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समांतर संसार: चमक और उदास चेहरे

सय्यद मुबीन ज़ेहरा जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: मंगल ग्रह पर भारत की दस्तक की तस्वीरों के बीच कुछ तस्वीरें सबसे आकर्षक थीं। वे महिला वैज्ञानिकों के खिले चेहरों की तस्वीरें थीं, जो इस उपलब्धि पर फूली नहीं समा रही थीं। ये महिला वैज्ञानिक इस तरह सजी हुई थीं, जैसे उनके घर में किसी उत्सव या […]

Author September 30, 2014 11:29 AM

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: मंगल ग्रह पर भारत की दस्तक की तस्वीरों के बीच कुछ तस्वीरें सबसे आकर्षक थीं। वे महिला वैज्ञानिकों के खिले चेहरों की तस्वीरें थीं, जो इस उपलब्धि पर फूली नहीं समा रही थीं। ये महिला वैज्ञानिक इस तरह सजी हुई थीं, जैसे उनके घर में किसी उत्सव या खुशी का मौका हो। एक तस्वीर में एक महिला वैज्ञानिक ने अपनी चोटी में गजरा सजा रखा है। उनकी आंखों की चमक देखने लायक है, जो अहसास करा रही है कि महिलाएं अब देश की तरक्की में अहम भूमिका निभा रही हैं। ये तस्वीरें महिला वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करती जान पड़ती हैं, जिन्होंने विज्ञान की शिक्षा जारी रखने के लिए बहुत संघर्ष किया है।

आज की युवतियों के लिए ये तस्वीरें एक उदाहरण हो सकती हैं। अगर आप जीवन में आगे बढ़ना चाहती हैं, तो आपके लिए अंतरिक्ष में ऊंची उड़ान का मार्ग भी खुला है। जहां मंगल मिशन को सफल बनाने में पुरुष वैज्ञानिकों का बड़ा योगदान रहा, वहीं महिला वैज्ञानिकों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि आज की महिला पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं है। वह घर-गृहस्थी संभालने के साथ जीवन के अन्य मामलों में भाग लेते हुए देश का नाम रोशन कर सकती है। ये महिला वैज्ञानिक भी मैरी कॉम की तरह ही हैं, जो बहुत मुश्किल हालात में देश के लिए मुक्केबाजी में स्वर्ण पदक लेकर आई थीं। ये बैंकर नैना किदवई, कॉरपोरेट दुनिया का बड़ा नाम इंदिरा नूई, सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज फातिमा बी या हिमालय के सीने पर देश का परचम लहराने वाली बछेंद्री पाल से कम नहीं हैं। देश में किसी भी क्षेत्र को लीजिए, किसी महिला का नाम जरूर मिल जाएगा। राजनीति से लेकर खेल के मैदान तक, शिक्षा से लेकर समाजसेवा और प्रशासनिक मामलों से लेकर विज्ञान तक, हमें महिलाओं की भागीदारी नजर आने लगी है।

मगर हमारे यहां जब महिलाओं के बढ़ते कदम दिखाने होते हैं, तो फिल्मी दुनिया की रंगीनियों या टीवी धारावाहिकों की उलझी हुई दुनिया को समेटने की कोशिश होती है। फिल्मों की दुनिया सपनों की दुनिया है, जो वास्तविकता से दूर है। इसलिए जब ड्रीम गर्ल फिल्मों की चकाचौंध से बाहर निकल कर राजनीति की डगर पर चलती है और उसका वास्तविकता से सामना होता है तो उसके सामने विचारों का अकाल पड़ जाता है। शब्द भावना छोड़ देते हैं और मजबूर और बेसहारा निशाना बन जाते हैं।

दक्षिण से आर्इं हेमा मालिनी ने हिंदी फिल्मों में बहुत नाम कमाया। वे ड्रीम गर्ल बन गर्इं। उत्तर प्रदेश के मथुरा से चुनाव जीत कर वे लोकसभा में पहुंचीं। अपने क्षेत्र के दौरे के समय वृंदावन में विधवाओं की हालत देख कर वे बहुत बेचैन हो गर्इं। इसी बेचैनी में उन्होंने एक बयान दे दिया, जिस पर तूफान-सा मच गया। खबरों के अनुसार, उन्होंने कहा कि बंगाल और बिहार में भी अच्छे मंदिर हैं। वृंदावन में विधवाओं के लिए जगह नहीं रह गई है। चालीस हजार से अधिक विधवाएं यहां हैं और यहां और जगह नहीं है। हालांकि अपने बयान पर मचे कोहराम के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि किसी ने उनका साक्षात्कार ठीक से नहीं सुना। कई विधवाओं से उन्होंने बात की, जिन्होंने बताया कि उन्हें वहां उनके ही परिवार के लोग छोड़ गए हैं। कुछ को घरों में काम मिल जाता है, लेकिन अधिकतर भीख मांग कर गुजारा करने को मजबूर हैं। हेमा मालिनी ने कहा कि वे तो केवल यह कहना चाहती थीं कि बेटे अपनी मां से ऐसा व्यवहार न करें, बल्कि उनका खयाल रखें। इसके लिए जागरूकता की कमी है।

चलिए, मान लेते हैं कि आपने वह नहीं कहा, जो लोगों तक पहुंचाया गया। मगर आप जिस लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं वह धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। आपकी पार्टी की केंद्र में सरकार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी के विकास को लेकर बहुत गंभीर हैं और इसके लिए कई नई परियोजनाएं बन रही हैं। आप भी उसी तर्ज पर मथुरा और वृंदावन के लिए योजना बनवाने की कोशिश कर सकती हैं। हमारे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं और समाज कल्याण प्रणाली बहुत कमजोर है। ऐसे बच्चे, जो कम आय में किसी तरह घर चलाते हैं, उनके लिए बुजुर्गों का इलाज और उनकी देखभाल करना बहुत मुश्किल हो जाता है। जो संस्कार वाले होते हैं वे अपनी और बच्चों की जरूरतें रोक कर यह काम करते हैं। मगर अधिकतर माता-पिता ही उन पर जोर देकर कहते हैं कि उन्हें भगवान के चरणों में छोड़ आओ, ताकि उनका अंतिम समय ईश्वर के ध्यान में बीते। ऐसा वे इसलिए कहते हैं कि उन्हें लगता है कि कहीं न कहीं वे बच्चों पर बोझ बन रहे हैं।

अपनों से दूरी तकलीफ देती है। हर पल उनकी याद सताती है। इस दूरी को भगवान के भजन, प्रवचन और कीर्तन में बिता कर ये विधवाएं किसी तरह उन यादों से छुटकारा पाना चाहती हैं। वृंदावन उन्हें सहारा देता है। हेमा मालिनी ने हालांकि एक सामाजिक समस्या को उजागर किया है, लेकिन इससे समस्या सुलझ नहीं रही। वृंदावन के लोग इसका समाधान चाहते हैं। मगर समाधान का यह तरीका सही नहीं है। इसके लिए देश में विधवाओं को सीधे मदद पहुंचाने का रास्ता निकालना होगा।

देश में जन्म और मृत्यु का रिकॉर्ड बनाने की व्यवस्था है। किसी विवाहित आदमी के निधन को दर्ज करते समय ही अगर उसकी पत्नी की सहायता की जाए तो इस समस्या को रोका जा सकता है। अगर संपत्ति में महिला का हिस्सा कानूनी रूप से देने की राह भी निकले, तो शायद पति के निधन के बाद उसके सामने मुश्किलें कम हो जाएंगी। फिर हमारे शहरों में घर खरीदने का उद्देश्य केवल निवेश होता जा रहा है। लोग घर लेकर बंद रखते हैं, जबकि लाखों लोग बेघर हैं। इसको खत्म किया जाए तो संपत्ति की कीमतें कम हों और लोगों को रहने के लिए आसानी से घर मिल जाए। यही स्थिति मथुरा और वृंदावन में भी होने लगी है, जहां लोगों ने मकान बनवा कर बंद कर रखे हैं। कोई ऐसा कानून बने, जिससे एक अवधि तक बंद रहने वाले मकानों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके और उन्हें उन लोगों को दिया जा सके, जिनके सिर पर छत नहीं है। इस पर और विचार करने की जरूरत है।
वृंदावन में अगर विधवाओं के लिए कम कीमत पर हॉस्टल की व्यवस्था हो जाए, जो अपनी मर्जी से अंतिम दिनों में पूजा-पाठ के लिए आती हैं, तो उन्हें सुविधा हो सकती है। उनके घर वाले उनके लिए एक बंधी-बंधाई रकम हर महीने रवाना कर पाएंगे। जिनके पास साधन नहीं हैं उनके लिए देश के लोग आगे आ सकते हैं। हेमाजी इस समस्या का सकारात्मक हल निकालने की कोशिश करें।

आपको याद होगा राज कपूर साहब ने इस मुद्दे को ‘प्रेम रोग’ फिल्म के माध्यम से उभारा था और एक नए सोच तक लोगों को पहुंचाया था। आप भी फिल्मी दुनिया से संबंध रखती हैं। आप विधवाओं के कल्याण और विकास को जीवन का लक्ष्य बना लीजिए। अगर आप इस दिशा में चल पड़ीं, तो संभव है कि वृंदावन ही क्या, देश भर में मजबूर और लाचार विधवाओं के जीवन में सुधार हो सकता है। इसके लिए आपको बस वही जुनून चाहिए, जिसके साथ आप फिल्मों में अभिनय करती रही हैं।

 

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