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प्रसंग: दायित्वहीन आनंदवाद

प्रभु जोशी इन दिनों ‘किस ऑफ लव’ मीडिया की सुर्खियों में है। प्रतिरोध की यह प्रविधि भारतीय समाज के लिए थोड़ी नई है। हिंसा का बदला हिंसा या घृणा के बजाय सहिष्णुता से देने का प्रावधान तो गांधीजी ने यह कह कर दिया था कि आप अगला तमाचा खाने के लिए अपना दूसरा गाल उसके […]

Author November 16, 2014 12:21 PM

प्रभु जोशी

इन दिनों ‘किस ऑफ लव’ मीडिया की सुर्खियों में है। प्रतिरोध की यह प्रविधि भारतीय समाज के लिए थोड़ी नई है। हिंसा का बदला हिंसा या घृणा के बजाय सहिष्णुता से देने का प्रावधान तो गांधीजी ने यह कह कर दिया था कि आप अगला तमाचा खाने के लिए अपना दूसरा गाल उसके आगे कर दें। लेकिन, इसमें गाल तमाचा खाने नहीं, चुंबन के लिए आगे किया जा रहा है। गाल भी हिंसा करने वाले के लिए नहीं, अपने मित्र के लिए। हो सकता है, चुंबन चुनाव के समय कपोल के बजाय अन्य स्थल चुन ले- सारा हंगामा इसी प्रेम प्रदर्शन की प्रविधि को लेकर है। हालांकि, इसमें ऐसा धरा-कंप जैसा कुछ भी नहीं है। न ही ऐसा जो कि निंदा या भर्त्सना का बायस बने। फिर जब बलात्कार या हत्या जैसे जघन्य कृत्य सड़कों पर निर्द्वंद्व हो रहे हैं, तब प्रेम जैसे पवित्र कर्म को बंद कमरे में कैद करके क्यों रखा जाए!

ऐसा क्यों है कि प्रेम पर ही पहरे और पाबंदियां लगाने को उतारू हैं, कुछ लोग। प्रेम व्यक्तिगत मामला है और मनुष्य का मौलिक अधिकार भी। इस पर रोक लगाना व्यक्तिगत-स्वतंत्रता का अपहरण ही है। बहरहाल, जिन लोगों ने युवक-युवतियों के प्रेमालाप के स्थल पर तोड़-फोड़ की हिंसक कार्रवाई की, निश्चित ही वह अन्यायपूर्ण है और उसके लिए कानून के अंतर्गत कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और फासीवाद की ओर बढ़ने की सूचना है।

पंद्रह-बीस बरस पहले समाज में आंदोलन किसी असंतोष से जुड़े होकर किसी सामाजिक-आर्थिक विचार की कोख से जन्म लेते थे, लेकिन भारत में जैसे ही उदारवाद का प्रवेश हुआ, आंदोलन खत्म हो गए। यहां तक कि मजदूर आंदोलन भी। आंदोलन की जगह उत्सव ने ले ली। एक नया आनंदवाद आविष्कृत हुआ और उसने हर किस्म के प्रतिरोध का उत्सवीकरण शुरू कर दिया। ऐसे उत्सवीकरण की मीडिया में भी कवरेज की निर्विघ्न सुविधा बनने लगी। स्वतंत्रता की परिभाषा और दायरा तो बदला ही, ‘स्वतंत्रता’ की मांग स्वयं में ‘जश्न’ बन गई। नतीजन, ‘किस आॅफ लव’ विरोध का जश्न है, जिसका मीडिया के लिए व्यावसायिक मूल्य है और यही उसके सरोकार का सार भी।

कहना न होगा कि स्वतंत्रता शब्द के बारे में जितना भ्रांत चिंतन बाजारवादी-ग्लाबिस्टों ने पिछले कुछ वर्षों में युवा पीढ़ी के बीच फैलाया है, वह विचारणीय है। उन्होंने वस्तुओं के उपभोग और चयन को ही ‘स्वतंत्रता’ का पर्याय बना दिया। साथ ही उसने एक ऐसे ‘अनुकरणवाद’ को जन्म दिया, जिसके चलते ‘मिथ्या-सामूहिकता’ का सर्वग्रासी भ्रम तैयार हो गया। व्यक्ति स्वातंत्र्य जैसा विचार इतना अधिक बाजार के अधीन हो गया कि किसी भी युवक को अगर वांछित वस्तु नहीं मिली कि उसकी आजादी संकट में पड़ गई।

वह अपने वस्तु-सापेक्ष जीवन को ही स्वतंत्रता मानने लगा। जूता, घड़ी, मोबाइल, बाइक ने उसकी कामना का मानचित्र गढ़ा। निश्चय ही इन तमाम चीजों के कारण और इनके साथ ही प्रेम प्राप्ति भी संभव हुई। अगर ये नहीं, तो प्रेम की संभावना ही शून्य। प्रेम की आजादी पर चीजों ने संकट बढ़ाया। प्रेम की परिभाषा बदली और वह विनिमय के नए क्षेत्र में प्रवेश कर गया। आंखों ही आंखों वाले दिन लद गए। अब ‘सिम टू सिम’ है, जिसमें रिचार्ज का खर्च। घूमना है तो बाइक भी अनिवार्य। प्रेमालाप का भूगोल भी बदल चुका है। वह शहर की भग्न इमारतों के बजाय रेस्तरां और मल्टीप्लैक्स की सीटों पर होता है। वह सामूहिकता के बीच निर्विघ्न ढंग से संभव है। कुल मिलाकर हकीकत यह है कि सामूहिकता के बीच निर्भीकता से खुलते-खिलते प्रेम से ही संस्कृतिवादियों को आपत्ति हो रही है।

अब प्रश्न है कि ‘किस आॅफ लव’ की भर्त्सना क्यों हो रही है? और क्यों होनी चाहिए? हमारे युवा हृदय सम्राट प्रधानमंत्री तो अब 2014 में जाकर पश्चिम को कह रहे हैं कि ‘कम ऐंड मेक इन इंडिया’। वे भारत के आर्थिक-निर्माण के लिए उन्हें बुला रहे हैं। जबकि, हमारे इस आर्यावर्त के ‘सामाजिक जीवन’ के निर्माण के लिए तो बीस साल पहले से आर्तस्वर में पुकारा जा रहा था कि ‘तुम फिर से आओ और हमें सभ्य बनाओ। तुम आओ और हमें खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने और प्यार करने के नए तरीके सिखाओ।’ कहने की जरूरत नहीं कि मीडिया और फिल्मों ने हमारी युवा पीढ़ी को वह सब सिखा दिया है, जिसके लिए हमारे युवा बरसों से बेताब थे। अब वे अपने मध्यवर्गीय-घर के पारिवारिक सदस्य नहीं, ‘मार्केट फ्रेंडली इंडिविजुअल’ हैं। वे संबंध निरपेक्ष जीवन सीखने के लिए आगे आ चुके हैं। ‘ताबड़तोब’ और ‘अभी, बिलकुल अभी’ उनकी सैद्धांतिकी है।

वे उतावली में हैं। उनकी इच्छा, आकांक्षा, सपने सभी कुछ घर से बाहर और बाजार में हैं। वे सही अर्थों में ‘मुक्त अर्थव्यवस्था’ की कोख से जन्मी संस्कृति के सिरजनहार हैं। वे ‘परिवार में प्राइवेसी चाहते हैं, जो इस मध्यवर्ग में संभव ही नहीं है। इसलिए अब वह घर इनके लिए एक यातना शिविर है। परिवार अब भी उसी दकियानूस शिकंजे में फंसे हुए हैं, जहां घर की लड़की अपने बॉयफ्रेंड को या लड़का गर्लफ्रेंड को अपने घर में रात को पनाह नहीं दे सकता। जबकि प्रेम का आधिक्य कभी का बढ़ चुका है। वह इकतरफा नहीं रह गया है। पुरानी दुरवस्था से बाहर आ चुकी है, यह पीढ़ी। वह संशयग्रस्त नहीं है, विकल्पों की प्रचुरता ने प्रेम को उसकी दुस्साध्यता से बाहर निकालने में क्रांतिकारी मदद की है।

प्रेम की पुरानी ‘पवित्रता की वचनबद्धता’ भी निश्शंक होकर सिरा दी जा चुकी है। कौमार्य के कर्फ्यू का कुटिल कठघरा ध्वस्त हो चुका है। प्रेम शब्द अपनी परिभाषाओं के वैविध्य से सिर भेड़ता हुआ, बदल गया है। सेक्स भी अपनी गोपनीयता सूचक अर्थ से बाहर आ गया है। वह ‘एकांत’ नहीं, अनेकांत में है। कहने की जरूरत नहीं कि टेलिविजन सीरियल और सिनेमा ने तो शयनकक्ष को कभी से चौराहे पर खोल दिया है।

जो लोग कहवाघरों या रेस्तराओं में वर्जनाहीन प्रेम को देख कर अपने सांस्कृतिक क्रोध का अराजक विस्फोट कर रहे हैं, वे नए अंधत्व से घिरे हैं। उन्हें भारतीय युवा के बारे जानकारी ही नहीं है कि वह कहां-कहां और किन-किन शिखरों को छू चुका है।

अब विडंबना यह है कि हमारा अंगरेजी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बार-बार ‘प्रेम’ और ‘स्वतंत्रता’ शब्द का जाप करता हुआ पूरे प्रकरण की पैरवी कर रहा है। जबकि, वह इन शब्दों के खोखलेपन को बखूबी जानता है। वे चर्चा करते हुए इन दोनों शब्दों के उदात्त अर्थ की स्थापना करते हैं, जबकि स्वतंत्रता शब्द एक गंभीर और जोखिमपूर्ण शब्द है। गांधी कहते थे कि ‘स्वतंत्रता शब्द को बोलते हुए हमें थोड़ा भयभीत और चिंतित होना चाहिए। क्योंकि, स्वतंत्रता का अर्थ, अब सब कुछ होने या घटने की जिम्मेदारी और जवाबदेही अपने मत्थे ले लेना है। क्योंकि, उसके पीछे कर्तव्यों की एक लंबी शृंखला आपकी प्रतीक्षा करती हुई खड़ी है।’

मगर हम एक ऐसे आंदोलित समय की सुरंग में हैं, जिसमें कर्तव्यों से रूबरू होना बर्दाश्त नहीं है। अगर प्रेम को ही कर्तव्य के खाते में डाल दिया जाए तो सब हाथ झाड़ कर खड़े हो जाएंगे। तुरंत तिलांजलि दे देंगे, प्रेम को। क्योंकि किस आॅफ लव का संदर्भ उठाते हुए, प्रेम और स्वतंत्रता की जिस ‘उदात्त अर्थ’ की आड़ में मीडिया पैरवी कर रहा है, वे अपने आप में इतने शाश्वत और सार्वभौमिक मूल्य हैं कि अगर यह पीढ़ी इन्हें अपने आसली आशयों के साथ अपना ले, तो हमारे आने वाले समय और समाज में ही क्रांतिकारी उलट-फेर हो जाए।

इसलिए हकों के लिए तो आंदोलन खड़े होते हैं, कर्तव्यों के लिए कतई नहीं। यह काम सिर्फ गांधी करते थे। बहरहाल, ‘किस आॅफ लव’ दायित्व की दारुणता से मुक्त आनंदवाद का आंदोलन है, जो किसी गहन वैचारिकी से नहीं, बल्कि एक निरे अनुकरणवाद की कोख से जन्मा है। मनोरंजनग्राही मीडिया उसके दोहन के प्रबंधन में प्रवीण रहा है। कहना न होगा कि आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेम ‘रतिहीन’ नहीं है और उसकी स्वतंत्रता की मांग पूरी तरह दायित्वहीन है। यह पश्चिम की मनोरंजक प्रतिरोध प्रवृत्ति है, जो मीडिया का महाभोज बनती है।

 

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