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‘दूसरी नजर’ कॉलम में पी. चिदंबरम का लेख: खोटे खयालों के खतरे

रोजगार-सृजन होता क्यों नहीं दिख रहा है, क्यों किसानों में असंतोष है, क्यों युवाओं में आक्रोश है।
Author October 9, 2016 04:46 am
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत में नोटों के मुद्रण और वितरण के लिए जिम्मेदार है।

हमारे पास रिजर्व बैंक के नए गवर्नर हैं, एक मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) है, और मौद्रिक नीति पर उनका नया वक्तव्य है। इसके संकेतों को समझना जरूरी है।सर्वसम्मति से आया एमपीसी का वक्तव्य न केवल रेपो दर में कटौती के लिहाज से बल्कि आर्थिक स्थिति के विश्लेषण के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। चूंकि यह वक्तव्य वित्तवर्ष की पहली छमाही के अंत में आया, इसलिए वित्तवर्ष के मध्य में अर्थव्यवस्था की दशा को समझने में सहायक है, और इसी समय केंद्र सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हुआ।वैश्विक अर्थव्यवस्था की दशा शोचनीच है। वृद्धि दर में अनुमान से ज्यादा गिरावट आई है, व्यापार बहुत तेजी से सिकुड़ा है, संरक्षणवाद का उभार दिख रहा है, ‘और व्यवस्थापरक केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति की बाबत आगे क्या कदम उठाएंगे, इस अनिश्चितता की वजह से एक असहज कर देने वाली शांति छाई हुई है।’

अर्थव्यवस्था की दशा

घरेलू अर्थव्यवस्था के बारे में-‘‘कृषिक्षेत्र में उज्ज्वल संभावना है;‘‘औद्योगिक क्षेत्र में, मुख्य रूप में मैन्युफैक्चरिंग के खराब प्रदर्शन की वजह से, सिकुड़न आई है;
‘‘खाद्य और र्इंधन को छोड़ दें तो महंगाई पांच फीसद पर जमी हुई है, खासकर शिक्षा, चिकित्सा और निजी देखरेख सेवाओं में;‘‘मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में फीका प्रदर्शन जारी है…;‘‘बाहरी क्षेत्र में देखें, वस्तुओं का निर्यात दूसरी तिमाही के पहले दो महीनों में लुढ़क गया;‘‘आयात में तेजी से आई गिरावट घरेलू मांग की सुस्ती को दर्शाती है;‘‘बाहर से आने वाली रकम और बीपीओ की कमाई में आई गिरावट पर गौर करने की जरूरत है;
‘‘एक साल पहले की तुलना में एफडीआइ की गति धीमी हुई है, जबकि पोर्टफोलियो निवेश का प्रवाह बढ़ा है।’’ये निष्कर्ष उन आंकड़ों में भी निहित हैं जिन्हें हमने पिछले बारह महीनों में या उससे अधिक समय से देखा है। यहां कुछ आंकड़े पेश करना मुनासिब होगा, ताकि बात को आसानी से समझा जा सके-*2016-17 की पहली तिमाही में कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जो कि अतिरिक्त पूंजी निवेश है), पिछले साल की समान अवधि की तुलना में, 3.1 फीसद गिर गया।*2015-16 की पहली तिमाही की तुलना में, 2016-17 की पहली तिमाही में, सारे फर्मों की शुद्ध बिक्री 1.9 फीसद और मैन्युफैक्चरिंग फर्मों की शुद्ध बिक्री 4.8 फीसद गिर गई।*फरवरी से जुलाई 2016 के दौरान सारे क्षेत्रों के लिए कुल ऋण-वृद्धि 9.5 फीसद रही, पर सिर्फ उद्योग को लें, तो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में, यह वृद्धि महज 1.72 फीसद रही। सूक्ष्म व लघु उद्योगों के ऋण में 3.46 फीसद और मझोले उद्योगों के ऋण में 10.62 फीसद की गिरावट दर्ज हुई।*सभी उद्योगों के उत्पादन को दर्शाने वाले सूचकांक (आइपीपी) में फरवरी से जुलाई 2016 के दौरान महज 0.25 फीसद की वृद्धि हुई, जबकि मैन्युफैक्चरिंग में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले सिर्फ 1.01 फीसद की गिरावट रही।*बैंकों का एनपीए 7.6 फीसद पर है, जबकि यह पिछले साल के आखीर में 4.6 फीसद पर था।

जमीनी हकीकत

अब आप समझ सकते हैं कि रोजगार-सृजन होता क्यों नहीं दिख रहा है, क्यों किसानों में असंतोष है, क्यों युवाओं में आक्रोश है। अब आप समझ सकते हैं कि रोजगार-निर्माता (निर्यातक और सूक्ष्म, लघु व मझोले उद्योग) क्यों निराशा में हाथ खड़े कर चुके हैं। अब आप समझ सकते हैं कि क्यों बड़े व्यापारिक घराने देश के बजाय बाहर निवेश कर रहे हैं।ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ भी सही नहीं कर रही है। सरकार सही रास्ते पर थी, जब उसने वित्तीय सुदृढ़ीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता घोषित की। लंबे समय से घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर बेच कर सरकार सही कर रही है। इन्फ्रास्ट्रक्चर खासकर सड़क और रेलवे में और ज्यादा निवेश के लिए इसने सही रणनीति अपनाई है। लेकिन ये कदम काफी नहीं हैं, जब तक कि निजी क्षेत्र- बड़ा, मझोला और छोटा- निवेश के लिए उत्साहित नहीं होता। दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं हो रहा है।
धीमे निवेश की मुख्य वजह है सकल मांग का कमजोर रहना। भारत में कारोबारी सुगमता (‘डूइंग बिजनेस इन इंडिया’) बढ़ी नहीं है (कारोबारी सुगमता के सूचकांक में कुछ पायदान ऊपर चढ़ने के बावजूद)। नियामकएक बार फिर नियंत्रक बन गए हैं और ढेर सारे ऐसे नियम-कायदे बना डाले हैं जो डराते हैं। कर विभागों की जांच शाखाओं समेत जांच एजेंसियों ने धमकाने और डराने का सिलसिला चला रखा है। कारोबारी मामलों की मुकदमेबाजी, जिनमें अक्सर सरकार भी शामिल रहती है, बहुत बढ़ गई है, क्योंकि कोई वैकल्पिक व कारगर विवाद निपटारा तंत्र नहीं है। ऐसा लगता है कि ‘सुधार’ में राज्य सरकारों की दिलचस्पी नहीं रह गई है और वे ‘कल्याणवाद’ को चलाने में ही खुश हैं।

हौसला खोती सरकार

ऐसे वक्त में सरकार को अपना हौसला या फोकस बनाए रखना चाहिए। दुर्भाग्य से, ऐसे लक्षण दिख रहे हैं कि सरकार बस अल्पावधि उछाल का इंतजार कर रही है- थोड़े समय के उछाल के लिए सरकारी खर्चों में बढ़ोतरी करना और 7.6 फीसद (वृद्धि दर) के आंकड़े की चकाचौंध से सम्मोहित होने के लिए लोगों को लुभाना।वरना और क्या वजह हो सकती है कि सरकार एक समिति को राजकोषीय घाटे के ‘लचीले लक्ष्य’ की व्यावहारिकता तलाशने का जिम्मा सौंपे? और क्या कारण हो सकता है जो यह बता सके कि पहली बार मुद्रास्फीति संबंधी ‘लचीले लक्ष्य’ के लक्षण मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के वक्तव्य में क्यों दिखे? गवर्नर ऊर्जित पटेल ने मुद्रास्फीति संबंधी लक्ष्य की समय-सीमा मार्च 2018 से खिसका कर ‘मध्यावधि’ क्यों कर दी, जिसकी कोई पक्की तारीख नहीं है।दोनों ‘बहुत बुरे’ विचार हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि एनके सिंह समिति राजकोषीय घाटे के लचीले लक्ष्य के विचार को दरकिनार कर देगी और सिफारिश करेगी कि सरकार को किसी भी सूरत में- घोषित युद्ध की स्थिति को छोड़ कर- राजकोषीय घाटे की तीन फीसद की सीमा लांघनी नहीं चाहिए। मैं यह भी उम्मीद करता हूं कि गवर्नर पटेल अगले नीति-वक्तव्य में महंगाई की बाबत रिजर्व बैंक के फैसले को बहाल करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि महंगाई संबंधी लक्ष्य की समय-सीमा मार्च 2018 ही रहेगी।

 

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