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दूसरी नज़र: नोटबंदी ने किसे क्या दिया

वे कौन हैं जिन्हें नोटबंदी ने पूरी तरह तबाह कर दिया?- वह श्रमिक, जो तिरुप्पुर, सूरत और मुरादाबाद जैसे औद्योगिक केंद्र में काम करता था और छंटनी का शिकार हुआ।

Author December 18, 2016 1:46 AM
मुताबिक नासिक में एक किसान को प्याज के पांच पैसे प्रति किलो के दाम पेश किए गए।

इस हफ्ते भी मैं नोटबंदी की ही चर्चा करूंगा। जब बदलाव होता है, उससे लाभान्वित लोग भी होते हैं और गंवाने वाले भी। समझदारी इसी में है कि उससे लाभ उठाया जाए और जिन्हें नुकसान पहुंचता हो उनके नुकसान को भरसक कम किया जाए। इससे भी बड़ी समझदारी यह सुनिश्चित करने में है कि कोई भी एकदम बर्बाद न हो जाए। ऐसी समझदारी केवल सारी सूचना और ज्ञान से ही आ सकती है।तथ्यों और साक्ष्यों को इकट्ठा करने पर, जो कि दिल्ली में आसानी से उपलब्ध हैं- खासकर सरकार और भाजपा के सूत्रों से- यह बिल्कुल साफ है कि प्रधानमंत्री को कई बातें नहीं बताई गई थीं:

1. कि पांच सौ और हजार के नोटों के विमुद्रीकरण का नतीजा होगा कि कुल मुद्रा के छियासी फीसद मूल्य के बराबर की मुद्रा चलन व प्रयोग से बाहर हो जाएगी।
2. कि नोट छपाई की क्षमता सीमित है और विमुद्रीकृत नोट (संख्या में 2400 करोड़) की जगह दूसरे नोट चलाने में सात महीने लगेंगे, अगर प्रत्येक विमुद्रीकृत नोट की जगह उसी मूल्य का नोट लाना हो; इससे भी ज्यादा वक्त लगेगा, अगर नए नोट कम मूल्य के लाने हों; अगर विकल्प के रूप में 2000 के नोट होंगे, तो कम वक्त लगेगा।
3. कि 2 लाख 15 हजार एटीएम को नवीकृत करने और उनमें नए नोट डालने में एक माह या इससे कुछ अधिक ही समय लग सकता है।
बेपर्दगी

बिना पूरी सूचना के, और बिना सही सवालों को पूछे, प्रधानमंत्री ने ज्यादा मूल्य के (पांच सौ और हजार के) नोटों को बंद करने का एकतरफा ढंग से फैसला कर लिया। आत्मविश्वास से भरे उनके अंदाज और शाब्दिक कलाकारी ने लोगों को प्रभावित किया। जब उन्होंने कहा कि नोटबंदी से काले धन, भ्रष्टाचार, जाली मुद्रा और आतंकी फंडिंग पर रोक लगेगी, तो देश के अधिकतर लोगों ने उनकी बात पर यकीन किया। जब उन्होंने कहा कि असुविधा बस कुछ ही दिन होगी (उनके वित्तमंत्री ने तो अगले मंगलवार यानी 15 नवंबर का दिन भी मुकर्रर कर दिया था, जब चीजें सामान्य हो जाएंगी), तो लोगों ने इस आश्वासन को भी सही माना। लोगों ने तब भी उन पर भरोसा जताया जब उन्होंने पचास दिन तक धैर्य रखने को कहा। लोग लंबी-लंबी कतारों में घंटों बड़े धीरज के साथ खड़े रहे, और जब उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा तब भी उन्होंने विरोध नहीं जताया। पिछले हफ्ते तक, प्रधानमंत्री मजबूत स्थिति में थे। लेकिन फिर बेपर्दगी का सिलसिला शुरू हो गया। सरकार का हरेक वादा खोखला और झूठा साबित होने लगा। विमुद्रीकरण के गिर्द बने मिथ का मुलम्मा उतरने लगा। यह साफ दिखने लगा कि फायदा उठाने वाले कौन हैं और नुकसान उठाने वाले कौन। और हम हतप्रभ हैं कि करोड़ों लोगों की जिंदगी कैसे देखते-देखते बर्बाद हो गई।
विजेता और पराजित
विजेता कौन हैं?- वे जमाखोर, जिन्होंने अपने जमा किए हुए हर नोट को सफेद कर लिया। काले धन को सफेद करने वाले तथा दलाल, जिन्होंने भारी कमीशन कमाया। वे बैंक अधिकारी, जिन्होंने पुराने नोटों के बदले नए यानी दो हजार रुपए के नोटों के बंडल टैक्स-चोरों व भ्रष्ट अफसरों को दिए। वे पुलिसकर्मी और अन्य सरकारी कर्मचारी, जिन्होंने परदे के पीछे नोटबदली का इंतजाम करने के लिए बैंक अधिकारियों को फुसलाया या धमकाया। ये सारे तत्त्व कल्पनातीत रूप से कामयाब रहे और इन्होंने व्यावहारिक तौर पर यह पक्का कर दिया कि 15,44,000 करोड़ की राशि का हरेक रुपया बैंकिंग सिस्टम में लौट आएगा।
पराजित कौन हैं?- औसत आदमी, जिसे अपने ही खाते का पैसा निकालने के लिए बार-बार बैंक जाने के लिए विवश किया गया। वह व्यक्ति, जिसके पास कुछ पुराने नोट थे और किसी बैंक शाखा तक जिसकी पहुंच नहीं थी (दूरी के कारण) और जिसे कम कीमत पर अपने नोट बदलने पड़े। वह गृहणी, जिसे थोड़े पैसों के लिए हाथ फैलाना पड़ा ताकि वह दिन में कम से कम एक बार अपने परिवार के खाने का जुगाड़ कर सके। वह मरीज, जो पास में पैसा न होने से अपना इलाज नहीं करा सका। वह विद्यार्थी, जिसके पास खाने के लिए नजदीक के गुरद्वारे के लंगर का सहारा लेने के सिवा कोई चारा न था। वह किसान, जिसके पास बीज या खाद खरीदने या मजदूर को देने के लिए पैसा नहीं था और इस तरह जिसकी उत्पादकता मारी गई।
जो कहीं के न रहे
वे कौन हैं जिन्हें नोटबंदी ने पूरी तरह तबाह कर दिया?- वह श्रमिक, जो तिरुप्पुर, सूरत और मुरादाबाद जैसे औद्योगिक केंद्र में काम करता था और छंटनी का शिकार हुआ। दिहाड़ी मजदूर, जो खेत या मंडी या निर्माण-स्थल, कहीं भी काम नहीं पा सका। स्व-रोजगार में लगा व्यक्ति- चाहे वह फूल या फल या पावभाजी बेचने वाला दुकानदार हो या कोई और- जिसेहफ्तों तक ग्राहक के दर्शन नसीब नहीं हुए। अपना काम करने वाले कारीगर (बढ़ई, बिजली-मिस्त्री, प्लम्बर), जिन्हें कोई काम नहीं मिला। छोटे कारोबारी, जिनकी बिक्री अस्सी फीसद तक गिर गई। ट्रक मालिक और ट्रक ड्राइवर, जिनके ट्रक कई हफ्तों तक इधर-इधर अटके रहे।
नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार पड़ी किसानों पर, जिनकी उपज के दाम धड़ाम से गिर गए, जिसे नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
थोक कीमतें (प्रति क्विंटल) 8 नवंबर 14 दिसंबर
टमाटर 2659 1920
आलू 1400 924
मटर 3167 2864
बंदगोभी 1448 964
फूलगोभी 1940 1079
गाजर 2247 1355
बैंगन 1542 1086
पालक 801 526
अमरूद 2088 1802
संतरा 4081 3586
अदरक 8876 8421
अरहर 6650 5935

टमाटर, गाजर और पालक के मामले में कीमत गिरने की वजहें मौसमी हो सकती हैं। दूसरी चीजों की बाबत, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि ग्राहकों के पास पैसे की कमी और फलस्वरूप मांग में आई गिरावट ही मुख्य वजह थी। जहां तक ये चीजें उगाने वाले किसान का सवाल है, उसे अपूरणीय आर्थिक नुकसान हुआ, जिसे क्रूरतापूर्ण भी कहा जाएगा- कोई भी अभी तक उसकी क्षतिपूर्ति के लिए आगे नहीं आया है।रोजाना औसतन ग्यारह करोड़ लोग एटीएम और बैंक-शाखाओं के बाहर कतारों में खड़े रहे: हर हफ्ते चौबीस हजार रुपए तक की निकासी की इजाजत दी गई थी, मगर उस पर अमल नहीं किया जा रहा था; दिहाड़ी मजदूरी या दैनिक पारिश्रमिक का जो नुकसान हुआ उसकी कभी भरपाई नहीं हो सकेगी; जिन्सों की कीमतें गिरने से हुए नुकसान की कोई भरपाई नहीं होगी; सौ के करीब हुई त्रासद मौतें- शायद किसी कुदरती आपदा ने भी देश भर में इतने लोगों की जिंदगी न छीनी होती।
यह असह्य है, मेरे प्यारे देश, क्योंकि यह एक कुविचारित योजना की देन है, जिसे लचर क्रियान्वयन ने विपदा में बदल दिया।

 

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