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दूसरी नजर- जम्मू-कश्मीर पर पुनरवलोकन

वे जानते हैं कि यह रुख किसी राजनीतिक समाधान की ओर नहीं ले जा सकता। एक अतिवादी छोर से दूसरे अतिवादी छोर के बीच झूलते रहना हमारे लिए ठीक नहीं हो सकता।
Author January 7, 2018 04:40 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

समय-समय पर हमें बड़ी निर्ममता से यह याद दिलाया जाता रहा है कि एक मसला है जो जम्मू-कश्मीर से ताल्लुक रखता है। इस तरह का ताजा वाकया 30-31 दिसंबर, 2017 की दरमियानी रात को हुआ, जब आतंकवादियों ने पुलवामा जिले के लेटपोरा स्थित सीआरपीएफ के प्रशिक्षण केंद्र पर हमला किया, जिसमें पांच जवान मारे गए और तीन जख्मी हो गए।
राज्यतंत्र और जनता के भिन्न-भिन्न हिस्सों की जम्मू-कश्मीर के मुद््दे पर भिन्न-भिन्न राय रही है। एक धुर छोर पर हुर्रियत का रुख है: अलगाव। वे जानते हैं कि भारत संघ से अलग होने का उनका लक्ष्य असंभव है और कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। दूसरे धुर छोर पर भाजपा का सख्त, दबंगई वाला और सैन्यवादी रुख है। वे जानते हैं कि यह रुख किसी राजनीतिक समाधान की ओर नहीं ले जा सकता। एक अतिवादी छोर से दूसरे अतिवादी छोर के बीच झूलते रहना हमारे लिए ठीक नहीं हो सकता। अगर हम ऐसा करते हैं, तो इसका खमियाजा जम्मू-कश्मीर की जनता को ही भुगतना होगा, और भारत राजनीतिक समाधान पाने का अवसर गंवा बैठेगा। शुक्रवार है कि ऐसा करने की जरूरत नहीं है, और ऐसी कई पहल हो सकती हैं जो कश्मीर मसले के राजनीतिक समाधान की तरफ ले जाएं। मैंने जम्मू-कश्मीर पर काफी लिखा है। कृपया वे पांच स्तंभ पढ़ें जो 17 अप्रैल और 18 सितंबर 2016 के बीच छपे, और वे दो स्तंभ भी पढ़ें जो 16 अप्रैल 2017 और 16 जुलाई 2017 को छपे।
चुनाव-पूर्व तमाशा
गुजरात चुनाव से ऐन पहले सरकार ने दिनेश्वर शर्मा को विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया, पर यह स्पष्ट नहीं था कि क्या करने को कहा गया है। बाद में यह संकेत दिया गया कि वे किसी से भी बात कर सकते हैं, जो उनसे मिलना चाहेगा, इसी में एक खटका है।
सरकार- और भाजपा- हुर्रियत को अलगाववादी मानते हैं और यह जोर देकर कहते रहे हैं कि हुुर्रियत से कभी कोई बातचीत नहीं होगी।
सरकार- और भाजपा- मानते रहे हैं कि आजादी की मांग अलगाव से भिन्न नहीं है और जोर देकर यह कहते रहे हैं कि आजादी की मांग करने वालों से कोई बातचीत नहीं होगी।
सरकार- और भाजपा ने- पत्थर फेंकने वालों को राष्ट्र-विरोधी ठहराया था और इसी आधार पर सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस के जरिए उन्हें कुचला गया।
सरकार- और भाजपा- ने जनवरी 2016 में पठानकोट के हवाई ठिकाने पर हुए आतंकी हमले के बाद कहा था कि पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होगी।
‘बातचीत नहीं’ की घोषणा को इस तरह पेश किया गया मानो यह कोई नीति हो। इस नीति को बल देने के लिए और भी जवान (सेना और अर्धसैनिक बल के) कश्मीर घाटी में तैनात किए गए। यह दावा किया गया कि सख्त, मजबूत, सैन्यवादी रुख से ही घुसपैठ और आतंकवाद का खात्मा होगा। क्या ऐसा हो पाया है? तालिका पर नजर डालें, जिसमें पिछले चार साल में मारे गए व्यक्तियों की तादाद दी गई है: पाकिस्तान समर्थित घुसपैठ और आतंकवाद ने जम्मू-कश्मीर को काफी अशांत रखा है। पर यह सोचना सही नहीं है कि मुद््दा घुसपैठ और आतंकवाद है। घुसपैठ और आतंकवाद तो एक मुद््दे की उपज हैं। मुद््दा है कश्मीर के विलय से संबंधित विवाद का लंबे से समय से बना रहना। भारत और पाकिस्तान के बीच 1947 में हुए पहले युद्ध के बाद जम्मू-कश्मीर को जबरन दो हिस्सों में बंटने को विवश किया गया, और वे आज तक बंटे हुए हैं। चार युद्ध इस मसले पर लड़े गए। इसलिए यह जताने से कोई मकसद नहीं सधेगा कि कोई मसला है ही नहीं, या भारत और पाकिस्तान के बीच कोई विवाद है ही नहीं।

वाजपेयी बनाम मोदी
समझदारी इसी में है कि जम्मू-कश्मीर के मसले का राजनीतिक समाधान निकालने की दिशा में सक्रियता से काम किया जाय। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह, दोनों इस बात के लिए याद किए जाएंगे कि उन्होंने ऐसा समाधान निकालने के लिए उत्साहपूर्ण प्रयास किए। कई मौकों पर वैसा समाधान हमारे नजदीक आता मालूम हुआ, पर अगर वैसा था भी, तो वह समाधान हमारे हाथ से निकल गया। मंौजूदा सरकार का दोष यह है कि ऐसा लगता है वह कोई समाधान चाहती ही नहीं; वह समाधान के लिए संजीदगी से प्रयासरत नहीं है; और सभी संबंधित घटकों से बातचीत के दरवाजे बंद करके इसने कम से कम निकट भविष्य में समाधान के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है। जबकि आगे का रास्ता यह है कि सभी संबंधित पक्षों को बातचीत का न्योता दिया जाए।
दुर्भाग्य से, इन घटकों ने विशेष प्रतिनिधि की नियुक्ति को चुनाव से पहले की चाल के रूप में ही देखा और उन्हें पूरी तरह से खारिज कर दिया। जो लोग उनसे मिले (एक फल उत्पादक संघ से लेकर एक फुटबॉल संघ तक), उनकी अहमियत को कम आंके बगैर, उन पर नजर डालें जिन्होंने मुलाकात करना जरूरी नहीं समझा: कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस, माकपा, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, मान्यता-प्राप्त छात्रसंघ, श्रमिक संघ, राजनीतिक रूप से सक्रिय युवा समूह।
हुर्रियत या ‘आजादी’ की मांग करने वालों या पत्थरबाजी में पकड़े गए लोगों (जो कि भारत के ही नागरिक थे), से ‘बातचीत नहीं’ की नीति ने विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करने के पीछे रहे सरकार के घोषित उद््देश्य पर पानी फेर दिया है।

वैकल्पिक नजरिया
अब भी, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। मैं वार्ताकार की नियुक्ति का समर्थन करता हूं, पर यह कदम एक समग्र एजेंडे का हिस्सा होना चाहिए था। यहां उन उपायों का फिर से उल्लेख कर रहा हूं जिनकी रूपरेखा मैंने 16 अप्रैल 2017 के स्तंभ में दी थी:
* राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करें;
* एलान करें कि केंद्र सरकार सभी संबद्ध पक्षों से बातचीत करेगी;
* बातचीत का रास्ता साफ करने के लिए वार्ताकारों की नियुक्ति की जाए;
* घाटी में सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती घटाई जाए और कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी राज्य की पुलिस को सौंपी जाए।
* पाकिस्तान से लगी सरहद की हर हाल में रक्षा हो, और आतंकवादियों तथा घुसपैठियों के खिलाफ निरोधक कार्रवाई की जाए।
मैं अपने हर शब्द पर कायम हूं। अगर आप उनमें से एक हैं जो यह सोचते हैं कि सरकार के सख्त, निर्मम और सैन्यवादी रुख को एक मौका दिया जाना चाहिए, तो तालिका पर फिर से नजर डालें। आपको अपनी राय बदलनी पड़ सकती है।

 

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