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दूसरी नजर- जरूर होगा प्रतिकार का उभार

मैं ऐसे लोगों की गिनती कर रहा हूं जिन्होंने हथियार डाल दिए हैं। बुधवार, 26 जुलाई 2017 को यह नीतीश कुमार थे जिन्होंने अपनी तलवार और जंगी घोड़े को त्याग कर, बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में (छठी बार!) अपना राज्याभिषेक कराया।
Author August 6, 2017 06:17 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार। (फाइल फोटो)

मैं ऐसे लोगों की गिनती कर रहा हूं जिन्होंने हथियार डाल दिए हैं। बुधवार, 26 जुलाई 2017 को यह नीतीश कुमार थे जिन्होंने अपनी तलवार और जंगी घोड़े को त्याग कर, बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में (छठी बार!) अपना राज्याभिषेक कराया। बिहार की गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक विभाजनों को देखते हुए, यह हैरानी का विषय है कि एक शख्स मुख्यमंत्री की कुर्सी को ऐसे पुरस्कार के रूप में देखता है जिसे अपनी विश्वसनीयता और आत्म-सम्मान को गंवा कर पाना भी वांछनीय है। खूब जोर-शोर से यह प्रचारित किया गया है कि मोदी-शाह का वेगवान रथ रोका नहीं जा सकता। या तो इस पर फौरन सवार हो जाओ या इसके लिए ससम्मान रास्ता छोड़ देना ही ठीक है, वरना बेरहमी से कुचल दिए जाओगे।
26 जुलाई से, गुजरात में कांग्रेस के छह विधायक आत्म-समर्पण की (दृश्य और अदृश्य) शर्तों पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। मीडिया के बड़े हिस्से को सरकार और सत्तारूढ़ दल ने अपने पाले में कर लिया है। समाचार कक्षों और संपादकीय टीमों पर सेंसर हावी है। अकादमिक जगत आक्रांत है; जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति चाहते हैं कि परिसर में एक टैंक रखा जाए। एक सेवानिवृत्त जनरल ने इस पर खुशी जताई है कि जेएनयू को ‘जीत लिया गया है’ और उन्होंने वादा किया है कि हैदराबाद तथा जादवपुर विश्वविद्यालयों को भी जल्दी ही जीत लिया जाएगा।

उत्तर-सत्य की दुनिया
‘उत्तर-सत्य’ (पोस्ट ट्रुथ) के इस दौर में अधिक से अधिक लोग ऐसी बातों में यकीन करने लगे हैं जो जरूरी नहीं कि सच हों। वे मानते हैं कि विचारधारा की मृत्यु हो चुकी है। जिस एकमात्र ‘चीज’ से आपको मतलब होना चाहिए वह यह है कि ‘मुझे क्या मिलेगा?’ आपके लिए बहुत कुछ रखा है अगर आप सच्चे (और एकमात्र) राष्ट्रवादी भारतीयों के स्थूल तथा अति-राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं। संस्थाओं पर कब्जे की अभी शुरुआत हुई है, आगे ऐसे बहुत-से कब्जे होंगे और वे सच्चे राष्ट्रवादियों को अनगिनत मौके मुहैया कराएंगे। वे मानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता मर गई है। अब राज्य और धर्म अलग नहीं रहेंगे। सरदार सरोवर परियोजना की ऊंचाई 138.72 फुट तक बढ़ाने के बाद, उसके दुबारा उद्घाटन को देश भर के दो हजार पुजारियों की उपस्थिति और उनकी प्रार्थनाओं से पवित्र बनाया जाएगा। वे मानते हैं कि उदारवाद मर गया है। दीनानाथ बतरा और पहलाज निहलानी और उनके जैसे अन्य लोग सही सोच, सही व्यवहार और सही संस्कृति के प्रतिनिधि हैं। ऐसा कुछ भी, जिसे उनका अनुमोदन प्राप्त नहीं है, गलत समझा जाएगा, और लिहाजा उस पर पाबंदी लगा दी जाएगी।

स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व
वे मानते हैं कि आजादी मर चुकी है। केवल ऐसी आजादी मान्य है जिसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है: ‘‘एक ही आजादी मूल्यवान है और वह है राज्य की आजादी, और व्यक्ति की आजादी राज्य में समाहित है।’ यह परिभाषा जिस भले आदमी ने दी थी उसका नाम था मुसोलिनी।वे मानते हैं कि समानता मर चुकी है। भारत में कभी भी वास्तविक समानता नहीं थी- धर्मों के बीच, जातियों के बीच, स्त्री-पुरुष के बीच। वैदिक युग के बाद, मनु संहिता ईजाद की गई, वर्ण सबसे बड़ा धर्म था और भारत बिना समानता के ही खूब फला-फूला। इसलिए समानता कोई महत्त्वपूर्ण चीज नहीं है। जिन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में हिस्सा नहीं लिया, उन्होंने कभी भी स्वीकार नहीं किया कि समानता कोई सम्यक राष्ट्रीय उद््देश्य है। इसलिए असमान अधिकारों और असमान विशेषाधिकारों की मांग करना उचित है बशर्ते आप अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद या किसी गऊ रक्षक समूह या विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन, नई दिल्ली से ताल्लुक रखते हैं।वे मानते हैं कि बंधुत्व मर चुका है। यह एकदम सामान्य है कि किसी मुसलिम या ईसाई या अकेली औरत या गैर-शाकाहारी व्यक्ति को किराए पर मकान देने से मना कर दिया जाए। गैर-बंगाली और बंगाली घरेलू कामगारों के बीच भेदभाव करना एकदम वैध है। यह एकदम कानून-सम्मत है कि बंगाली घरेलू कामगारों की झुग्गियां उजाड़ दी जाएं, क्योंकि वे शायद बांग्लादेश से आए हुए हो सकते हैं। वे मानते हैं कि अंग्रेजी जल्द ही खत्म हो जाएगी। आधिकारिक भाषा समिति से अनुरोध किया जाएगा कि वह नियमित रूप से और जल्दी-जल्दी वे तरीके सुझाए कि कैसे अंग्रेजी की जगह हिंदी का इस्तेमाल होने लगे।

विपरीत दृष्टिकोण
मेरा नजरिया इससे उलट है। मैं यह नहीं मानता कि स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा की मौत हो चुकी है या हो जाएगी। ये मूल्य लोकतंत्र की आत्मा हैं और मेरा विश्वास है कि भारत के लोग इन मूल्यों को कभी मरने नहीं देंगे। मैं यह भी नहीं मानता कि भारत की जनता धर्मनिरपेक्षता को तज देगी और हिंदुत्व को गले लगा लेगी। लोग जानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता का हिंदुत्व से कोई मेल नहीं है। लोग यह भी समझते हैं कि हिंदुत्व आखिरकार उच्चवर्णीय वर्चस्व की वापसी तथा पिछड़ों व दलितों के उत्पीड़न का जरिया साबित होगा।
मैं यह भी नहीं मानता कि हम विचारधारा-विहीन दुनिया में रह रहे हैं। विचारधारा अब पूंजीवाद या साम्यवाद जैसे किसी एक शब्द के अधीन नहीं है। हरेक दल को समाज में होने वाले परिवर्तनों तथा लोगों की बदलती जरूरतों व चाहतों को ध्यान में रख कर अपना एजेंडा बनाना पड़ता है। क्या हिंदुत्व एक विचारधारा नहीं है? क्या भाजपा सावरकर, गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और बाबासाहब आंबेडकर के दर्शन के जवाब में पूरी ढिठाई से आगे नहीं बढ़ा रही है?
मैं नहीं मानता कि संविधान में वर्णित भारत की परिकल्पना नष्ट की जा सकती है। मैं नहीं मानता कि भारत में लिउ शियाओबो जैसे व्यक्ति नहीं हैं। मैं यह नहीं मानता कि मीडिया या लेखकों या अकादमिक जगत की अंतरात्मा को हमेशा के लिए कुचला जा सकता है। मेरा यह विश्वास 87 शिक्षाविदों के बयान (13 जुलाई, 2017) और फिर 114 पूर्व वरिष्ठ सेनाधिकारियों के बयान (1 अगस्त, 2017) से और दृढ़ हुआ है।
यह सही है कि इस समय विपक्षी पार्टियां बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्व के खिलाफ एक वैकल्पिक उभार ला पाने में नाकाम दिख रही हैं। इसका दोष वे दूसरों पर नहीं मढ़ सकतीं। लेकिन मैं पूरे भरोसे के साथ कहना चाहूंगा कि समाज के विभिन्न तबके जो तकलीफें उठा रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं उससे प्रतिकार का उभार जरूर होगा।

 

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