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दक्षिणावर्त: वह छुटकी-सी माताराम

तरुण विजय जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: वह नाराजगी और गुस्सा। वह चिड़चिड़ापन और ‘मैं न मानूं’ का अतिरेकी बालहठ। जब मन में आए सोना, और जब मन माने उठना। देर रात तक अम्मा को जगाए रखना कि पता नहीं कहां गया है- फोन तक नहीं करता, खाना घर आकर आएगा या खाकर ही आएगा। लौटने […]

Author September 30, 2014 11:34 AM
तरुण विजय

तरुण विजय

जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: वह नाराजगी और गुस्सा। वह चिड़चिड़ापन और ‘मैं न मानूं’ का अतिरेकी बालहठ। जब मन में आए सोना, और जब मन माने उठना। देर रात तक अम्मा को जगाए रखना कि पता नहीं कहां गया है- फोन तक नहीं करता, खाना घर आकर आएगा या खाकर ही आएगा। लौटने पर मन-मन भर की कड़वी बातें सुनना- तू यहां आता ही क्यों है, दिल्ली रहा कर या देहरादून में कोई दूसरा घर बना ले। इतना दौड़ता है, मिलेगा क्या! और फिर धीरे से बताना- हलवा बना रखा है, इत्ती मेहनत से बनाया था।

सब छूट गया। अब नाराज होना हो तो हो लो। हमारी बला से। कोई मनाने नहीं आएगा। उलहना अलग होगा- घर के लिए कुछ किया नहीं, अब इस उम्र में नखरे बढ़ रहे हैं। रात दो बजे सोए, तो भी चार बजे उठना होगा, छह बजे का विमान पकड़ने के लिए। दुख हो, अवसाद हो, दुविधा हो, मन उदास हो तो किससे बाते करें? किसे फुर्सत है आपके लिए वक्त निकालने की?

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बेटी को है।

अब, उम्र के इस उतार पर, अंधेरों की दहशत में, अहसास हुआ कि मां बेटी में अवतरित हो जाती है। यह कहना मेरे लिए तो नामुमकिन है कि अम्मा नहीं रहीं। अभी पहला श्राद्ध करके लौटा हूं। साल बीत गया। पर श्राद्ध को असली अर्घ्य, तर्पण का वह स्पंदित और रोमांचित करने वाला पुण्य तो श्रेयांस कमा गए। क्या पुस्तिका निकाली। मैं छोटा लगने लगा। मुनव्वर राना और शिवओम अंबर ने अम्मा को जाने नहीं दिया।
पर फोन किसे करूं?

मेरी बेटी मुझे हमेशा छुटकी ही लगी। वही जो तब थी जब मेरी गोद में ही सोती थी। पापा की बेटी। शायद पंद्रह साल पहले अटलजी के जन्म दिन पर मेरी गोद में गई थी, उन्हें फूलों का गुलदस्ता देने। अटलजी बहुत खुश हुए, सामने खड़े हो गए। छुटकी के हाथों में फूल था, पर पता नहीं किस बात से गुस्सा आया कि फूलों का गुलदस्ता देने से मना कर दिया। अटलजी बार-बार कहें- अरे फूल दो बिटिया और वह मुंह फुलाए न गोद से उतरी और न ही फूल हाथ से छोड़ा। तब खड्ग सिंह थे, प्रसिद्ध छायाकार। उसके मुंह फुलाए चेहरे और अटलजी सामने खड़े फूल मांग रहे हैं- वह चित्र खींच लिया- ब्लैक ऐंड वाइट।
ऐसी है वह छुटकी। मन में न आए तो दुनिया इधर से उधर हो जाए, पर उत्तरी ध्रुव खिसेकगा नहीं।
अब तो बड़ी हो गई है। ऊंची पढ़ाई कर रही है। चीनी भाषा भी सीख रही है। उसके मन में सब कुछ जमा होता रहता है- कहती नहीं। हम कहे बिना रह नहीं सकते।

बेटी कब मां का रूप हो जाती है, पता ही नहीं चलता। जिनके बेटियां नहीं, वे कितने वंचित रहते हैं जिंदगी भर।

मुझे मालूम है, उसे बार-बार फोन किया जाना पसंद नहीं, पर मुझे यह भी मालूम है कि जब बंद दीवारों में दम घुटे तो उसे फोन किए बिना भी गुजारा नहीं। उसकी परिपक्वता, तनाव में भी शब्द संयम और खुद को दर्द में धकेलते हुए भी भरोसा दिलाना- ‘कोई बात नहीं पापा, सब ठीक हो जाएगा, मैं बात करूंगी’, मुझे फिर से जिंदगी दे जाता है। यह करूं न करूं, वहां बात करूं न करूं? शाम को फार्मल रिसेप्शन है, क्या पहनूं? खुद को लल्लू राम और उसे अपनी दादी बनाने में जो सुख है वह और कहां?

पर हम बेटियों को मानते कहां हैं? खुद हजार गलत काम करेंगे, पर बेटी के देरी से घर पहुंचते ही तन जाते हैं- बेटी ने अपनी पसंद का लड़का ढूंढ़ लिया तो गंड़ासे चल जाते हैं, जहर खिला देते हैं। ये नवरात्रों में देवी पूजन करने वाले ही सबसे ज्यादा बेटियों पर जुल्म करते देखे जाते हैं। बेटी का रिश्ता हथेली पर तुलसी उगाने, जौ से देवी पूजन करने, हिमालय होने से भी बड़ा है। सिर्फ बेटियां हैं, जो पिता को झिड़क भी सकती हैं, उनकी बात पलट सकती हैं, प्रतिवाद कर सकती हैं। पर उन्हें बेटी मानें तब न ऐसा होगा! बेटी तो बोझ है, डर है, पराई है, संभाल कर रखने वाली अमानत है, डोली में बिठा कर बैंड-बाजे में विदा करने वाली धरोहर है, उसका तो कन्यादान होना होता है।

पुत्रदान क्यों नहीं होता? वह जो आलसी होगा, आवारा होगा, घर में बैठेगा नहीं, गलत संगति में होगा, बड़ा होकर मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आएगा, कभी कुंभ या तीर्थ नहीं कराएगा, वह बेटा प्रिय सिर्फ इसलिए होगा, क्योंकि अंत्येष्टि के वक्त एक ठो आग देने वाला चाहिए?
बेटी के पैदा होते ही पहला वाक्य क्या सुनने में आता है- अमूमन ऐसा ही हमने सुना है- ‘चलो कोई बात नहीं, बेटी भी लक्ष्मी होती है। ईश्वर ने चाहा तो अगली बार बेटा होगा।’

ईश्वर ने चाहा तो अगली बार बेटा होगा। इस बार बेटी हुई है, कोई बात नहीं। अफसोस तो है, पर क्या करें?

चलो नवरात्रों में व्रत रखें। देवी की पूजा करें। नवरात्रों में कन्यापूजन होता है। पूजा तो असल में बेटी की ही होती है, पर उसे मां मान कर पूजा करते हैं। पूजा, धीरे-धीरे, अब सिर्फ मनौतियां पूरी कराने का व्यापार हो गई है। बेटी तो गायब हो गई। कन्या जिमाते हैं, घर पर बुला कर पूरी हलवा, सब्जी, पकवान खिलाते हैं। दक्षिणा भी देते हैं, घर आने पर अपने हाथों से कन्या के पांव धोते हैं। पर उसमें बेटी नहीं, मां भी शायद कुछ कम, सिर्फ अपनी मनोकामना पूरी करने वाली दैवी उपस्थिति ही देखते हैं। हे मां, हे जगदंबे, हमारी बहू के अगली बार बेटा हो। दो बेटियां आ गई हैं। अब बस भी करो।
हे मां, हे जगदंबे, बहुत संकट है, नौकरी, तरक्की, शादी, विदेश यात्रा, झगड़े सब सुलझा दो।

मांगते तो बेटी से ही हैं। घर के सुख-दुख, मां-पिता के दुख-दर्द, घर के त्योहार, शादी-ब्याह में बेटी ही काम आती है। वह न हो तो ढोलक की थाप नहीं, शिव-पार्वती के गीत नहीं, भजन नहीं, मां के साथ रसोई में शादी के बाद भी घर आकर हाथ बंटाने वाला नहीं, शगुन में कित्ते पैसे किसे देने हैं, इसकी सही सीख देने वाला नहीं, छत पर उग आए पौधों और झरती दीवार का पलास्टर देख दुखी हो उसे ठीक कराने वाला नहीं।

बेटा नौकरी लगते ही अमेरिका, कनाडा या लखनऊ, दिल्ली जाएगा- मां तो घर पर अकेली ही रहेगी। बैंक खाते में बेटा पैसा भेज भी देगा तो वह पैसा लाने वाला उससे तीरथ, दवा या बाजार करने वाला कौन? फोन पर घंटों बतियाती तो सिर्फ बेटी ही है। अनुपस्थिति में भी उपस्थिति का सजल अहसास कराती सिर्फ बेटी ही है।

पति-पत्नी आपस में बात नहीं करेंगे, तो सेतु बेटी बनती है, वह मां को भी डपट सकती है, पिता को भी। उससे नाराज होने की हिम्मत किसी में नहीं हो सकती। जो बेटी न मांगे, जो बेटी से नाराज हो, उससे बढ़ कर अभागा और कौन होगा?

अम्मा गर्इं, तो मेरी बहन मां की जगह स्वत: ले बैंठीं। मेरी बेटी अब भी पढ़ाई करते हुए, हजार मील दूर से घर देखती है। हमारी सुबह उससे होती है, शाम का सुरमई अंधेरा उसकी बातों से, दिन भर के कामकाज के लेखे-जोखे, क्या हुआ, क्या खाया, कौन आया, किसने गड़बड़ की, यह सब साझा करने के बाद ही दिन पूरा होता है।

वह सुनती है।
अम्मा चित्रकूट, कर्वी बहुत जाती थीं। वहां सब उसके पास आते, माताराम, हमारी सुन लीजो। बेटियां भी माताराम की तरह सुनना जानती हैं। बाकी सब सिर्फ बताने की जल्दी में होते हैं।

 

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