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दूसरी नजर- परेशानी के लिए तैयार रहें

एक बार जब सारे राज्यों ने जीएसटी में ये खूबियां मान लीं, तो जीएसटी के अहम पहलुओं पर सहमति बनाने की हर कोशिश की जानी चाहिए थी। ऐसी सहमति के अभाव में, और जबरन हुए समझौते के कारण, हम काफी दोषपूर्ण जीएसटी के साथ शुरुआत कर रहे हैं।
Author July 2, 2017 05:10 am
वित्त मंत्री अरुण जेटली (फाइल फोटो)

बदलाव के आश्वासन से ज्यादा रोमांचकारी और कुछ नहीं हो सकता, खासकर जब बदलाव बेहतरी के लिए हो। जब पहली बार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की घोषणा की गई थी, तो वादा बेहतरी का ही था। यह अब भी बेहतरी के लिए बदलाव का अग्रदूत बन सकता है, मगर सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि जो जीएसटी कल लागू हुआ वह एक दोषपूर्ण कर-कानून है और यह हमें परेशानी के एक लंबे दौर में ले जाएगा।एक परिकल्पना के रूप में, जीएसटी में कोई खामी नहीं है। भारत के संविधान (अनुच्छेद 301) में देश के लिए समान बाजार का भरोसा दिलाया गया है। हालांकि हमारी सरकारों की कर-व्यवस्थाओं के कारण यह नहीं हो सका। आंतरिक बाधाएं खड़ी की जाती रहीं, कर संग्रह भी होता रहा और कर-चोरी भी, निहित स्वार्थों की खातिर सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने के लिए दबाव डाले जाते रहे। इस सब का व्यापार और वाणिज्य पर बुरा असर पड़ा।
वैट और जीएसटी बड़े कदम
मूल्य वर्धित कर (वैट) राज्यों की कर-व्यवस्थाओं में एकरूपता लाने का पहला व्यापक उपाय था। लेकिन केंद्रीय कर कानून (उत्पाद कर तथा सेवा कर) और मुख्य राज्य कर कानून (वैट) अलग-अलग बने रहे। दोनों मिलकर कारोबार पर भारी बोझ साबित हुए। अनेक करों के क्रियान्वयन में भारी लागत अलग से।
जब वैट पूरे देश में लागू हो गया, तो अगला तार्किक कदम जीएसटी था। मैंने इस अवसर को पहचाना और 2006 में घोषणा कर दी कि हमारा लक्ष्य 2010 तक जीएसटी को अमल में लाना है। सात वर्षों की देरी के बाद (क्या वित्तमंत्री याद करेंगे कि देरी के लिए कौन जिम्मेवार है?), जीएसटी कल लागू हो गया। जीएसटी का मैं स्वागत करता हूं, साथ ही कामना करता हूं कि इसकी शुरुआत ढेर सारी कमजोरियों और अनिश्चितताओं से भरी हुई साबित नहीं होगी।
जीएसटी के सकारात्मक पहलुओं को जोर देकर कहने की जरूरत है: एक कर में कई सारे कर समाहित हो जाएंगे। एक निश्चित सीमा से ऊपर के सारे व्यावसायिक लेन-देन इसके दायरे में आएंगे। मूल्य शृंखला के मुताबिक अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले करों की विदाई हो जाएगी। जीएसटी से कर-आधार बढ़ेगा। एक बार जब सारे राज्यों ने जीएसटी में ये खूबियां मान लीं, तो जीएसटी के अहम पहलुओं पर सहमति बनाने की हर कोशिश की जानी चाहिए थी। ऐसी सहमति के अभाव में, और जबरन हुए समझौते के कारण, हम काफी दोषपूर्ण जीएसटी के साथ शुरुआत कर रहे हैं।
दोषपूर्ण संरचना
*जीएसटी में कर की एक ही मानक दर होनी चाहिए थी (रियायती दर और नुकसानदेह चीजों पर लगने वाली अपेक्षया ऊंची दर के साथ), पर ऐसा नहीं है। इसमें कई दरें हैं- 0, .25, 3, 5, 12, 18, 28; और इससे भी ऊंची दरें हो सकती हैं, अगर तथाकथित विलासिता की चीजों पर उप-कर लगाए गए तो।
*जीएसटी को एक ही एकीकृत कर-प्राधिकरण के तहत होना चाहिए था, पर ऐसा नहीं है। यह द्वितंत्रीय है। राज्यों और केंद्र के बीच कर-आधार का बंटवारा 90:10 के अनुपात में होगा (जहां कारोबार 1.5 करोड़ रु. से नीचे होगा) और यह बंटवारा 50:50 के अनुपात में होगा (जहां कारोबार 1.5 करोड़ रु. से ऊपर होगा)। मेरा खयाल है कि कोई कर-प्राधिकार राज्य सरकार का है या केंद्र का, यह शायद लाटरी के जरिए तय किया जाएगा!
*जीएसटी के तहत कमतर रिटर्न भरने का प्रावधान होना चाहिए था, पर ऐसा नहीं है। अगर एकदम नरमी से भी हिसाब लगाएं, तो एक व्यापारिक फर्म को हर महीने तीन और एक सालाना रिटर्न (कुल 37) भरना होगा। अगर वह व्यापार कई राज्यों से ताल्लुक रखता है, और कर प्राधिकार अगर राज्य सरकार है, तो उस व्यापार के दायरे के हिसाब से प्राधिकार की संख्या भी बढ़ जाएगी।
*जीएसटी को वर्गीकरण के झगड़ों को समाप्त कर देना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। देय दरें कई बार बदली गर्इं। हमने देखा कि निहित स्वार्थों ने अपने पक्ष में जमकर पैरवी की। विवाद उठने तय हैं। वीरप्पा मोइली जी ने पूछा, ‘किटकैट चाकलेट है या बिस्कुट?’, क्योंकि चाकलेट और बिस्कुट के लिए अलग-अलग दरें तय की गई हैं। मैं समझता हूं कि उचित समय आने पर सर्वोच्च न्यायालय से ऐसे प्रश्नों का निपटारा करने का अनुरोध किया जाएगा!
*जीएसटी को कर-प्रशासक के विवेकाधिकार को कम करना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। इसके विपरीत, ‘मुनाफाखोरी निरोधक प्राधिकार’ को काफी निष्ठुर शक्तियां दे दी गई हैं। जिसने भी यह विचित्र परिकल्पना तैयार की हो, उसे अर्थशास्त्र या करोबार या बाजार या प्रतिस्पर्धा का तनिक ज्ञान नहीं है। आर्थिक नियमन के एक सदी के अनुभव से वह बिल्कुल अछूता रह गया है। वह नियंत्रणवादी व्यवस्था की खुमारी में है, जो मानती थी कि सरकार ही सबसे ज्यादा ज्ञानी है तथा व्यापारियों को यह बताना सरकार का अधिकार और कर्तव्य है कि उन्हें क्या बेचना चाहिए और किस कीमत पर।
परीक्षण मददगार होता
जीएसटी को अंतिम तौर पर लागू करने से दो महीने पहले इसका परीक्षण यानी प्रायोगिक क्रियान्वयन होना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। हरेक कर-अधिकारी को, चाहे वह केंद्रीय स्तर पर अपनी सेवा दे रहा हो या राज्य स्तर पर, निर्देश दिया जाना चाहिए था कि वह एक छोटे या मझोले उद्यम के कार्यालय में दो हफ्ता गुजारे, और वास्तव में बनावटी (मॉक) रिटर्न ‘जमा’ करे और हिसाब किए गए कर का ‘भुगतान’ करे। परीक्षण अवधि के दौरान जीएसटी नेटवर्क (जीएसटीएन) वास्तविक स्थितियों का सामना करता और अगर कोई दिक्कतें मालूम होतीं, तो उन्हें दूर करता। इस तरह के परीक्षण से कारोबारी जगत का हौसला बढ़ा होता कि वे नई कर प्रणाली से सामंजस्य बिठा लेंगे। बेशक, इसका मतलब यह होता कि जीएसटी का अंतिम रूप से क्रियान्वयन कुछ समय के लिए टालना पड़ता, पर हठी सरकार ने कई तरफ से आई सदिच्छा भरी इस सलाह को अनसुना कर दिया।

कल जो जीएसटी लागू हुआ उसकेस्वरूप में हमारे राज्यतंत्र और राजनीति और कारोबार जगत के निहित स्वार्थों ने अपने लिए गली निकाल ली है। इसमें कई खामियां जबरन राजनीतिक सहमति बनाने का नतीजा हैं। मुझे ऐसा लगता है कि न जाने किन कारणों से बहुत ज्यादा समझौता किया गया।जो हो, हमारे पास एक बच्चा है। यह हृष्ट-पुष्ट नहीं है, इसमें कई जन्मना दोष हैं, इसलिए इसका लालन-पालन काफी सावधानी से करना होगा। पर यह हमारा बच्चा है। और इसलिए मुझे नए बच्चे का स्वागत करने दें।

 

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