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दूसरी नजर: वार्ता की कूटनीति की असफलता

1975 से भारत-चीन सीमा पर कोई गोलीबारी नहीं हुई थी और कोई जान नहीं गई थी। चार हजार पांच सौ छह किलोमीटर लंबी सीमा पर पैंतालीस साल तक शांति बनाए रखना कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी। चीन ने उस शांति को भंग कर दिया और नरेंद्र मोदी की निगरानी में बीस भारतीय सैनिक शहीद हो गए।

India China, Galwan Valley,लद्दाख में तैनात भारतीय सेना का जवान। (फाइल फोटो-PTI)

चीनी सैनिकों ने अगस्त 1959 में भारत-चीन सीमा के पूर्वी क्षेत्र के लोंगजू में भारतीय सेना पर हमला किया था। चेतावनी की घंटी बज चुकी थी। आठ सितंबर 1962 को चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में घुस गए थे। इसके कुछ ही समय बाद 20 अक्तूबर को चीनी सैनिकों ने हमला बोल दिया। चीन ने 24 अक्तूबर को तीन बिंदुओं का एक अपने हितों का एक प्रस्ताव रखा था, जिसे भारत ने खारिज कर दिया था।

14 नबंवर को चीनी फौज ने बड़ा धावा बोला और भारतीय क्षेत्र में करीब सौ मील तक घुस आई। इसके बाद 21 नवंबर को चीन ने एकतरफा युद्धविराम और सेना की वापसी का एलान कर दिया। चीन ने कहा था कि वह ‘पूर्वी क्षेत्र में वह अपनी मौजूदा स्थिति से वास्तविक नियंत्रण रेखा, जो कि गैरकानूनी मैकमोहन रेखा का उत्तर है, के उत्तर में पीछे हटने को तैयार है और उस रेखा से बीस किलोमीटर और पीछे चला जाएगा।’ 1962 से चीन उस जगह पर अभी तक जमा हुआ है जहां से उसने एकतरफा वापसी कर ली थी और इस तरह कुछ मिला कर पूर्वी क्षेत्र में 1962 की घुसपैठ खाली हो गई थी।

भारत 1962 का युद्ध हार गया था, लेकिन अभी तक विद्रोही बना रहा। चीन को एक नियंत्रण रेखा तैयार करनी थी, जिसे लेकर दोनों देशों की समझ अलग-अलग रही। 1993 में नियंत्रण रेखा या जो भी यह थी, को ही वास्तविक नियंत्रण रेखा मानने पर सहमति बन गई थी, लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर भी दोनों देशों का मानना अलग-अलग रहा। 1975 से भारत-चीन सीमा पर कोई गोलीबारी नहीं हुई थी और कोई जान नहीं गई थी। चार हजार पांच सौ छह किलोमीटर लंबी सीमा पर पैंतालीस साल तक शांति बनाए रखना कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी। चीन ने उस शांति को भंग कर दिया और नरेंद्र मोदी की निगरानी में बीस भारतीय सैनिक शहीद हो गए।

हमलावर चीन था
इस पूरे काल में यहां तक कि जब चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सहमत हो गया था (हालांकि उसका दृष्टिकोण अलग था), चीन ने लद्दाख में गलवान घाटी को लेकर कोई दावा नहीं किया था। तब जमीनी हालत पर एक जनवरी 1963 को जवाहरलाल नेहरू ने तबके चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई को पत्र लिखा था-

‘3- पिछले सात या आठ साल के दौरान मैंने कई मौकों पर लद्दाख के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया है। मेरी पिछली यात्राओं के दौरान वहां चीनी बलों की कोई मौजूदगी नहीं थी, न ही चीनी सैनिकों के लद्दाख में उनके घुसने की कोई खबर थी। बाद के मौकों पर लद्दाख में कई जगह उनके घुस जाने की खबरें आईं… यह मैं आपको आपको अपनी निजी जानकारी के आधार पर कह सकता हूं। पूर्वी लद्दाख के बड़े हिस्से पर चीनी कब्जे के अस्पष्ट आरोपों को स्वीकार करने की अपेक्षा आप मुझसे नहीं करेंगे, जबकि यह मेरे अपने देखे के उलट है… ’

‘8- आठ सितंबर 1962 के पहले कभी भी यहां तक कि जब भारत आजाद हुआ, तब भी चीनी सेना ने लांगजू के अलावा पूर्वी क्षेत्र में सीमा पार नहीं की थी।’

मोदी की निगरानी में
चाऊ को लिखे पत्र में नेहरू ने चीन को साफ-साफ ‘हमलावर’ कहा था। यह तब था जब भारत हार गया था और तब चीन विजेता के न्याय को थोपना चाह रहा था।

यही गलवान घाटी में हो रहा है जिसमें चीन ने अब संप्रभुता का दावा नहीं किया है, और पैंगोंग त्सो और हॉटस्प्रिंग में चीनी सैनिकों ने मार्च-अप्रैल में घुसपैठ कर ली थी। भारत को जब घुसपैठ का पता लगा तो पांच मई को चीनी सेना को चेतावनी दी। यह आमना-सामना 15-16 जून की रात खूनी संघर्ष में बदल गया। यह भी नरेंद्र मोदी की निगरानी में हुआ।

फिर भी, पता नहीं क्यों प्रधानमंत्री हमलावर के रूप में चीन का नाम नहीं ले रहे। क्या विदेश मंत्रालय इस अप्रत्याशित दुविधा से खुश है? क्या सेवारत जनरल और लड़ रहे जवान प्रधानमंत्री के जानबूझ कर साध लिए गए मौन से खुश हैं?

पूर्व की यथास्थिति की बहाली
पिछले कई महीनों में दोनों देशों के रिश्तों में नाटकीय बदलाव आया है। 28 अप्रैल 2018 को बुहान शिखर वार्ता के बाद जारी साझा बयान में सीमा विवाद पर सिर्फ एक पैरा दिया गया था। इसमें हमेशा जैसी बात थी जैसे कि ‘शांति बनाए रखने’, ‘विश्वास बहाली के कदम’ .. आदि।

12 अक्तूबर, 2019 को महाबलीपुरम में वार्ता के बाद सत्रह अनुच्छेद वाले बयान में सीमा विवाद को नीचे कर सोलहवें अनुच्छेद में डाल दिया गया था। दूसरी ओर, दोनों नेताओं ने ‘2020 को भारत-चीन के सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों की आवाजाही के वर्ष के रूप में मनाने का फैसला किया था।’ इस भव्य प्रदर्शन के विचार को मोदी ने पसंद किया होगा !

इसके बाद 21 दिसंबर 2019 को विशेष प्रतिनिधियों की बाईसवीं बैठक के बाद जारी बयान में उन्हीं बातों को दोहराया गया। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि पीएलए तीन महीने बाद घुसपैठ की योजना पर काफी तैयारी कर चुकी थी। लगता है शी भारत की इस कमजोर स्थिति को सही-सही भांप गए थे जो भारत की अर्थव्यवस्था नीचे जाने का नतीजा थी। शी के इरादों की थाह लेने में मोदी पूरी तरह से नाकाम रहे।

इसका नतीजा एक कूटनीतिक आपदा, एक सैन्य झटका (कम से कम अस्थायी) और 1993 के बाद से जो कुछ हासिल किया था, उसके सफाए के रूप में सामने आया। इसका सबक यह है कि कूटनीति का काम राजनयिकों पर छोड़ दिया जाए। यह काफी मुश्किल और धीमा हो सकता है, लेकिन वे उन संकेतों का पता लेंगे जिन्हें समझने में नौसिखिए नाकाम हो जाएंगे।

पांच जुलाई को दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने कहा कि सैनिकों को पीछे हटाने और तनाव कम करने काम शुरू हो गया है। मैं इसका स्वागत करूंगा, लेकिन पांच मई से पूर्व वाली स्थिति का घोषित लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार को कुछ करना होगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रक्रिया और इसकी प्रगति तथा मोदी सरकार की जवाबदेही पर लोग करीबी से नजर रखेंगे।
इस बीच, ‘भारत-चीन 2020 के वर्ष की शुरूआत से पहले ही एक शर्मनाक अंत हो गया….’

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