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पुस्तकायन: आलोचना के वैज्ञानिक औजार

रमेश दवे जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: प्रसिद्ध आस्ट्रियन दार्शनिक विटगेन्स्टाइन ने ‘द इनर’ नाम से अभ्यंतर का विचार रचा, जो बताता है कि मनुष्य का अपना एक अभ्यंतर है। यह अभ्यंतर भी दो प्रकार का है- स्वाभाविक जीवनानुभूतियों से भरा और दूसरा उन अनुभूतियों की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति का पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु ने अपनी पुस्तक सर्जनात्मक […]

Author October 8, 2014 10:18 AM

रमेश दवे

जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: प्रसिद्ध आस्ट्रियन दार्शनिक विटगेन्स्टाइन ने ‘द इनर’ नाम से अभ्यंतर का विचार रचा, जो बताता है कि मनुष्य का अपना एक अभ्यंतर है। यह अभ्यंतर भी दो प्रकार का है- स्वाभाविक जीवनानुभूतियों से भरा और दूसरा उन अनुभूतियों की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति का पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु ने अपनी पुस्तक सर्जनात्मक काव्यालोचन: अभ्यंतर का उद्घाटन में सर्जन में अभिव्यक्ति के अभ्यंतर की स्थापना की है।

वैसे कोई भी भाषा वैज्ञानिक नहीं होती, जिसका तर्क-विश्लेषण हो, क्योंकि भाषा स्वायत्त और स्वेच्छाचारी होती है। इसलिए कभी वह कम बनाती है, तो कभी कम खंडित कर सर्जना की नई चुनौती बन जाती है। हिंदी की साहित्यिक आलोचना का व्यावहारिक पक्ष केवल कलापक्ष और भावपक्ष तक सीमित रह कर सौंदर्यानुभूति, संयुक्त संवेदनात्मक और आस्वादात्मक रहा है, लेकिन भाषा की सूक्ष्ममतम प्रवृत्तियों का अन्वेषण आलोचना कम ही कर पाई है। ध्वनिम, रूपिम्, शब्द-गुण, वाक्य-पद, व्याकरणीय-विचलन, विखंडन के आधार पर किसी भी रचना में भाषा के संगीत, भाषा के नाद, भाषा के रूप-चित्र आदि की ओर आलोचक इसलिए नहीं जाते कि उनके भाषावैज्ञानिक ज्ञान की कुछ सीमाएं हैं। भाषा में सर्जन है और सर्जन ही शैली है। यह शैली ही सर्जन का अभ्यंतर है।

यह अभ्यंतर, शैली में कैसे व्यक्त हुआ, व्यंजित या लक्षित हुआ, उसका संपूर्ण शल्य ही तो शैलीविज्ञान करता है। शीतांशुजी ने इस पुस्तक के जरिए शैलीविज्ञान क्यों और क्या के प्रश्न नहीं उठाए, बल्कि शैलीविज्ञान के आधार पर सर्जनात्मक कृतियों का सूक्ष्म विवेचन किया है।

शैलीविज्ञान भाषा की आंतरिक छवियों का प्रत्यक्षीकरण है। शीतांशुजी ने इसलिए रचना को शैलीविज्ञान की कसौटी पर कसा। वे प्रारंभ ही करते हैं ‘हिंदी आलोचना का वर्तमान संकट और सर्जनात्मक काव्यालोचन’ लेख से। यहां वे आलोचना में मौलिकता के अभाव पर भी विचार करते हैं, चाहे वह सैद्धांतिक आलोचना हो या व्यावहारिक। शीतांशुजी मार्क्सवादी, कलावादी, मानववादी, यथार्थवादी आदि को आलोचना की मूल या मौलिक प्रवृत्ति न मान कर उसे भाषा की सर्जना में मापते हैं। भाषा के समय-समय पर बदलते स्वरूप और प्रयोग को शैली का आधार बनाते हैं। इसलिए पुस्तक के समग्र को अपनी प्रस्तावना में एकाग्र कर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि शैलीवैज्ञानिक काव्यालोचना का मूल परिसर क्या और कैसा है। इसे पढ़ना एक ऐसी पुस्तक को पढ़ना है, जो साहित्यिक आलोचना की भाषिक दिशा बताती है।

शीतांशुजी प्रसाद की ‘लहर’ में संग्रहीत ‘बीती विभावरी जाग री’ गीति-कविता से शैलीवैज्ञानिक विवचेना शुरू कर उसमें अर्थ के अनूठे त्रिधारा-संगम की पहचान करते हैं, यानी शैलीविज्ञान में अर्थविज्ञान कितना महत्त्वपूर्ण है, यह बताते हैं। शीतांशुजी गीत की संयोजना को शब्द-शब्द खोलते हुए विभावरी, तारा, उषा, खग, किसलय, अंचल, राग, मलयज आदि के भौतिक नायिका के रूप और उसके राष्ट्रीय अर्थ के साथ उस समय के वातावरण में अमूर्त अध्यात्म की छाया द्वारा रचना के बहुलार्थ प्रकट करते हैं, तो रचना के सौंदर्य और संवेदन अपने आप प्रकट होने लगते हैं।

अर्थ-संदर्भ की असंगतता के प्रश्न करने वालों को भी यहां एक शैलीवैज्ञानिक का अर्थवैज्ञानिक प्रत्युत्तर है। इसी प्रकार ‘कौन तुम शुभ किरण-वसना’ गीत की चर्चा कर यह भी प्रकट किया गया है कि छायावाद के अंतरपट में रूप-अरूप की कल्पना किस प्रकार उपस्थित है। निराला की ‘प्रार्थना’ का गीत ‘परिमल’ संग्रह का एक प्रयोगशील गीत है, जिसमें गहन संरचना तो है, पर वास्तव में आलोचक का ध्यान उसकी व्याकरणिक संयोजना पर भी जाना चाहिए! प्रार्थना, प्राय: दानशीलता या आज्ञात्मक विनम्रता में होती है। ‘करो’, ‘मरो’, कर दो’, ‘विचरो’ आदि शब्द आज्ञार्थक हैं।

निराला की ‘जुही की कली’ एक प्रकार से क्लासिक रचना की रूमानी परिणति है। काव्यबोध के साथ इस रचना को चाहिए तो यह था कि दैहिक स्तर से उठा कर, गंध की अमूर्त संज्ञा में पढ़ा जाता। ‘मौन रही हार’ में प्रचलित गीतात्मक तुकात्मकता के बजाय आलोचक ने ध्वनि संयोजन और रचना के संगीत को स्पष्ट किया है। ध्वनि का एक बड़ा आधार स्वर ध्वनियां होती हैं, क्योंकि ‘स्वर’ स्वयं ध्वनिमय होता है। यह गीत की विशेषता भी है। ‘उक्ति’ नामक कविता में अर्थबोध ही प्रमुख है, जिसे लेखक ने तालिका देकर समझाया है। ‘अंट नहीं रही है’ कविता में लेखक कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा के साथ भाषाविज्ञान की आधार-भूमि और प्रतिमानों को प्रकट करता है। यहां भी तालिकाएं रचना के समग्र अर्थात्मक और भाषिक संयोजन को स्पष्ट करती हैं। व्याकरण भी यहां लेखक के विवेक में प्रवेश करता है।

‘वह तोड़ती पत्थर’ जैसी छायावादी काल की कथित प्रगतिशील रचना को लेखक ने मतभिन्नता के साथ परखा है। महादेवी की ‘बीन भी हं, मैं तुम्हारी रागिनी भी हं’ में ‘बीन’ और ‘रागिनी’ की असंगतता को स्पष्ट कर भाषिक के साथ सांगीतिक विश्लेषण भी है। शैलीविज्ञान अगर ध्वन्यात्मकता को जगह देता है, तो ध्वन्यात्मक अर्थ-निष्पत्ति को भी जांचता है।

माखनलाल चतुर्वेदी की रचना ‘कैदी और कोकिला’ को राष्ट्रीय अर्थ में प्रतिपादित करते हैं। ‘कतकी पूनो’ वैसे तो गीत रचना है, लेकिन लेखक ने प्रथम गहन अर्थसंरचना, द्वितीय गहन अर्थसंरचना को चार रूपों में कविता के रूपकीय विधान पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है, क्योंकि शैलीविज्ञान आलंकारिक रूप संयोजना को भी अपना हिस्सा मानता है।

‘जीवन मर्म’ में देवीशंकर अवस्थी और कहानी विधा के साथ पाठ-प्रक्रिया की सार्थकता का प्रश्न उठाया तो गया है, लेकिन फोकस काव्य पर ही है। यहां भाषिक संरचना के कौशल का भी जिक्र है, वह भी सामान्य भाषा-व्यवहार के साथ। गद्य रचना में ही प्राय: यह भाषिक संरचना और व्यवहार व्यक्त होता है। यहां बहुअर्थात्मकता का प्रश्न कविता की तरह तो बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं, लेकिन संप्रेषण की दृष्टि से आवश्यक है। ‘जीवन मर्म’ में लेखक ने अज्ञेय की कुछ पंक्तियों को लेकर रूपांतरण प्रक्रिया को स्पष्ट किया है, जो अर्थ-व्याप्ति और अर्थ-निष्पत्ति की दृष्टि से प्रयोगमूलक है। ‘सोन मछली’ भी इसी क्रम में विवेचित की गई है। ‘असाध्य वीणा’ जैसी जटिल कविता और उसके अंतर्निहित मिथक-संदर्भ का विश्लेषण चुनौतीपूर्ण है। यहां ‘मिथक’ कैसे काव्य में रूपांतरित होकर लेजेंड बन जाते हैं, इस पर विचार करना आवश्यक लगता है। अज्ञेय के भाषा-लोक की गहनता भी यहां स्पष्ट है।

‘दिमागी गुहांधकार का औरांग उटांग’ में मुक्तिबोध किस प्रकार सत्य-असत्य का काव्यात्मक द्वंद्व रचते हैं, यह मनुष्य के प्रतिरूप के साथ विवेचित किया गया है। रचना में स्वप्न-यांत्रिकी के पांच अवयवों की चर्चा कर भाषिक आलोचना में निहित तत्त्व स्पष्ट किए गए हैं। मुक्तिबोध ने भाषा की जो इंजीनियरिंग की है, उससे जिन अर्थ निर्मितियों की काव्यात्मक प्रस्तुति हुई है, उस बारीकी को शीतांशुजी ने पकड़ा है। ‘अकाल और उसके बाद’ जैसी अति लोक-व्याप्त रचना में नागार्जुन के भौतिक बिंब चूल्हा, चक्की कैसे भूख की संवेदना से जुड़ते हैं, इसका मार्मिक विवेचन है। ‘वसंत’ और ‘भादों का ठहरा प्यार’ रूमानी होकर भी भाषागत विचलनों में कैसे व्यंजित हैं इसे भी लेखक ने स्पष्ट किया है।

हिंदी में भाषिक और शैलीवैज्ञानिक आलोचना की चुनौती सामान्य आलोचक कुबूल ही नहीं करते, क्योंकि इसके लिए केवल रूपवाद, मार्क्सवाद, कलावाद या यथार्थवाद के जरिए मूल्यांकन से काम नहीं चलता। रचना को उसकी संरचना-सर्जना और संरचना-विसर्जना दोनों ही पाठों में पढ़ कर उसकी भाषिक प्रवृत्ति और प्रकृति का अध्ययन आवश्यक है। शीतांशुजी की काव्यालोचना को ही इस संग्रह में शैलीवैज्ञानिक स्तर पर प्रस्तुत किया गया है। अगर गद्य-रचना में निबंध, कहानी, उपन्यास, डायरी, संस्मरण, पत्र, यात्रावृत्त, नाटक जीवनी आदि भी शैलीविज्ञान की दृष्टि से एक-एक रचना देकर प्रस्तुत किए जाते, तो पुस्तक की समग्रता अधिक उपयोगी हो सकती थी। शीतांशुजी ने जो श्रमसाध्य काव्यालोचन किया है, वह भाषाविज्ञान को विषय की तरह पढ़ने-पढ़ाने वालों के लिए रचना के विवेचन की दृष्टि से नए आलोचक गढ़ने में मदद करेगा।

सर्जनात्मक काव्यालोचन: अभ्यंतर का उद्घाटन: पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु; लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद; 550 रुपए।

 

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