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‘दूसरी नजर’ कॉलम में पी. चिदंबरम का लेख: मध्यकाल या मंझधार

रकार के कामकाज का जायजा लेने का स्वाभाविक और उपयुक्त अवसर है- इसके वायदों, क्रियान्वयन और अर्थव्यवस्था की हालत का।
Author November 27, 2016 04:36 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। PTI Photo by Atul/file

भारत-पाकिस्तान की सीमा पर बढ़ते तनाव और अर्थव्यवस्था में भारी अफरातफरी के बीच इस पर किसी का ध्यान ही नहीं गया कि शनिवार, 26 नवंबर को क्या खास था। ठीक इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपना आधा कार्यकाल पूरा किया। यह सरकार के कामकाज का जायजा लेने का स्वाभाविक और उपयुक्त अवसर है- इसके वायदों, क्रियान्वयन और अर्थव्यवस्था की हालत का। मैंने औसत नागरिक की आर्थिक चिंताओं की एक सूची तैयार की, फिर उनमें से वे मुद््दे हटा दिए जो कि उतने महत्त्वपूर्ण नहीं थे जितने कि बाकी थे। आखिरकार मैंने तीन ही मुद््दे रखे, और सूची को इससे कम नहीं किया जा सकता था। मेरे खयाल से, हरेक के मन में सबसे जरूरी मसले ये हैं: रोजगार, ऋण वृद्धि और निवेश। अतीत उस आईने की तरह है जिसमें हम पीछे की तरफ देखते हैं, पर उसे बदल नहीं सकते। वर्तमान रोजगार की मांग और ऋण से परिभाषित होता है। भविष्य आज किए गए निवेश और आने वाले दिनों में निहित है।

रोजगार विहीन विकास
‘रोजगार’ बात शुरू करने का अच्छा विषय है। लगभग हर कोई या तो कहीं काम करता है या स्व-रोजगार। नौकरी वाला व्यक्ति पारिश्रमिक या वेतन पाता है, स्व-रोजगार वाला व्यक्ति अपनी आय अर्जित करता है। पिछले तीस महीनों के रोजगार सृजन के आंकड़े साफ तौर पर जो उजागर करते हैं वह चिंताजनक है। एक पूर्व वित्तमंत्री के शब्दों को उद्धृत करना बेहतर होगा:
‘‘नए रोजगार-सृजन को निरंतर चोट पहुंच रही है और आर्थिक वृद्धि से इसका रिश्ता टूट सकता है…हम राजनीतिकों को यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि आम आदमी को सैद्धांतिकी से कुछ लेना-देना नहीं होता। वह नतीजे चाहता है, और हम अगर लोगों को पर्याप्त संख्या में रोजगार मुहैया कराने में नाकाम रहते हैं, तो वे हताश ही होंगे।’’ ये पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा हैं। उनके पुत्र, जयंत सिन्हा, दो साल से कुछ अधिक समय तक मौजूदा सरकार में वित्त राज्यमंत्री थे, और अब नागरिक उड््डयन राज्यमंत्री हैं।
रोजगार-विहीन विकास ने इस दावे पर सवालिया निशान लगा दिया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है। एक अनुमान के मुताबिक, यहां हर साल डेढ़ करोड़ लोग रोजगार के बाजार में प्रवेश करते हैं। नरेंद्र मोदी के चुनावी वायदों में से जिस वायदे ने करोड़ों स्त्री-पुरुषों को उनकी पार्टी को वोट देने के लिए आकर्षित किया, यह था कि वह सत्ता में आए तो हर साल दो करोड़ नए लोगों को रोजगार देंगे। इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि पिछले दो साल का समय भारत में रोजगार-विहीन विकास का दौर था।

* आठ श्रम-सघन क्षेत्रों में रोजगार सृजन 2014 में 4,90,000 और 2015 में 1,35,000 था, जबकि 2009 में 12,50,000 (जब श्रम ब्यूरो का सर्वे शुरू हुआ);
* वर्ष 2015 में जनवरी से सितंबर के बीच अनुबंध आधारित रोजगार 21,000 कम हो गया, जबकि वर्ष 2014 में समान अवधि के दौरान इसमें 1,20,000 की बढ़ोतरी हुई थी;
* केयर रेटिंग्स के एक अध्ययन के मुताबिक 2014-15 में रोजगार-वृद्धि दर लगभग शून्य थी- सिर्फ 0.3 फीसद;
* मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की कंपनियों में वर्ष 2014-15 में रोजगार-सृजन की दर ऋणात्मक थी, जबकि 2013-14 में यह 3.2 फीसद थी।
रोजगार-सृजन आसान नहीं है। अनुमान है कि 2005-2012 के दौरान डेढ़ करोड़ नए रोजगार सृजित हुए थे; पर दूसरी तरफ लाखों लोग बिना रोजगार के थे। हालत और बिगड़ी ही है। रोजगार के मोर्चे पर सरकार बुरी तरह नाकाम है।
सुस्त ऋण वृद्धि
अब ऋण वृद्धि को लें। स्व-रोजगार या रोजगार-सृजन का ऋण की उपलब्धता से गहरा नाता है। सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग (खासकर सूक्ष्म व लघु) सबसे ज्यादा तादाद में रोजगार पैदा करते हैं। नीचे दी गई तालिका यूपीए सरकार के आखिरी तीन वर्षों और राजग सरकार के प्रथम दो वर्षों के दौरान की ऋण-वृद्धि दर को दर्शाती है। दूसरे असर क्या होंगे इसे छोड़ भी दें, पर यह जाहिर है कि ऋण वृद्धि दर का ग्राफ नीचे रहने का नतीजा नए रोजगार की कमी और कुछ क्षेत्रों में रोजगार की हानि के रूप में आता है। सालाना आधार पर 11 नवंबर 2016 को ऋण वृद्धि दर सिर्फ 8.25 फीसद थी। निम्न ऋण वृद्धि दर का सीधा असर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) और निर्यात में दिखता है। आइआइपी और निर्यात, दोनों बुरी तरह लड़खड़ा रहे हैं। सरकार इस सवाल का जवाब दे पाने में बुरी तरह नाकाम रही है कि क्यों कुल ऋण वृद्धि दर पिछले बीस सालों में सबसे निचले स्तर पर है।
वर्ष साल-दर-साल ऋण वृद्धि दर में हुआ बदलाव
सभी उद्योग सूक्ष्म व लघु उद्योग मझोले उद्योग बड़े उद्योग
2011-12 20.74 12.58 7.53 23.32
2012-13 15.12 20.13 -0.07 15.56
2013-14 12.84 22.48 -0.48 12.25
2014-15 5.61 9.13 -0.32 5.33
2015-16 2.75 -2.24 -7.79 4.24
निराशाजनक निवेश
अंत में, निवेश को लेते हैं। निवेश को मापने का सबसे अच्छा पैमाना कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) है। यह 2014-15 में 4.85 फीसद और 2015-16 में 3.89 फीसद था, जो कि निम्न स्तर है और आइआइपी में सीधा प्रतिबिंबित होता है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी किया गया जीडीपी का पिछला अनुमान यह था कि पिछले वित्तवर्ष की पहली तिमाही के मुकाबले 2016-17 की पहली तिमाही में जीएफसीएफ 3.1 फीसद सिकुड़ गया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग आॅफ इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, प्राइवेट सेक्टर की नई परियोजनाओं की घोषणा में जुलाई-सितंबर 2016 के दौरान, पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले, 21 फीसद की कमी आई है। पिछले दो साल में बड़े उद्योगों की बाबत ऋण वृद्धि दर 5.33 फीसद और 4.24 फीसद थी, जो कि कई वर्षों का सबसे निचला स्तर है (देखें तालिका)। वित्तमंत्री ने प्राइवेट सेक्टर से निवेश का बार-बार आग्रह किया है, मगर वहां उनके प्रोत्साहन या बैंक-ऋण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है!
तो यह है इस सरकार का मध्यकाल। रोजगार सृजन नहीं; ऋण वृद्धि रसातल में, और प्राइवेट सेक्टर के निवेश की हालत निराशाजनक। तीन मुख्य विषयों में फेल होने के बाद सरकार दावा कर रही है कि उसने इम्तहान बड़े उत्तम अंकों के साथ पास किया है! अब आप समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री ने तथाकथित विमुद्रीकरण के साथ मौजूदा परिदृश्य को बदलने के लिए नाटकीय होने का चुनाव क्यों किया।

 

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