरी है। जब भी इसकी राह में धर्म, अंधविश्वास, महत्त्वाकांक्षा, कुंठा, क्षोभ के अवरोध आते हैं, जीवन में सड़ांध भर जाती है। नदियों की गंदगी को साफ किया जा सकता है, पर जीवन को कैसे स्वच्छ बनाएं! आखिर क्यों हम अपने संकीर्ण सोच के आगे नहीं बढ़ […]
Author May 3, 2015 16:08 pm

जीवन एक नदी के समान है, जिसमें प्रवाह जरूरी है। जब भी इसकी राह में धर्म, अंधविश्वास, महत्त्वाकांक्षा, कुंठा, क्षोभ के अवरोध आते हैं, जीवन में सड़ांध भर जाती है। नदियों की गंदगी को साफ किया जा सकता है, पर जीवन को कैसे स्वच्छ बनाएं! आखिर क्यों हम अपने संकीर्ण सोच के आगे नहीं बढ़ पाते? क्यों हम सही राह नहीं चुन पाते? किस वजह से हमारी संवेदनाएं समाप्त होती जा रही हैं? इंसान हैं, पर इंसानियत कहीं नहीं। प्रेमी हैं, पर प्रेम कहीं नहीं। सच कहना है, पर सुनने का सामर्थ्य नहीं। आधुनिक बनते-बनते क्या खो रहे हैं, इसका अहसास हमें नहीं है। कुछ ऐसे ही उत्तेजक विचार मज़्कूर आलम के कहानी संग्रह कबीर का मोहल्ला को पढ़ते हुए होता है। वे समस्या के मूल पर जिस लहजे में विचार करते हैं, वह बेहद प्रभावी है। आज के दौर और सामाजिक विचारधारा का सटीक वर्णन उन्होंने किया है।

इन कहानियों में आधुनिक समाज की अलग-अलग समस्यायों पर विचार किया गया है। स्त्री-विमर्श, सामाजिक सरोकार, धार्मिक संकीर्णता, नकारात्मक सोच, वर्ग-संघर्ष आदि प्रसंग इसमें उभरते हैं। इससे स्पष्ट है कि मज़्कूर आलम में सामान्य घटनाओं से असाधारण कथानक के निर्माण की कुशलता है।

‘और फिर परिवार’ एक महत्त्वाकांक्षी लड़की की कहानी है, जो अपने लक्ष्य के लिए सरल, पर गलत रास्ता चुनती है। आखिरकार महत्त्वीकांक्षा का मकड़जाल उसे अपनी घिनौनी गिरफ्त में ले लेता है। कहानी का आरंभ यह आभास कराता है कि वह अपनी सफाई दे रही है, लेकिन सच यह है कि उसे अहसास होता है कि स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता का आचरण तात्कालिक सुख तो देता है, पर सब कुछ खोखला कर देता है। अपने परिवार की नजरों से गिरने की तकलीफ मारक होती है। सुख-साधन पाने की अंधी दौड़ में मतिभ्रमित किशोरियां इतना खो जाती हैं कि स्वच्छंदता की चाशनी में घुला जहर पी जाती हैं। देह से ऊपर उठते हुए अपने अस्तित्व का भान होना ज्यादा जरूरी है।

‘बस यहीं तक’ मर्मस्पर्शी कहानी है। धर्म का सही अर्थ क्या है? जब तक हम अपने सहयात्री का नाम और मजहब न जानें तब तक आत्मीयता के सोते हृदय से फूटते रहते हैं और जानने के बाद बोझिल अहसास! मज़्कूर आलम ने यही सच उद्घाटित किया है। हुसैन अली जब तक अपने विचार ‘सहयात्री’ के तौर पर व्यक्त करता है तब तक वह सामान्य इंसान बना रहता है। ‘इंसान’ से ‘कौम’ तक का सफर दर्दनाक हो जाता है। धर्म या संप्रदाय से मनुष्य को तौलने वालों का सामाजिक समीकरण सूक्ष्म अन्वेषण द्वारा इस कहानी में वर्णित है।

‘छलात्कार’ में स्त्री के भाग्य की विडंबना यानी छलना पर विचार किया गया है। कभी प्रेम, कभी परिवार, तो कभी मर्यादा के नाम पर उसके अस्तित्व की बलि दी जाती है। उसके विचार और भावनाएं किसी के लिए मायने नहीं रखते। पत्नी और मां बनते ही सामंतवादी सोच के दायरे में उसे जीना पड़ता है। इस इंद्रजाल को तोड़ना उसे कुलटा, बदचलन आदि संबोधन देता है। जब स्त्री द्वारा ही स्त्री का शोषण होता है, तो यह ‘छलात्कार’ सिद्ध होता है, जो बलात्कार जितना ही मारक है।

‘दिग दिगंत की कथा’ में लोगों द्वारा अफवाह फैलाने के शौक का उल्लेख है। भूसे के ढेर को जलाने के लिए चिंगारी ढूंढ़ना जरूरी है, उसी तरह किसी के चरित्र को कलंकित करने के लिए दोष खोजे जाते हैं। अगर न मिले तब भी अविश्वास से ‘कैसे मैनेज करना होगा’ जैसी छींटाकशी करने से लोग बाज नहीं आते। पचहत्तर वर्षीय एकाकी वृद्धा से जुड़े अच्छे प्रसंगों पर चर्चा के बजाय लोगों की दिलचस्पी उसके चरित्र के मूलोच्छेदन में थी। ऐसी-वैसी कोई घटना न होने पर व्यक्त आश्चर्य समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘कबीर का मोहल्ला’ में समाज की संवेदनहीनता और अनदेखी की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य है। लेखक ने धर्म की आड़ में संभावित अफवाहों के आधार पर दंगे कराने वाले गंदे सोच का विरोध किया है। यह कहानी संदेश देती है कि धर्म और मजहब में विश्वास होना अच्छी बात है, पर आंखों के होते हुए भी अंधे बन जाना, कान होते हुए भी बहरा बन जाना, मुख होते हुए भी गूंगा बन जाना और अपने विवेक का प्रयोग नहीं करना, गलत है। मोहल्लेदारी के आपसी प्रेम पर धर्म और जातीयता का हावी होना सिद्ध करता है कि हमने इंसान बनने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं की है। इंसानियत के जज्बे से हम कोसों दूर हैं। मीडिया के समाचार बनाने के तरीके, राजनीतिक उकसावे और तिकड़मों को तीखे व्यंग्य के साथ मज़्कूर ने प्रस्तुत किया है।

‘यात्रा’ में दिलचस्प किस्सागोई है। मंजिल तक के सफर में घटित घटनाएं अकस्मात हमारे सोचने का तरीका बदल देती हैं। अच्छा होने का दिखावा करना और अच्छा इंसान होना वाकई अलग-अलग मसले हैं। हम दिखावे के जाल में फंस कर अच्छाई को नजरअंदाज करते हैं। स्त्री को लेकर ‘तथागती सोच’ और सामान्य सोच का अंतर बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है।
‘लेकिन ए रेयर आॅफ द रेयरेस्ट नहीं’ एल्बीलिज्म पीड़ितों में एकाकीपन से उपजे दुख और संताप को व्यक्त करती है। इस रोग को लेकर समाज में व्याप्त गलतफहमियां कभी भी इन्हें सामान्य इंसान-सा जीवन नहीं जीने देतीं, अगर ये लोग बीमारी स्वीकार कर लें तो बहिष्कार के शिकार हो जाते हैं और न बताए तो रंग के मसले पर अलग-थलग पड़ जाते हैं। इनकी उलझनें कोई नहीं समझता वे भी सामान्य जीवन जीने के अधिकारी हैं, तो क्यों उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है? यह कहानी प्रीति की ही नहीं, उसके जैसे कई उपेक्षितों की है कि जिन्हें ‘आफताब’ नहीं मिलते, जो उनकी जिंदगी बदल दें।

‘त्रिशंकु’ का कथानक भी ‘…लेकिन ए रेयर..’ से मिलता-जुलता है, पर यहां मजहब भी हावी है। एल्बीलिज्म और विधर्मी होने का दंश वसीम उसी प्रकार भुगतता है, जैसे त्रिशंकु ने स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य अटक कर भुगता था। जिस्म के जख्म भर सकते हैं, पर रूहानी जख्म लाइलाज होते हैं। वसीम का दिल जिस अपनत्व के लिए जार-जार रोता रहा, वह उसे न मिला, नतीजतन वह कुंठित होता गया। यही कुंठा उसे बेचैन कर देती है कि आखिर उसका कसूर क्या है?

‘पानीदार’ में जल की समस्या है। पानी की कमी और उसके लिए होने वाले संघर्ष की बानगी यह कहानी देती है। पैसे वाले तो खरीद कर अपनी प्यास बुझा सकते हैं, पर मजदूर वर्ग क्या करे? पानी पर राजनीति और उसका बेनतीजा होना यह दर्शाता है कि पूंजीहीन वर्ग के लिए जीवन जीना संघर्षपूर्ण है। उसकी समस्या सेमिनार, राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों और सुधारकों के लिए ‘चिंतन’ का सबब हो सकती है, पर ‘चिंता’ का नहीं।

इन कहानियों में ज्वलंत विचारों के साथ विद्रोह के अंगारें भी हैं, जो हृदय को दग्ध कर देते हैं। भाषा और भावों में सरलीकरण का लेखक ने ध्यान रखा है, सामाजिक समस्याओं का क्षेत्र विस्तारित बनाए रखा है, संकुचित नहीं होने दिया है। आलम ने कथानकों के चयन में कई ऐसे समसामयिक विषयों को चयनित किया है, जिनकी ओर समाज का नजरिया उदासीन है, जो चिंता का विषय है। मज़्कूर आलम की कहानियां इस उदासीनता पर प्रश्नचिह्न लगाती हुई चिल्ला-चिल्ला कर दिल-दिमाग पर पड़े जड़ता के ताले को तोड़ने का पूरा प्रयास करती हैं, क्योंकि इन तालों की चाभी उदासीनता की नदी में कहीं बह गई है। इसलिए वैचारिक हथौड़े की चोट से ही चैतन्यता का द्वार खुल सकता है।

मुक्ता खन्ना
कबीर का मोहल्ला: मज़्कूर आलम; वाणी प्रकाशन, 4695, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 275 रुपए।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.