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दूसरी नजर: संविधान के साथ धोखा

ताजा ज्यादती तो लव जिहादियों को सजा देने के लिए हाल में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाए कानून की है, जो इसकी भयंकरता की सीमा की जांच करता है। इस कानून के निशाने पर मुसलिम नौजवान हैं, जो हिंदू महिला से प्रेम या विवाह करते हैं या उसके साथ रहते हैं।

love jihad, high courtप्रियंका- सलामत के निकाह के खिलाफ एफआईआर कोर्ट ने की थी रद्द।

अमेरिकी अब राहत की सांस ले सकते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप आखिरकार 20 जनवरी, 2021 को चले जाएंगे। फिर भी वे इस गंभीर हकीकत से छुटकारा नहीं पा सकते कि अमेरिका के सात करोड़ अड़तीस लाख नब्बे हजार दो सौ पंचानबे नागरिकों ने ट्रंप को वोट दिया, जो बाइडेन को मिले वोटों से सिर्फ इकसठ लाख छत्तीस हजार चार सौ छब्बीस कम हैं। सन 1860 के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब अमेरिकी इस तरह से बंट गए।

अमेरिका में 1860 का गृहयुद्ध समानता के अधिकार के मुद्दे को लेकर हुआ था। क्या अश्वेत अमेरिकियों को कानून के समक्ष बराबरी से देखा जाना चाहिए? निर्णायक पहलू नस्ल था। आखिरकार, एक कड़वा युद्ध, जिसमें आठ लाख लोग मारे गए थे, राष्ट्रपति लिंकन जीते थे। संविधान का तेरहवां संशोधन पास कराने के लिए उन्हें कांग्रेस का समर्थन भी मिला था।

भारत की आजादी की पूरी लड़ाई में भारतीय नस्ल, धर्म, जाति, भाषा या लिंग के आधार पर नहीं बंटे थे। आजादी के संघर्ष के इतिहास के पन्ने उन लोगों के नामों से भरे पड़े हैं, जो अलग-अलग धर्मों के थे, अलग-अलग भाषाएं बोलते थे, विभिन्न जातियों के थे और जिनकी आस्थाएं भी भिन्न थीं।

समानता की पवित्रता
इसलिए भारत की स्वतंत्रता के साथ ही हर भारतीय को ‘कानून के समक्ष समानता’ प्रदान की गई थी। इस विचार को सहज रूप से ही नागरिकों के मौलिक अधिकार में बदला गया और संविधान में प्रस्तुत किया गया : अनुच्छेद 14- समानता और कानूनों का समान संरक्षण, अनुच्छेद 15- भेदभाव का निषेध, अनुच्छेद 16- अवसरों की समानता, अनुच्छेद 21- जीवन और निजी स्वतंत्रता की सुरक्षा, और अनुच्छेद 25- अतंरात्मा की स्वतंत्रता।

बंटवारे की त्रासदी के बाद सजग संविधान सभा ने अल्पसंख्यकों को फिर से हिम्मत देने के लिए दो विशेष प्रावधान किए थे। अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण के लिए अनुच्छेद 29 और शिक्षा संस्थानों को स्थापित करने और उन्हें संचालित करने के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकार के लिए अनुच्छेद 30 रखा गया। अलग भाषा, लिपि, संस्कृति या धर्म वाला कोई भी नागरिक ‘अल्पसंख्यक’ था।

अमेरिका में, जैसे जैसे वक्त गुजरता गया, समानता के नए-नए पक्ष खोजे गए और अदालतों ने उन्हें सही ठहराया। जैसे- मताधिकार, नस्ल के आधार पर स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों के भेदभाव को खत्म करने का अधिकार और गर्भपात का अधिकार। इसका मूल स्रोत तेरहवां संशोधन था।

आदिम समझ
लगता है, बहुत सारे भारतीय इतिहास को भूल चुके हैं। कई लोग संविधान के मूल सिद्धांतों को छोड़ते नजर आते हैं। कई बड़े गर्व के साथ अपनी फर्जी विशिष्टता और श्रेष्ठता का दावा कर रहे हैं। जब तक भारत के सभी लोगों में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे में भरोसा रखने वाले लोग राजनीति में प्रमुखता से थे तो इस आदिम समझ पर निगरानी थी। जब राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा और इसकी पथ-प्रदर्शक आरएसएस- ने अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई और जैसे-जैसे यह बढ़ती गई, तो इस समझ ने राजनीतिक वैधता हासिल कर ली।

हम कई उदाहरण दे सकते हैं- गैर-हिंदी भाषियों पर हिंदी थोपना, भेदभाव भरा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता संशोधन कानून, जम्मू-कश्मीर राज्य के टुकड़े कर दिया जाना, हिरासत में लिए गए लोगों और विचाराधीन कैदियों के मानवाधिकारों को खारिज कर देना, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में चोरी-छिपे कटौती, संघवाद पर हमला और राशन कार्ड से लेकर परीक्षाओं और चुनावों तक में एकात्मकता लादने की निर्लज्जता भरी कोशिशें।

यह बहुसंख्यकों का एजेंडा है। पिछले लोकसभा में भाजपा को 37.38 फीसद वोट और तीन सौ तीन सीटें मिल जाने का मतलब यह नहीं है कि भाजपा के एजेंडे को पचास फीसद से एक ज्यादा नागरिकों का समर्थन हासिल हो गया। भाजपा को शासन करने का अधिकार है, लेकिन संविधान को नष्ट करने या उसे उलट देने का अधिकार नहीं है।

स्वतंत्रता पर हमला

भाजपा सरकारों को गाय के संरक्षण का अधिकार तो है, लेकिन यह पाबंदी थोपने का अधिकार नहीं है कि कोई (ईसाइयों और पूर्वोत्तर के लोगों सहित) भी गाय का मांस न खाए। उन्हें हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने का अधिकार तो है, लेकिन गैर-हिंदीभाषी लोगों पर हिंदी लादने या इस देश के शासन में गैर-हिंदी भाषियों की भागीदारी को मुश्किल बनाने का अधिकार नहीं है। सार्वजनिक रूप से अश्लीलता रोकने का अधिकार है, लेकिन पार्क में बैठे नौजवान प्रेमियों को पुलिस के हाथों प्रताड़ित करने का अधिकार नहीं है।

ताजा ज्यादती तो लव जिहादियों को सजा देने के लिए हाल में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाए कानून की है, जो इसकी भयंकरता की सीमा की जांच करता है। इस कानून के निशाने पर मुसलिम नौजवान हैं, जो हिंदू महिला से प्रेम या विवाह करते हैं या उसके साथ रहते हैं। उत्तर प्रदेश के इस कानून का मजमून अंतरधार्मिक विवाह या साथ में रहने के खिलाफ है, विशेष रूप से हिंदू-मुसलमान जोड़ों के। यह आपत्तिजनक मजमून इस प्रकार है-

‘कोई भी व्यक्ति झूठ, कपट, बल, बेजा प्रभाव, जोर जबर्दस्ती, प्रलोभन, या धोखाधड़ी के जरिए प्रत्यक्ष रूप से या किसी अन्य प्रकार से किसी व्यक्ति का एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन या विवाह…’

यह कानून गलत जानकारी, बल, बेजा प्रभाव, जोर जबर्दस्ती, प्रलोभन और जालसाजी को शादी के बराबर मानता है।
किसी भी बहुत ही निजी- साथी के चुनाव मुद्दे को कानूनी जामा पहनाने की यह बहुत ही बेशर्मी भरी कोशिश है। इन राज्यों के विधि विभाग ने स्पष्ट तौर पर सुप्रीम कोर्ट (शफी जहां, पुत्तास्वामी) और इलाहाबाद हाई कोर्ट (सलामत अंसारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, तारीख 11-11-2020) के फैसले नहीं पढ़े होंगे। इन्हें अगर पढ़ भी लिया हो, तो यह संभव है कि इन्हें तैयार करने वालों को उनके राजनीतिक आकाओं ने यह भरोसा दिलाया होगा कि इन फैसलों को खारिज कर दिया जाएगा और शासकों की आदिम मनोवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए इन कानूनों को दोबारा से लिखा जाएगा।

यह कानून पसंद पर, आजादी पर, निजता पर, गरिमा पर, पुरुष और महिला की समानता पर, और प्रेम करने, साथ रहने या शादी करने के अधिकार पर हमला है।

इसके परिणाम को लेकर कोई संदेह नहीं है। यह ऐसी स्थिति है जो लोकतंत्र और स्वतंत्रता को संकट की ओर धकेल रही है। इस बीच इस कानून के पहले शिकार उवैश अहमद बन गए हैं।

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