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अभिमत: अभिव्यक्ति और समाज

फ्रांस में पत्रकारों पर हुए हमले ने भारत में भी कुछ दिन के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल को केंद्र में ला दिया। भारत के समाचारपत्रों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इस विषय पर जो चर्चा हुई वह सतही और एकपक्षीय थी। इस चर्चा में वह पक्ष प्रस्तुत किया गया, जो वर्तमान सरकार के पक्ष […]

Author February 22, 2015 2:48 PM

फ्रांस में पत्रकारों पर हुए हमले ने भारत में भी कुछ दिन के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल को केंद्र में ला दिया। भारत के समाचारपत्रों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इस विषय पर जो चर्चा हुई वह सतही और एकपक्षीय थी। इस चर्चा में वह पक्ष प्रस्तुत किया गया, जो वर्तमान सरकार के पक्ष को मजबूत करता था। पश्चिम के देशों ने अपना लोकतंत्र चर्च या राजशाही से मुक्त होकर बनाया है इसलिए वहां व्यक्ति की स्वतंत्रता इतनी व्यापक है कि उसमें किसी को आहत करने की स्वतंत्रता भी शामिल है। कभी भारत में भी यह स्वतंत्रता थी। कबीर की तरह राजसत्ता और धार्मिक पाखंड को ललकारने वाले संत और अनल हक कहने वाले फकीर देश के हर कोने में मौजूद थे।

अभिव्यक्ति को बाधित करने वाले कानून हमारे यहां पहली बार 1837 में बनाए गए थे जब मैकाले ने भारतीय दंड संहिता बनाई थी। जब देश आजाद हुआ तो संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के अंतर्गत हमें अभिव्यक्ति का अधिकार दिया। देश का दुर्भाग्य देखिए कि संविधान लागू होने के पंद्रह महीने के भीतर ही इसमें कई धाराएं जोड़ कर इसे सीमित कर दिया गया। ये धाराएं ऐसी हैं, जो स्वयं में स्पष्ट नहीं हैं। जैसे, कोई भी अभिव्यक्ति जिससे देश की शांति-व्यवस्था या नैतिकता पर विपरीत प्रभाव पड़े या मित्र देशों के साथ संबंधों पर असर पड़ता हो, उस अभिव्यक्ति को बाधित किया जा सकता है। आइटी एक्ट की धारा 66 (ए) को इसीलिए लचीला छोड़ा गया है जिससे किसी भी अभिव्यक्ति को उसके अंतर्गत समाहित करके बाधित किया जा सके।

पेरिस में पत्रकारों की हत्या और वहां की सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के निर्बाध अधिकार के पक्ष में खड़े होने पर, हमारे देश के नेताओं ने लगभग एक स्वर में कहा कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निर्बाधित नहीं हो सकती। उस पर बंधन लगाना जरूरी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन लगाने का समर्थन करने वाले लोगों ने यह एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि वे उस प्राचीन परंपरा के वारिस हैं जिसमें कहा गया है कि मैं ब्रह्म हूं और तू भी ब्रह्म है और हम सब में वही ब्रह्म समाया हुआ है। जिसमें आत्मा और व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना गया है। व्यक्ति पर देश और धर्म के बंधन स्वीकार कर हम एक ओर जहां तानाशाही शासन की ओर बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर धर्म और उसकी भावना को व्यक्ति से ऊंचा स्थान देकर, अपने देश को अंध-धार्मिकता की ओर धकेल रहे हैं। इस दोनों से ही हमारा लोकतंत्र आहत होता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में राज्य को सबसे ज्यादा भय, धार्मिक भावनाओं के आहत होने से लगता है। इसकी आड़ में वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करना चाहता है। अविभाजित भारत के इतिहास में, 1927 में लाहौर में प्रकाशक राजपाल को धार्मिक भावना कथित रूप से आहत करने वाली एक पुस्तक के प्रकाशन के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। लंबी कानूनी कार्यवाही के बाद 1929 में उन्हें रिहा कर दिया गया, क्योंकि तब तक कोई ऐसा कानून ही नहीं था जिसमें धर्म के अपमान को अपराध माना गया हो।
एक अध्ययन में पाया गया है कि वास्तव में लोग आहत नहीं होते, उनके नेता बताते हैं तो वे आहत होते हैं। ये नेता बिल्कुल नहीं चाहते कि प्रत्येक व्यक्ति विवेकवान बने और अपने विवेक से निर्णय ले। ये लोग उसे धर्म या समुदाय के रूप में संबोधित करते हैं और बताते हैं कि उसका अस्तित्व खतरे में है। वे ऐसा अपनी शक्ति बढ़ाने या शक्ति प्रदर्शित करने के लिए करते हैं।

भारतीय संविधान में प्रेस और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं हैं; जो नागरिक के अधिकार हैं वही मीडिया के हैं। यह मीडिया बाजार से संचालित होता है। मीडिया वह दिखाता-छापता है जिसकी अनुमति संपादक, संचालक या मालिक देता है। जिसको यह पसंद नहीं है वह नौकरी छोड़ कर जा सकता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुने जाने का अधिकार भी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को पाने के लिए, आप न्यायालय की शरण में जाएंगे। वहां आपके आवेदन को एक नंबर दे दिया जाएगा, फिर अपने अधिकार के लिए बरसों-बरस अदालत के चक्कर काटते रहिए। ऐसे अधिकार और स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? जब कोई गरीब कर्ज तले दब कर आत्महत्या करता होगा तो उसने अपनी बात (अभिव्यक्ति) किसको नहीं कही होगी? भूख और कर्ज से आत्महत्या करने वालों की न तो कोई आवाज है और न ही उसे कोई सुनने वाला है।
यूरोप और अमेरिका के बाजार में आप सलमान रुश्दी की किताबें खरीद सकते हैं, लेकिन भारत में नहीं खरीद सकते। भय के इस वातावरण में तमिल लेखक मुरुगन अपनी सभी प्रकाशित पुस्तकें वापस लेने की घोषणा करता है। राजनीति शास्त्र की एनसीइआरटी की किताबों से हम दशकों पुराना शंकर का बनाया हुआ कार्टून हटवा देते हैं, क्योंकि उससे किसी सांसद की भावना आहत हो रही थी! बसपा नेता शान से पेरिस में पत्रकारों के हत्यारों को इक्यावन करोड़ रुपए देने की घोषणा करते हैं। पुलिस उनके खिलाफ मुकदमा दायर नहीं करती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यह बताते हैं कि पेरिस की यह घटना अफगानिस्तान और इराक में निर्दोष मुसलमानों के मारे जाने की प्रतिक्रिया है।

सऊदी अरब ने अभी ‘ईशनिंदा’ पर ब्लॉगर रईफ बदवी को दस वर्ष की कैद और एक हजार कोड़े बीस सप्ताह तक मारने की सजा सुनाई और उसमें से पचास कोड़े नौ जनवरी को लगाए गए। पूरे विश्व ने इस घटना की निंदा की, लेकिन हमारी जबान नहीं खुली। हमारी सरकार ब्रिटेन का वैध वीजा होने के बावजूद ग्रीनपीस की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई को ब्रिटेन जाने से हवाई अड््डे पर रोक लेती है, क्योंकि वे ब्रिटेन के सांसदों को भारत में एक खनन परियोजना से स्थानीय लोगों पर पड़ रहे असर के बारे में बताने जा रही थीं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुने जाने के अधिकार के लिए जिन लोगों को उसके पक्ष में खड़े होना चाहिए, जैसे समाज के धार्मिक नेता, विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, देश के प्रबुद्ध नागरिक, पत्रकार, वकील आदि, वे सब इस अतिक्रमण पर खामोश हैं। उन्होंने व्यक्ति के अधिकारों से अधिक महत्त्व राज्य के अधिकारों को दे दिया है। दूसरी ओर राज्य है, जो अपने लिए सबको कुचलता हुआ आगे बढ़ जाना चाहता है।

 

अशोक उपाध्याय

 

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