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कभी-कभार: कला-नर्मदा

लेकिन हो पाना एक बार, हालांकि सिर्फ एक बार ही यह पार्थिव हो पाना लगता है टिकाऊ, निरसन से परे यथासंभव जो हम पा सकते हैं यहां, वह है अपने को पूरी तरह से पहचानना उसमें जो पृथ्वी पर दृश्य है… – राइनर मारिया रिल्के वे जो आधुनिक भारतीय चित्रकला के विविध वैभव में, अथक […]

Author February 22, 2015 14:38 pm

लेकिन हो पाना

एक बार, हालांकि सिर्फ एक बार ही

यह पार्थिव हो पाना लगता है टिकाऊ, निरसन से परे

यथासंभव जो हम

पा सकते हैं यहां, वह है अपने को पूरी तरह से पहचानना

उसमें जो पृथ्वी पर दृश्य है…

– राइनर मारिया रिल्के

वे जो आधुनिक भारतीय चित्रकला के विविध वैभव में, अथक परिश्रम और असमाप्य सिसृक्षा में, अचूक उदारता और अडिग एकाग्रता में विश्वास करते और दिलचस्पी रखते हैं उनके लिए सैयद हैदर रज़ा का इस इतवार 22 फरवरी, 2015 को 93 वर्ष का हो जाना निश्चय ही सार्थक हर्ष का विषय है। इन दिनों जब दोपहर को मैं रज़ा फाउंडेशन जाता हूं तो लगभग हर रोज उन्हें दत्तचित्त किसी न किसी कैनवास पर काम करते उनके स्टूडियो में देखता हूं: उनकी उंगलियों में आंखें लग गई लगती हैं- जिस तरह से वे रंग उठाते और उनका कोई अप्रत्याशित सा संयोजन रचते हैं उनसे यही लगता है कि अब उनकी उंगलियां ‘छूती-पकड़ती’ भर नहीं ‘देखती’ भी हैं। एक कृशकाय वयोवृद्ध देह का यह विलक्षण कायाकल्प है: जो मानो बची ही इसलिए है कि उसे रचना है। रज़ा के जन्मस्थान के नजदीक ही जन्मे कवि श्रीकांत वर्मा ने कहा था: ‘जो रचेगा नहीं, कैसे बचेगा!

रज़ा की कला उनकी पार्थिवता का उत्सव मनाती कला है। दशकों पहले आधुनिकता के विश्व केंद्र पेरिस में रहते हुए उन्होंने तनाव-उलझाव-द्वंद्व आदि की वर्चस्वशाली आधुनिकता के बरक्स, जिसमें वे दशकों से फ्रांसवासी होने के कारण खूब रसे-बसे थे, अपनी वैकल्पिक आधुनिकता रची-गढ़ी थी। यह विकल्प था भारतीय चिंतन के कुछ मूल अभिप्रायों का कला में पुनरन्वेषण और जीवन, प्रकृति, मानवीय संबंध, अस्तित्व आदि को निस्संकोच प्रणति देने का विकल्प। यह आधुनिक आपाधापी और गहमागहमी से अलग मध्यप्रदेश के अपने देहाती प्रायमरी स्कूल के बरामदे में दीवार पर अध्यापक के बनाए बिंदु को याद कर उस पर, उसमें अंतर्भूत ऊर्जा और संभावना पर लौटना था। बिना नास्टैल्जिक हुए रज़ा लगातार लौटते रहे हैं, अपने आत्म, अपने स्वत्व, अपनी जमीन और मिट्टी की ओर। उनके बचपन की नदी नर्मदा अपने अहरह प्रवाह से न सिर्फ उनके प्रिय शहर मण्डला को घेरती रही है, उनकी कला की अदम्य निरंतरता एक तरह से उनके लिए कला-नर्मदा है। वे नर्मदा की तरह उभयतटतीर्थ हैं!

उनके हाल के बनाए चित्रों की तीन अलग-अलग प्रदर्शनियां दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में ‘आरंभ’ शीर्षक से आयोजित हैं। वे चूंकि मूल और सार-तत्त्व के ही चितेरे हैं, उन्हें लगता है कि अब भी आरंभ ही हो रहा है: जीवन और कला की अनंत संभावनाएं हैं। अपनी पार्थिवता में रज़ा अपने को पूरी तरह से पहचान रहे हैं।

इस अवसर पर कला-आलोचकों और कलाकारों द्वारा रज़ा की कला पर पुनर्विचार करते हुए नए नौ निबंधों का एक संकलन ‘यट एगेन’ शीर्षक से कोलकाता की आकार प्रकार कलावीथिका प्रकाशित कर रही है। इनमें चित्रकार कृष्ण खन्ना और मनीष पुष्कले, कलालोचक गीति सेन, रोशन शहानी, किशोर सिंह, रणजीत होस्कोटे और इना पुरी और कवि उदयन वाजपेयी शामिल हैं।

 
सिकुड़ती स्वतंत्रता

हमारे परिपक्व होते लोकतंत्र की एक विडंबना यह है कि जहां उसमें अनेक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का भूगोल, गहराई और मान्यता में प्रशंसनीय विस्तार हो रहा है वहां कुछ स्वतंत्रताएं सिकुड़ी लग रही हैं जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शामिल हैं। यों तो यह कहा जा सकता है कि इन स्वतंत्रताओं की स्थिति हमेशा से कुछ नाजुक ही रही है। लेकिन हम यह नहीं भूल सकते कि स्वतंत्रता के बाद और लोकतंत्र की स्थापना के आरंभिक कुछ दशकों में कम से कम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अधिक आश्वस्तिकारी थी। इसका एक बड़ा कारण और आधार तो यह था कि राज्य स्वयं इस स्वतंत्रता का सजग-चौकन्ना पहरेदार था। यौनिक आधार पर बेहद विवादग्रस्त उपन्यास ‘लोलिता’ को पंडित नेहरू के स्तर से भारत में बिक्री के लिए मुक्त आने दिया गया था।

अब हो यह रहा है कि राज्य स्वयं इस अभिव्यक्ति को सीमित करने के अभियान में शामिल हो गया है। इस मामले में दलगत मतभेद आड़े नहीं आ रहे हैं: सभी दलों की सरकारों में इस स्वतंत्रता को बाधित करने का अथक उत्साह जाग गया लगता है। यह विचित्र और निंदनीय है कि संविधान के अंतर्गत जिस अधिकार को मौलिक माना गया है उसकी चौकसी राज्य नहीं कर पा रहा है जो कि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। बल्कि वह स्वयं उसका उल्लंघन निस्संकोच कर रहा है! ‘आहत भावनाओं’ वाला कोई भी छोटा सा समूह किसी फिल्म, पुस्तक, कलाकृति, रंगप्रस्तुति आदि को लेकर कुछ उपद्रव कर बैठता है और कानून व्यवस्था की दुहाई देकर राज्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए नहीं, उसे बाधित करने के लिए हस्तक्षेप करता है। न्यायिक प्रक्रियाओं का भयानक दुरुपयोग ये उपद्रवी तत्त्व करते हैं और अक्सर उनका बाल भी बांका नहीं होता।

राज्य के अलावा व्यापक समाज में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर और उसके प्रति सहिष्णुता घट रही है। तमिलनाडु में एक समुदाय ने अपने एक लेखक की अपने बारे में लिखी गई कृति को लेकर ऐसा अभियान चलाया कि उस लेखक ने तंग आकर लेखक के रूप में अपनी मृत्यु की घोषणा कर दी। बड़े-बड़े प्रकाशक लंबी न्यायिक प्रक्रिया से घबराकर कुछ अज्ञातकुलशीलों के अभियान के आगे आत्मसमर्पण कर विद्वानों की सुशोधित पुस्तकें या तो वापस ले रहे हैं या उन्हें प्रकाशित करने से इनकार कर रहे हैं। अभिव्यक्ति के लिए यह अंधेरा समय है जब राज्य और समाज दोनों ही उसकी स्वतंत्रता को दबाने के षड्यंत्र में शामिल हैं।

इसे भी अलक्षित नहीं जाना चाहिए कि स्वयं ऐसे अवसरों पर लेखक-कलाकार आदि विरोध की आवाज उठाने में संकोच करते हैं। जिस अधिकार की रक्षा में स्वयं उसके सबसे प्रखर और सजग प्रयोक्ता एकजुट और सन्नद्ध न हों वह अधिकार लोकतंत्र में और संविधान के बावजूद अंतत: कैसे-कितना बचेगा?

 
कवि-विमर्श

इन दिनों विमर्श का इस कदर बोलबाला है कि हम मानने लगे हैं कि विमर्श करने-देने का काम आलोचकों-चिंतकों-बुद्धिजीवियों का है; कवि-कलाकार किसी विमर्श में शामिल हो सकते हैं, उसको आत्मसात और व्यक्त कर सकते हैं लेकिन वे स्वयं विमर्श नहीं कर सकते। यह उनकी कविप्रकृति में नहीं है। मॉडर्न लायब्रेरी ने उल्रीच बेयर के बेहद कुशल संपादन में एक दशक पहले एक संकलन प्रकाशित किया था ‘ए पोयट्स गाइड टु लाइफ: द विजडम आॅफ रिल्के’ नाम से, जो इस धारणा का प्रत्याख्यान करता है। उसमें जीवन, जीने, कर्म, कठिनाई और विपत्ति, प्रकृति, बचपन और शिक्षा, एकांत, बीमारी और स्वास्थ्य-लाभ, भाषा, कला, मृत्यु, आस्था, प्रेम आदि पर कवि रेनर मारिया रिल्के के हजारों पत्रों से चुनकर विचार संकलित हैं। पत्रों की संख्या कहते हैं कि ग्यारह हजार के लगभग है। मेरे जाने संसार में शायद ही कोई और कवि हो जिसने इतनी बड़ी संख्या में ऐसे विचारप्रवण पत्र लिखे हों।
रिल्के कहते हैं: ‘कला के बारे में जो सबसे भयानक बात है वह यह है कि ज्यों कोई उसमें आगे बढ़ता है त्यों बहुत मजबूती से वह एक आत्यन्तिक और लगभग असंभव लक्ष्य के प्रति आबद्ध हो जाता है। इस मुकाम पर वह वहां पहुंच जाता है जहां वह मानसिक रूप से उस स्थिति में होता है जहां वह चार्ल्स बोदेलेयर की एक कविता की स्त्री की तरह चांदनी रात की विराट शांति में यह कह उठती है कि ‘एक सुंदर स्त्री होना एक कठिन काम है!’

रिल्के का यह भी मत है कि ‘कला-वस्तु बेरहम होती है और उसे ऐसा ही होना होता है।’ वे लिखते हैं: ‘कलाकृति समायोजन, संतुलन, आश्वासन होती है। वह न तो उदास हो सकती है न ही गुलाबी उम्मीद-भरी, क्योंकि उसका सार होता है न्याय।’ रिल्के का मानना था कि ‘कला अपने को जीवन के एक तरीके के रूप में पेश करती है, विज्ञान, धर्म या समाजवाद की ही तरह। वह समझने के इन तरीकों से सिर्फ इस बात में अलग होती है कि वह अपने समय का उत्पाद नहीं होती, मानो कि वह परम लक्ष्य की विश्वदृष्टि होती है।’

यों तो कवि का काम कविता लिखना और उसके अहाते में सकल संसार को शामिल करना होता है: वह संसार की हमारी समझ को, अपने मनुष्य होने के अर्थ को, भाषा की संभावनाओं को समझने में हमारी मदद करता है। जितना बड़ा कवि होता है उसकी वैचारिकी उतनी ही सघन और विपुल होती है। रिल्के इसका बहुत उजला और टिकाऊ प्रमाण हैं।

स्वयं कवियों का जीवन प्राय: संगठित या व्यवस्थित नहीं होता। रचना के मूल में ही जैसे जीवन का विपर्यास बैठा होता है। पर कवि जो जीवन की ऐन्द्रिय समझ और अहसास देते हैं वह अक्सर अनूठा होता है। वह साधारण को विशेष और विशेष को साधारण बनाते हैं और कल्पना के नए द्वार हमारे लिए खोलते रहते हैं। हम इसे अक्सर नजरअंदाज करते हैं कि हममें से अधिकांश की कल्पना के द्वार न जाने कब से बंद हैं!

 

अशोक वाजपेयी

 

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