Editorial: Experience Doab - Jansatta
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पुस्तकायन: अनुभव का दोआब

सुपरिचित कवि लीलाधर मंडलोई उन कवियों में हैं जिनके गद्य में भी कविता जैसा प्रवाह है। ‘दिल का किस्सा’ और ‘दाना पानी’ में हम उनके गद्य का वैभव देख चुके हैं। वाचिक और चाक्षुष माध्यमों से जुड़े रहने के कारण उनके रेखाचित्रों, डायरियों, संस्मरणों और यहां तक कि आलोचनात्मक मूल्यांकनों में भी उनकी वाचिक अदायगी […]

Author February 22, 2015 2:34 PM

सुपरिचित कवि लीलाधर मंडलोई उन कवियों में हैं जिनके गद्य में भी कविता जैसा प्रवाह है। ‘दिल का किस्सा’ और ‘दाना पानी’ में हम उनके गद्य का वैभव देख चुके हैं। वाचिक और चाक्षुष माध्यमों से जुड़े रहने के कारण उनके रेखाचित्रों, डायरियों, संस्मरणों और यहां तक कि आलोचनात्मक मूल्यांकनों में भी उनकी वाचिक अदायगी चर्चा से ओझल नहीं की जा सकती। कवि का गद्य भी मंडलोई के गद्य के ऐसे ही आबदार नमूनों से भरा है जहां उनके पठन-पाठन और स्मृति की व्यापक परिधि का साक्षात्कार किया जा सकता है। कविता से मंडलोई का मिजाज दोस्ताना है तो गद्य की किसी भी कोशिश को वे भाषा को पाने के उपक्रम के रूप में ही लेते हैं। प्रचलित परंपरा के अनुसार वे भी गद्य को कवियों की कसौटी मानते हैं और गद्य की विविध विधाओं की छह पुस्तकों के बावजूद यह कहने से नहीं हिचकते कि मैं लगातार उस भाषा में लौटता रहा जो मुझे जानती थी।

एक कवि का काम प्राय: गद्य के बिना चल सकता है पर गद्य तो कवि का निकष है। पहले ही निबंध ‘आरजू है कि तुम इधर देखो’ लिखते हुए वे यह जताते हैं कि मंडलोई को समझना है तो उसे उसके मूल से पहचानना होगा। उसकी भाषा और कविता में जो खुरदुरी चमक है, जो भूमिगत तल्खी है, जो अपनी जगह-जमीन से विस्थापित, बहरियाये हुए मजदूरों की पीड़ा और दो जून की रोटी के सवाल हैं, उनके पैदा होने की क्या वजह है यह जानना होगा। क्योंकि वह उस शोषण का गवाह रहा है जहां कोयले के भंडारों पर बड़े धन्नासेठों की नजर टिकी रही है और जो भूगर्भ में समाए खनिज भंडार के सौदागर ही नहीं, आदिवासियों के मौलिक अधिकारों को क्षत-विक्षत करने के कुटिल सूत्रधार भी रहे हैं। मंडलोई ने कोयला-खनन में लगे, अभावों और कुपोषण में जीने की जद््दाजहद करते ऐसे ही लोगों और मजूर बस्तियों के बीच उन तकलीफों को नजदीक से देखा-भोगा और उसे अनुभूति से बाहर भाषा की काया में गढ़ने की लगातार कोशिशें की हैं। इसलिए जब वे कहते हैं कि ‘मैं अंतिम उपेक्षित-वंचित और शोषित मनुष्य को अपनी भाषा में रचने को प्रतिबद्ध हूं’ तो इससे उनके लिखने का प्रयोजन स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है।

‘कुछ धुंधली रेखाएं: कुछ चित्र’ के केंद्र में वे ज्ञानरंजन, फजल ताबिश, वेणु गोपाल, सुदीप बनर्जी, सत्येन कुमार, इंद्रमणि उपाध्याय, हरि भटनागर को रखते हैं। सुरैया, मीना कुमारी और मधुबाला को भी। वे व्यक्तियों की खूबियों का यों बखान करते हैं जैसे वे मनुष्य के गुणसूत्रों की परख कर रहे हों। चहेते कथाकार ज्ञानरंजन के निकट वे श्रद्धा से नहीं संशय से जाते हैं और पाते हैं कि ज्ञानरंजन एक ही समय में इतने गझिन और सहज हैं कि चौकन्नी आंखों से भी पकड़ पाना न केवल मुश्किल बल्कि असंभव है। पर उनका कान का कच्चा और कुछ मामलों में भावुक होना उन्हें तकलीफ दे जाता है।

फजल ताबिश भोपाल की जैसे अदबी पाठशाला थे, जिनकी सोहबत में जो-जो गुजरा, कुछ सीख कर ही गया। और यहां केवल फजल ताबिश की शायरी पर ही नहीं, लगे हाथ उस पूरे परिवेश का जायजा मंडलोई लेते हैं जो मोहब्बत में पोशीदा रही है। यह उनकी शायरी का ही कमाल है कि उनका एक शेर दिल को छू गया तो मंडलोई ने अपनी एक किताब का नाम ही रख दिया: ‘दिल का किस्सा’, जो उनके गद्य की एक बेहतरीन मिसाल है। वेणु गोपाल कवियों में एक वक्त प्रतिरोध की मिसाल थे। ‘वे जो हाथ होते हैं’ और ‘चट्टानों का जलगीत’ जैसी काव्यकृतियों के बाद हाल ही दखल प्रकाशन ने उनका एक संग्रह ‘और ज्यादा सपने’ छापा तो वे फिर चर्चा के केंद्र में आए। मृत्युपर्यंत असाध्य शारीरिक तकलीफों के बावजूद उनकी जिंदादिली का ग्राफ हमेशा ऊपर रहा। मंडलोई ने उनके बारे में लिखा है कि ‘वह एक आदमकद इंसान और कविता में कभी-कभार पैदा होने वाला एक नायाब कलंदर था। ऐसे लोग कभी मर नहीं सकते।’

ऐसे ही विरल कवि सुदीप बनर्जी थे, हिंदुस्तानी जबान के कवि, जिन्हें काल असमय इस दुनिया से छीन ले गया। पर जो उनकी सोहबत में रहे हैं वे मंडलोई की इस तहरीर से इत्तिफाक न रखेंगे कि कुरूपताओं से भरी इस दुनिया में वे मनुष्यता की दुर्लभ ऊंचाइयों पर पहुंचे एक संत-सरीखे थे। मंडलोई उनके बारे मे लिखते हैं कि ‘वे असाध्य रोग से लड़ते हुए भी अपनी बातों की चमक को मद्धिम न होने देते थे।’

मंडलोई की खासियत है कि वे जिस कलाकार, कवि या लेखक पर लिखते हैं, डूब कर लिखते हैं। कभी-कभी उनकी संवेदना की स्याही इतनी करुणा-कातर हो उठती है कि पढ़ते हुए उनके शब्द-सामर्थ्य की दाद देनी पड़ती है। दूसरी बात यह कि वे ऐश्वर्य का वरदान हासिल करने वालों पर नहीं, अकिंचन, अलबेले और विरल इंसानों पर लिखते हैं, जो लेखक या कलाकार चाहे जैसे हों, मनुष्यता के मामले में उनका कोई सानी नहीं होता। उनके सारे व्यक्तिचित्र इतने सुगठित हैं कि इन्हें पाठ्यक्रमों में रखा जाए तो मनुष्यता को पहचानने की सीख विद्यार्थियों को मिले। सत्येन कुमार पर दर्ज इबारत का एक अंश देखिए: ‘उन महफिलों में मोहब्बत और नफरत एकदम पारदर्शी थी। हवा हरदम बहुत हल्की कपासी। और आसमां धूप वाला था। बसंतों वाले उस ठिए में। उसके प्यार में बसंत की धूप थी गुनगुनाती-गुनगुनी।’ कविताई से भीगा हुआ गद्य। हरि भटनागर, जिनके बेशक सौ दुश्मन भोपाल में हों, पर मंडलोई को प्यारे हैं तो हैं। इतनी अच्छी प्रोफाइल कि हरि की शराफत का यह एक उम्दा प्रमाणपत्र है। उन्हें इससे कम में आंकना मुश्किल है। सुरैया, मीना कुमारी और मधुबाला क्रमश: सादगी, आवाज और सुंदरता की प्रतिमूर्ति थीं, जिनकी आवाज और सौंदर्य की ऊष्मा को मंडलोई ने कम शब्दों में सही, पुरअसर ढंग से आंका है।

किताब में कुछ पुरानी यात्राएं हैं, जिन दिनों वे अंडमान रहे, उन दिनों की स्मृतियां। समुद्र का साहचर्य। इसी तरह पिछले जन्म का-सा अहसास दिलाती रूस की यात्रा, जब वे पुश्किन-सम्मान के लिए वहां रह रहे कवि अनिल जनविजय के मेहमान बने होंगे। आज से कुछ साल पहले मास्को में 23 फरवरी से 8 मार्च तक बिताए वे दिन उनकी नींद में स्वप्न की तरह चमकते हैं और ऐसी यात्रा में पग-पग पर अनिल जनविजय साथ हों तो कहना ही क्या। बिला नागा लिखी गई मंडलोई की उन दिनों की डायरी रूस के मानस, भूगोल, संस्कृति और लोगों को समझने में बहुत मदद करती है। मंडलोई ने यहां अनिल जनविजय के कठिन समय को भी अपनी चेतना की छन्नी से छान कर देखा है और एक पियानोवादकयहूदी कलाकार के साथ त्रासद व्यवहार से दुखी भी दिखते हैं। कलाकार के पास बाहर के मुल्कों में काम हैं, पर वहां जाने तक के लिए आर्थिक हालात गवाही नहीं देते। शुरू में ही वे बताते हैं कि मास्को में तीन चीजों का महत्त्व नहीं बदला, जिधर देखो फूल हैं, किताबें हैं और वोदका। पर इस सब के बावजूद बदले हुए रूस के हालात को पढ़ लेने वाली मंडलोई की कवि-दृष्टि कितनी चौकन्नी और संवेदी है, यह वृत्तांत पढ़ते हुए पता चलता है।

फुरसत के क्षणों के लघु संस्मरणों के साथ यहां कुछ गंभीरता और गहन अध्यवसाय के साथ शमशेर, मोहन राकेश, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, ऋतुराज, सत्यजित राय और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर लिखे निबंध भी मौजूद हैं। हिंदी और उर्दू के दोआब के कवि शमशेर तो जैसे उनकी रचनात्मकता की रगों में रचे-बसे हैं। उनकी कविताई अपनी अलग पहचान रखती हुई भी शमशेर की कविता से दीक्षा लेती हुई सी दिखती है। अचरज नहीं कि उनका मानना है बिना इस दोआब के भारत तो बन सकता है, हिंदुस्तान नहीं। राकेश को उनके नाटकों के आईने में मंडलोई ने विश्लेषित किया है। केदारनाथ सिंह की कविताओं को पढ़ते हुए वे उस लंबी टेर की ओर याद दिलाते हैं जो भोजपुरी और ग्रामीण संवेदना और खड़ी बोली तथा नागर संवेदना के द्वंद्वात्मक सहकार से पैदा होती है। ऋतुराज की कविताओं में उन्हें आज की परिस्थितियों से लड़ने के विचार मिलते हैं। सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के माध्यम से सेल्यूलाइड पर फिल्म के प्रदर्शन से लेकर उसकी नाट्य-प्रस्तुति की बारीकियों की चर्चा वे इस माध्यम के करीब रहते हुए करते हैं। इसी क्रम में कई कवियों शरद कोकास, मनमोहन और सुकांत भट्टाचार्य के संग्रहों, विश्वनाथ त्रिपाठी की गद्यकृति ‘नंगा तलाई का गांव’ पर उन्होंने टिप्पणियां लिखी हैं। ये टिप्पणियां उन्होंने किसी आलोचक के रुतबे से नहीं, एक रसज्ञ के रूप में लिखी हैं। खतो-किताबत के तहत उन्होंने अनीता वर्मा, प्रेमचंद गांधी, कुमार वीरेंद्र, निरंजन श्रोत्रिय, मोहन कुमार डहेरिया, मनोहर बाथम और राजकुमार केसवानी की कविताओं पर लिखा है और डायरी के रूप में कुछ स्मृति-कथाएं भी।

मंडलोई मुख्यत: कवि और आलोचक हैं। वे ‘निरा आंसू नहीं, निष्कर्ष’ के कवि हैं। इसलिए इस कृति में उन्होंने उन कवियों को ही अपने निबंधों और टिप्पणियों के केंद्र में रखा है जिनके व्यक्तित्व में परदुखकातरता और कृतित्व में अगाध मनुष्यता भरी है।

ओम निश्चल
कवि का गद्य: लीलाधर मंडलोई; शिल्पायन प्रकाशन, वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली; 300 रुपए।

 

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