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प्रसंग: एक पुस्तक की आत्मकथा

मैं पुस्तक हूं। कई साल पहले, मेरे बगल में एक किताब पड़ी थी, जिसका नाम था: ‘मैं दलित हूं।’ गोदाम में आने-जाने वाले लोगों से पता चला कि वह किसी दलित की आत्मकथा है। मेरी भी इच्छा हुई कि अपनी आत्मकथा लिख दूं। यही वह विधा है जो किसी को जीवित रखती है। वरना आज […]

Author February 22, 2015 14:53 pm

मैं पुस्तक हूं। कई साल पहले, मेरे बगल में एक किताब पड़ी थी, जिसका नाम था: ‘मैं दलित हूं।’ गोदाम में आने-जाने वाले लोगों से पता चला कि वह किसी दलित की आत्मकथा है। मेरी भी इच्छा हुई कि अपनी आत्मकथा लिख दूं। यही वह विधा है जो किसी को जीवित रखती है। वरना आज के जमाने में कौन किसे पूछता है।

मेरा जन्म एक प्रोफेसर के ड्राइंगरूम में हुआ था। वे बहुत चिंतित रहा करते थे कि उनके नाम पर कोई पुस्तक नहीं है। प्रमोशन पाते-पाते वे प्रोफेसर हो गए थे और इसलिए उनके लिए जरूरी नहीं था कि वे कोई पुस्तक लिखें। सच कहा जाए तो विश्वविद्यालय के नियमों के तहत उन्हें कोई पुस्तक पढ़ने की भी जरूरत नहीं थी। किताबें छात्रों के लिए निर्धारित की जाती हैं, अध्यापकों के लिए नहीं। मुश्किल यह थी कि उन्हीं के विभाग में काम करने वाले एक दूसरे प्रोफेसर की तीन किताबें छप चुकी थीं: पद्माकर की अलंकार योजना, भारतेंदु की राष्ट्रवादी कविताएं और रहस्यवाद के प्रगतिशील आयाम। जब भी बाहर से कोई लेखक या आलोचक उनके विश्वविद्यालय में आता, वे उसे खूब आग्रह करके अपने घर ले जाते और अपनी तीनों पुस्तकें भेंट करते। लेकिन मैं जिन प्रोफेसर महोदय की चर्चा कर रही हूं, उनके हाथ हमेशा खाली रहते। दुख इस बात का नहीं था कि उनके नाम पर कोई प्रकाशन नहीं था, दुख इस बात का था कि उनके सहयोगी प्रोफेसर के नाम से तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं।

लेकिन उन्होंने कभी कुछ लिखा नहीं था। न मौलिक, न सेकंड-हैंड। पीएचडी उन्होंने अपने गाइड के सहारे की थी। गाइड ने थीसिस के लिए पचास हजार रुपए (बोली एक लाख से शुरू हुई थी) लिए थे और पच्चीस हजार देकर एक जरूरतमंद प्रतिभाशाली छात्र से उनकी थीसिस लिखवा दी थी। उसके बाद कलम का इस्तेमाल उन्होने सिर्फ दो कामों के लिए किया था- फॉर्म भरने के लिए और हस्ताक्षर करने के लिए। लेकिन तरीके हर जगह होते हैं- तरीका निकालने वाला चाहिए। प्रोफेसर साहब का एक छात्र मुक्तिबोध पर रिसर्च कर रहा था। जब भी वह अपनी थीसिस का कोई नया अध्याय लिख कर ले आता, वे उसे दो-तीन दिन के लिए अपने पास रख लेते और लौटाने के पहले उसकी फोटो-कॉपी करवा लेते थे। धीरे-धीरे उनके पास काफी सामग्री जमा हो गई। फिर एक दिन पुस्तकालय जाकर मुक्तिबोध पर प्रकाशित सभी किताबें ले आए। इस तरह, महीने भर में उनकी किताब तैयार हो गई। उन्होंने किताब का नाम रखा- मुक्तिबोध: कुछ नए परिप्रेक्ष्य।

अब समस्या थी, पुस्तक को छपाने की। यह आसान साबित नहीं हुआ। प्रोफेसर साहब तीन बार दिल्ली हो आए। पर कोई प्रकाशक तैयार नहीं हुआ। प्रोफेसर हैरान थे कि प्रकाशकों को कैसे आभास हो जाता है कि पुस्तक किस तरह लिखी गई है। उनका भाग्य अगले साल खुला जब वे विश्वविद्यालय की पुस्तकालय समिति के सदस्य बना दिए गए। एक दिन शाम को दिल्ली से फोन आया: ‘सर, मैं आपसे मिलना चाहता हूं। आपने अपनी एक आलोचना पुस्तक छापने के लिए मुझे दी थी। उस समय मैं इस पुस्तक का महत्त्व समझ नहीं पाया था। अब पछता रहा हूं। उसकी पांडुलिपि लेने के लिए मैं मुझे आपसे मिलना है। समय देने की कृपा करें।’ अगले दिन इसी आशय के दो और फोन आए। अब समस्या यह नहीं थी कि किस प्रकाशक को पकड़ा जाए, समस्या यह थी कि किस प्रकाशक को किताब दी जाए।

तीनों प्रकाशकों से बात करने और उनकी ख्याति के बारे में पता लगाने के बाद प्रोफेसर साहब ने अपना प्रकाशक चुन लिया। उस प्रकाशक के बारे में मशहूर था कि वह गिन कर रुपए नहीं देता। प्रोफेसर साहब ने उदारता को हमेशा एक बड़ा मूल्य माना था। कुछ मामलों में वे खुद भी कम उदार नहीं थे। इस तरह मेरा जन्म हुआ। पांडुलिपि देखे बिना ही स्वीकृत कर ली गई। उसका प्रूफ पढ़ने पर एक धेला भी खर्च नहीं करना पड़ा। प्रोफेसर के शिष्यों ने यह काम खुशी-खुशी कर दिया। विमोचन शानदार ढंग से हुआ। इस अवसर पर एक परिसंवाद का भी आयोजन हुआ। किताब हिट हो गई। अगले ही महीने विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में दो लाख रुपए मूल्य की नई किताबें आ गर्इं।

लेकिन मोहिं कहां विश्राम! मुझे उम्मीद थी कि मेरी कम से कम पांच सौ प्रतियां छपी होंगी। यही आजकल का रिवाज था। पर जब मैं छप कर आई, और मेरा विमोचन वगैरह हो गया, तब मुझे एक भरे हुए गोदाम में ठूंस दिया गया। मैंने पाया कि मेरे बगल में सिर्फ पचीस प्रतियां मौजूद हैं। आशावाद की उतावली में मैंने सोचा कि बाकी चार सौ पचहत्तर प्रतियां छपते ही बिक गई होंगी। मैं सोचने लगी कि वे देश के किस-किस हिस्से में पहुंची होंगी। फिर मैंने हिसाब लगाया, चूंकि एक पुस्तक की कीमत सात सौ पचास रुपए है, इसलिए उसके लेखक को कितनी ज्यादा रॉयलटी मिलेगी। यह सोच कर मुझे अपने ऊपर गरूर होने लगा। सात सौ पचास रुपए से कम कीमत की हर किताब मुझे तुच्छ लगने लगी।

लेकिन यह मेरी खुशफहमी थी। एक दिन प्रकाशक के कर्मचारियों की बातचीत से मालूम हुआ कि मेरी कुल पचास प्रतियां छपी थीं। पंद्रह लेखक को दे दी गर्इं, पांच विमोचन के मौके पर खर्च हुर्इं, और पांच प्रतियां उस विश्वविद्यालय ने खरीद लीं, जिसमें लेखक-प्रोफेसर पढ़ाते थे। बाकी गोदाम में भेज दी गर्इं। उन्हीं में मैं भी एक थी। गोदाम की एक धूल भरी रैक पर पड़े-पड़े कई महीने बीत गए। मेरे मन में विद्रोह पनपने लगा। क्या मेरा जन्म धूल की परतों के नीचे दबे रहने के लिए हुआ है? तिस पर सारे गोदाम में अंधेरा रहता था। जब प्रकाशक का कोई आदमी किताबें लेने के लिए आता, तब हलकी-सी रोशनी हो जाती थी। उसके जाने के बाद फिर वही मर्मभेदी अंधेरा। प्रकाशित होने का मतलब है, प्रकाश में आना, दिखाई पड़ना। लेकिन मेरी किस्मत में प्रकाशित होने के बाद भी अप्रकाशित बने रहना लिखा था।

एक दिन मेरा प्रकाशक, हलका नीला सूट पहने हुए, आया और किताबों का मुआयना करने लगा। उसकी बातों से लगा कि इधर उसने करीब एक दर्जन किताबें छापी थीं, जिन्हें रखने के लिए जगह नहीं थी। जगह की तलाश में ही वह यहां आया था। गोदाम में घूमते हुए वह जिन किताबों की ओर इशारा करता, उसका आदमी उसकी सभी प्रतियों को रैक से उतार कर जमीन पर पटक देता। जब भी कोई किताब पटकी जाती, मेरे सीने में दर्द उठ जाता। मुझे अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा। तभी प्रकाशक की नजर मुझ पर पड़ी। उसे गुस्सा आ गया- यह किताब यहां क्या कर रही है? दर्जनों बार कह चुका हूं कि महीने में एक बार रद््दी साफ कर दिया करो। उसके आदमी ने कहा- लेकिन सर, आपने ही कहा था कि राजाराम…। प्रकाशक ने उसे घूर कर देखा- तुम्हें पता नहीं कि उसका सेक्रेटरी बदल चुका है?

आजकल मैं एक छात्रावास में दरी पर बिखरी ढेर सारी किताबों में हूं। एमए का एक छात्र मुझे आसफ अली रोड के फुटपाथ-बाजार से खरीद कर ले आया था। वह खुश था कि सात सौ पचास रुपए की कीमत उसे सिर्फ पचास रुपए में मिल गई। उसने सुन रखा था कि मुक्तिबोध कोई बड़े कवि हैं। उसका खयाल था कि वह मुक्तिबोध पर रिसर्च करेगा। उसे क्या पता था कि ऐसा सोचने वाला वह अकेला नहीं था। कई छात्र-छात्राओं के पास यह किताब थी। एक ने बताया कि उसने चालीस रुपए में खरीदी थी। यह सुनते ही वह भड़क उठा। शाम को खूब दारू पी और मेरा एक-एक पन्ना नोच कर फेंकने लगा। मुझे ठीक वैसा ही अनुभव हुआ जैसे किसी पक्षी को भूनने के पहले उसके पंख नोचे जाते हैं।

 

राजकिशोर

 

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