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दूसरी नजर- क्यों नाराज हैं किसान

सरकार को सूखे के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, पर सरकार सूखे से पैदा हुए हालात को न संभाल पाने की दोषी तो है ही।

Author June 18, 2017 1:25 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।(EXpress Photo)

किसानों का आंदोलन अनेक राज्यों में फैलता जा रहा है। यह कृषि क्षेत्र के गहरे संकट में होने की ही परिणति है, जिस संकट के बारे में पिछले दो साल में कई जानकारों ने बोला और लिखा है। कई राज्यों में लगातार दो साल सूखा पड़ना एक मुख्य वजह है। सरकार को सूखे के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, पर सरकार सूखे से पैदा हुए हालात को न संभाल पाने की दोषी तो है ही। सूखे के रूप में आई प्राकृतिक विपत्ति के अलावा, मनुष्य-कृत विपत्तियां भी आर्इं, और यह स्तंभ इस बारे में है कि कैसे दोनों ने मिलकर देश में विस्फोटक स्थिति निर्मित की। भारत में अधिकतर किसानों के लिए खेती करने के सिवा कोई चारा नहीं है। उनके पासएकमात्र संपत्ति जमीन है, उनके पास एकमात्र कौशल खेती करना है, और अगर वे इसे नहीं करेंगे तो उनमें से बहुतों के सामने भुखमरी की नौबत आ जाएगी। देश के कुल जीडीपी में कृषि का हिस्सा गिरते जाने के बावजूद यह रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि को प्रमुखता हासिल है।

उपेक्षा की कीमत
दुर्भाग्य से, इस बुनियादी सच्चाई के प्रति राजग सरकार आंख मूंदे रही है। कृषि मंत्रालय इस सरकार में उपेक्षित रहा है। इस मंत्रालय के प्रभार में मई 2014 से कोई फेरबदल नहीं हुआ, पर मंत्रालय की कमान ऐसे शख्स के हाथ में रही है जिसका कोई बड़ा राजनीतिक कद नहीं है न ही सरकार में कोई खास प्रभाव है। (आपमें से कितने लोग शरद पवार के उत्तराधिकारी का नाम बता सकते हैं?) मंत्री महोदय को बहुतों ने न तो देखा है न सुना है। कृषि पर उनका एकमात्र याद रखने लायक बयान जो मैं याद कर सकता हूं वह था जिसमें उन्होंने ‘छह साल में किसानों की आमदनी दुगुनी’ करने के प्रधानमंत्री के वायदे को दोहराया था, और जब पूछा गया कि उनका मतलब वास्तविक आय से है या सांकेतिक आय से, तो वह एकदम चुप्पी साध गए थे।
दूसरी तरफ, न्यूनतम समर्थन मूल्य के मसले पर सरकार ने भयानक पाप किया है। अपने घोषणापत्र में और चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने साफ-साफ वायदा किया था कि वह स्वामीनाथन समिति की सिफारिशें लागू करेगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से पचास फीसद ज्यादा होगा। सरकार में आने पर, भाजपा ने न केवल इस वायदे के साथ दगा किया, बल्कि इन तीन सालों में न्यूनतम समर्थन मूल्य में तर्कसंगत बढ़ोतरी से इनकार करके किसानों को जबर्दस्त चोट पहुंचाई। आंकड़े गवाह हैं:
2004-05 2013-14 2016-17
(यूपीए दस साल) (राजग तीन साल)
रु. प्रति यूनिट
गन्ना 74.5 210/220 230
मक्का 525 1310 1365
सोयाबीन 1000 2560 2675
मूंगफली 1500 4000 4120
गेहूं 630 1350 1625
धान 560 1310 1470
उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य से इनकार करने की जाहिराना वजह यही थी कि समर्थन मूल्य अधिक देने पर महंगाई बढ़ने का डर था, जो कि आंशिक रूप से सही है, पर किसानों के हितों के खिलाफ जाकर महंगाई नियंत्रण की तजवीज करना चरम मूर्खता है। कुछ हद तक महंगाई अपरिहार्य है, और यह सरकार तथा रिजर्व बैंक का कर्तव्य है कि वे दूसरे उपायों का सहारा लेकर महंगाई को बेकाबू न होने दें, बजाय इसके कि खेती करने वालों को कंगाली की तरफ ले जाएं।
गलती पर गलती
दूसरी गंभीर भूल थी नोटबंदी। हरीश दामोदरन ने बड़े तर्कसंगत ढंग से बताया है कि नोटबंदी ने फसल के बाद कृषि अर्थव्यवस्था को कैसे डांवांडोल कर दिया (देखें ‘द क्राप्स आॅफ राथ’, इंडियन एक्सप्रेस, 12 जून, 2017)। कृषि उपज की खरीद और बिक्री मुख्यत: नगदी में होती है। नोटबंदी ने नगदी के प्रवाह को सुखा दिया और कीमतें धराशायी हो गर्इं। दामोदरन के मुताबिक, इसके पहले कभी टमाटर, आलू और प्याज की कीमतें एक ही समय औंधे मुुंह नहीं गिरी थीं। सोयाबीन, अरहर, लहसुन, मेथी और अंगूर की भी यही हालत थी। किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ी, यह बताने के साथ ही दामोदरन इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ‘हम कृषि पैदावार के मामले में मुद्रा अपस्फीति के दायरे में आ गए हैं, जिसकी सबसे प्रमुख वजह साफ तौर पर नोटबंदी ही रही।’ तीसरी गलती वह थी जब प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश में आने वाली सरकार की तरफ से एलान किया कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो राज्य में सारे कृषि-कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। बहुत हद तक यह एक चुनावी वायदा था, एक ऐसे राज्य में जहां भाजपा को चुनाव जीतने की उम्मीद शायद नहीं थी, पर दो टूक किया गया यह वायदा अब कई राज्यों में भाजपा को परेशान कर रहा है।

कृषि-कर्ज माफी अपने आप में न तो ‘अच्छी’ है, न ही ‘बुरी’। जैसा कि डॉ एमएस स्वामीनाथन ने कुछ दिन पहले कहा, ‘कर्जमाफी हालांकि अस्थायी तौर पर आवश्यक है, पर यह हमें सुरक्षित दीर्घकालीन ऋण व्यवस्था (यहां आपूर्ति पक्ष पर ज्यादा जोर है) नहीं दे सकती।’ जब किसानों को उचित व तर्कसंगत दाम नहीं मिलता और वे कर्जों की अदायगी में असमर्थ होते हैं, तो कर्जमाफी की मांग करते हैं। सर्वोच्च राजनीतिक आसन पर विराजमान व्यक्ति ने पूर्ण कर्जमाफी का वायदा किया था, फिर किसानों को क्यों दोष दिया जाए कि वे उस वायदे को लागू करने की मांग कर रहे हैं?फरवरी, 2008 में राजकोषीय स्थिति बहुत अच्छी थी, विकास दर तेज थी, और छोटे तथा मझोले किसानों का एक बार कर्ज माफ कर देना औचित्यपूर्ण था। तत्कालीन सरकार को पक्का भरोसा था कि वह कर्जमाफी की वित्तीय भरपाई कर लेगी। लेकिन 2017 में न तो अर्थव्यवस्था की तस्वीर वैसी है न राजकोषीय स्थिति। फिर भी प्रधानमंत्री ने कर्जमाफी का वायदा कर दिया, एक ऐसी सरकार की तरफ से, जिसे अभी निर्वाचित होना था। ऐसा लगता है कि किसी ने भी यह अंदाजा लगाने की जरूरत नहीं समझी कि उत्तर प्रदेश कितना भार उठा सकता है, और न ही किसी ने यह सोचने की जहमत उठाई कि दूसरे राज्यों पर इस वायदे का क्या असर पड़ेगा। भाजपा शेर पर सवार तो हो गई, पर उसे यह नहीं सूझ रहा है कि उतरे कैसे। इस बीच शेर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात में सरपट दौड़ रहा है।
आक्रोशित युवा
रही-सही कसर रोजगार-विहीन विकास ने पूरी कर दी है। युवाओं को न कृषि में काम मिल पा रहा है, न इतर क्षेत्रों में। सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यम नए रोजगार पैदा नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी, तीसरी और चौथी श्रेणी के शहर बेरोजगार युवाओं से भरे हैं और उनका आक्रोश केंद्र सरकार के खिलाफ है।
भाजपा अपनी गलतियां स्वीकार नहीं करेगी, न ही कोई भाजपा नेता प्रधानमंत्री को इन गलतियों के बारे में बताएगा। क्या प्रधानमंत्री कोई जादुई करिश्मा दिखाएंगे? इंतजार करें और देखें।

 

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