Editorial: Dent in history - Jansatta
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निनाद: इतिहास में सेंध

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन और व्यक्ति इतिहास को केवल किस्सा-कहानी मानने के अभ्यस्त हैं। प्राचीन इतिहास के बारे में उनके द्वारा प्रचारित किस्से-कहानियों से अब सभी अच्छी तरह परिचित हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष वाइ सुदर्शन राव, इनके लिए रामायण और महाभारत की […]

Author February 22, 2015 3:00 PM

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन और व्यक्ति इतिहास को केवल किस्सा-कहानी मानने के अभ्यस्त हैं। प्राचीन इतिहास के बारे में उनके द्वारा प्रचारित किस्से-कहानियों से अब सभी अच्छी तरह परिचित हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष वाइ सुदर्शन राव, इनके लिए रामायण और महाभारत की घटनाएं वास्तविक हैं, उन्हें पूरा यकीन है कि प्राचीन भारत में ऐसे विमान थे जो अन्य ग्रहों की यात्राएं कर सकते थे, और गणेश का हाथी का सिर इस बात का प्रमाण है कि हजारों साल पहले भी भारत में प्लास्टिक सर्जरी संभव थी। राव ने 2007 में लिखे अपने एक ब्लॉग में ठीक वही विचार व्यक्त किया था जो अभी कुछ ही दिन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने व्यक्त किया है। इन महानुभावों का मानना है कि जातिव्यवस्था में मूलत: कोई दोष नहीं था। उसमें जो भी विकृति आई वह मुसलमान आक्रांताओं के कारण आई और उनके कारण ही अछूत पैदा हुए। क्योंकि इन सब बातों का संबंध सुदूर अतीत से है, इसलिए इन पर बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश हो भी सकती है। लेकिन अब मोहन भागवत ने एक ऐसा दावा कर डाला है जिसका संबंध महज कुछ दशक पुराने इतिहास से है और जिसे पचाना किसी के लिए भी संभव नहीं।

समस्या यह है कि संघ के पास अपने महापुरुष नहीं हैं। संस्थापक सरसंघचालक हेडगेवार और उनके उत्तराधिकारी माधवराव सदाशिव गोलवलकर उसके सबसे कद््दावर प्रतीक पुरुष हैं। लेकिन वृहत्तर भारतीय समाज में उनकी व्यापक स्वीकार्यता नहीं है। क्योंकि अंगरेजों के विरुद्ध चले स्वाधीनता संग्राम से संघ ने खुद को दूर रखा, इसलिए उसके पास राष्ट्रीय स्तर के ऐसे नेता नहीं हैं जिनकी जनमानस में गहरी पैठ हो। इस समस्या का हल संघ ने दूसरों के नेताओं को अपना बना कर पेश करने की रणनीति में ढूंढ़ा है। यह रणनीति बहुत कामयाब नहीं हो सकती, क्योंकि पिछली एक सदी के इतिहास को विकृत करना इतना आसान नहीं। लेकिन संघ और उसकी अनेक संततियों में से एक भारतीय जनता पार्टी ने इस दिशा में प्रयास करना नहीं छोड़ा है। हाल ही में जिस तरह से महात्मा गांधी और सरदार पटेल पर अपना हक जताने की कोशिश की गई है, उसी की कड़ी में अब दलित विचारक और नेता भीमराव आंबेडकर को भी अपना बताने की कोशिश की जा रही है। इस संबंध में यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अक्सर प्रमाण देने की कोई कोशिश नहीं की जाती- मसलन, बिना कोई प्रमाण दिए यह कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने संघ के एक शिविर का निरीक्षण करने के बाद संघकार्य की प्रशंसा की थी- और यदि कोई प्रमाण दिया भी जाता है तो उसकी प्रामाणिकता ही संदिग्ध होती है।

इस सिलसिले में दिवंगत कृष्णलाल शर्मा का स्मरण हो रहा है, जो भाजपा के महासचिव हुआ करते थे। दिसंबर, 1990 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को एक पत्र लिख कर कहा था कि अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए महात्मा गांधी द्वारा सुझाए गए फॉर्मूले पर अमल किया जाना चाहिए। अपने पत्र में उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा 27 जुलाई, 1937 के ‘हरिजन सेवक’ में लिखे एक लेख के दो पैराग्राफ भी उद्धृत किए और कहा कि उन्होंने स्वयं इस पत्रिका का यह अंक देखा है। लेकिन बाद में पता चला कि इस तारीख को ‘हरिजन सेवक’ का कोई अंक छपा ही नहीं था। दरअसल, हुआ यह था कि 1949 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्तियां प्रकट होने की घटना से जुड़े एक व्यक्ति रामगोपाल पांडेय शरद ने 1950 में प्रकाशित अपनी पुस्तिका में इस तथाकथित लेख को उद्धृत किया था, लेकिन तब उन्होंने इसे 27 जुलाई, 1937 के ‘नवजीवन’ में प्रकाशित बताया था। तथ्य यह है कि ‘नवजीवन’ का प्रकाशन 1932 में ही बंद हो चुका था और ‘हरिजन सेवक’ में ऐसा कोई लेख कभी नहीं छपा। यहां इस घटना का उल्लेख करने का उद्देश्य सिर्फ यह दिखाना है कि तथ्यों का सम्मान संघ की परंपरा में शामिल नहीं है।

अब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दावा किया है कि बाबासाहेब आंबेडकर संघ की विचारधारा में यकीन रखते थे और उन्होंने संघ कार्यकर्ताओं को सामाजिक एकता और अखंडता का प्रतीक बताया था। उनका हिंदू धर्म की विचारधारा में विश्वास था और वे चाहते थे कि भारत का राष्ट्रध्वज भगवा और राष्ट्रभाषा संस्कृत हो। जिन्हें भी आंबेडकर के बारे में कुछ जानकारी है, उनके लिए संघ प्रमुख के इस दावे पर यकीन करना उतना ही मुश्किल है जितना इस पर यकीन करना कि प्राचीन भारत में ऐसे यान थे जो अन्य ग्रहों तक आसानी से जा सकते थे, या ऐसे मिसाइल थे जो अन्य ग्रहों तक भी मार कर सकते थे। यह दावा एक ऐसे समय आया है जब संघ एक बार फिर सामाजिक इंजीनियरिंग करने की कोशिश कर रहा है। इसके पहले उसने एक गंभीर कोशिश तब की थी जब पिछड़ी जाति के कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाया था या जब उसने भारतीय जनता पार्टी के जरिए बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में मदद दी थी। अब उसने पिछड़ी जाति के ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाया है और बिहार में दलित जीतनराम मांझी को समर्थन दिलवा कर भाजपा की दलित समर्थक छवि उभारने की कोशिश की है।

लेकिन सच्चाई क्या है? सभी जानते हैं कि आंबेडकर दलितों को हिंदू समाज का अंग नहीं मानते थे। महात्मा गांधी के साथ उनका विवाद इसीलिए हुआ था, क्योंकि वे दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र और मतदान की मांग कर रहे थे। उनका प्रसिद्ध वाक्य है कि ‘मैं हिंदू धर्म में पैदा जरूर हुआ हूं, लेकिन इसमें मरूंगा नहीं’। और, अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले वे हजारों दलितों के साथ बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए थे।

आंबेडकर जाति उत्पीड़न की जड़ में ‘ब्राह्मणवाद का जहर’ देखते थे। 1927 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जला कर खलबली मचा दी थी। 1936 में आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘जाति का संहार’ में स्पष्ट शब्दों में लिखा था: ‘हिंदू जिसे धर्म कहते हैं वह अनेक निर्देशों और निषेधों के सिवा कुछ नहीं है…इसमें आदर्शों के प्रति निष्ठा नहीं, केवल कुछ निर्देशों का पालन करना जरूरी है…मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि ऐसे धर्म को नष्ट हो जाना चाहिए।’ बाद में भी आंबेडकर के विचारों में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं आया जिससे उनका हिंदू धर्म के प्रति झुकाव झलकता हो। इसलिए संघ प्रमुख का यह दावा कि आंबेडकर हिंदू धर्म में विश्वास करते थे और संघ कार्यकर्ताओं को सामाजिक एकता और अखंडता का प्रतीक समझते थे, यकीन करने लायक नहीं लगता।
इसी तरह की किस्से-कहानियां मैंने दो जनवरी, 1993 को तब सुनी थीं जब विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय में रामजन्मभूमि आंदोलन के एक प्रमुख नेता और अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी मुक्तानंद सरस्वती ने एक संवाददाता सम्मेलन करके तिरसठ पृष्ठों की एक पुस्तिका जारी की थी जिसमें भारत के भावी संविधान की रूपरेखा दी गई थी। तब उन्होंने यह अविश्वसनीय कहानी सुनाई थी कि जब संविधान का मसविदा (जिसे आंबेडकर की अध्यक्षता में बनी समिति ने तैयार किया था) राजेंद्र प्रसाद के पास पहुंचा तो उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। वे तभी हस्ताक्षर करने पर राजी हुए जब पंडित नेहरू ने उन्हें यह आश्वासन दे दिया कि बाद में इसे बदल दिया जाएगा। स्वामी मुक्तानंद सरस्वती द्वारा जारी संविधान की रूपरेखा में आरक्षण के लिए कोई जगह नहीं थी, अल्पसंख्यकों को कोई विशेष अधिकार नहीं दिए गए थे, गोहत्या पर प्रतिबंध और समान नागरिक संहिता की बात कही गई थी। और यह सब हिंदू धर्म का नाम लेकर किया और कहा जा रहा था। क्या आंबेडकर की इस सब से सहमति हो सकती थी? दूसरों के नायकों और प्रतीक पुरुषों को जबर्दस्ती अपना बता कर संघ क्या हासिल करना चाहता है?

 

कुलदीप कुमार

 

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