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तीरंदाजः महाबली के दिन

नए खुलासों से साफ है कि ट्रंप के आरोपों, अपशब्दों और धमकियों के बावजूद पत्रकारिता ने अपना धर्म निभा दिया है। उसने साहब की वह तस्वीर पेश कर दी है, जिसे ट्रंप अपने शब्दजाल और जुमलों में छिपाने पर आमादा थे।

वे विस्मित हैं कि देशहित के प्रति उनके पूर्ण समर्पण के बावजूद लोग उनके आलोचक क्यों हैं।

डोनाल्ड ट्रंप साहब बहुत दुखी हैं। ट्रंप साहब गुस्से में भी हैं। साहब आश्चर्यचकित हैं कि वे देश के लिए इतना कर रहे हैं, पर फिर भी अमेरिका में धूम मची है कि उनकी सरकार जैसी लचर सरकार देश के इतिहास में कभी नहीं आई थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि जब शेयर बाजार लगातार नई ऊचाइयों पर पहुंच रहा है, बेरोजगारी कम होती जा रही है, आम आदमी की आय बढ़ रही है, अमेरिका की सैन्य शक्ति अपरंपार होती जा रही है और देश का डंका दुनिया के हर कोने, विशेषकर रूस और उत्तर कोरिया, में जम कर बज रहा है, तो कुछ उदार किस्म के लोग उन जैसे यशस्वी प्रधान के पीछे क्यों पड़े हैं? वे विस्मित हैं कि देशहित के प्रति उनके पूर्ण समर्पण के बावजूद लोग उनके आलोचक क्यों हैं।

ऐसा होना नहीं चाहिए था। ट्रंप साहब ने इसके लिए पहले ही दिन से रणनीति तैयार कर ली थी। उनका दावा था कि अमेरिका का मीडिया बिका हुआ है और झूठ फैलाने में माहिर है। राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया में ही उसने झूठ फैलाना शुरू कर दिया था और साहब कहते थे कि वे सतर्क हैं, देशवासियों को भी हो जाना चाहिए। आखिरकार उनका मुकाबला हिलेरी क्लिंटन से था, जोकि वाशिंगटन के राजनीतिक दलदल में अपने पति बिल क्लिंटन के साथ दशकों से फल-फूल रही थीं। सत्ता के गलियारे में नए आए व्यवसायी (मारवाड़ी) ने तब परिवार केंद्रित अमेरिकी राजनीति में अपने को बाहरी बता कर देश में व्याप्त राजनीतिक दलदल को साफ करने का बीड़ा उठाया था। उनका जुमला लोगों को भा गया था और हिलेरी क्लिंटन के बुरे दिन शुरू हो गए थे।

डोनाल्ड ट्रंप साहब की शुरुआत बहुत अच्छी रही। उन्होंने अपने देशवासियों से सीधा संवाद करना शुरू कर दिया। उन्होंने ट्विटर को अपना मुखपत्र बनाया और कुछ ही दिनों में उन्होंने अपनी टूटी-फूटी भाषा में लिखी ट्वीट शृंखला के माध्यम से फर्जी मीडिया की धज्जियां उड़ा दी थी। उनका कहना था कि मीडिया सिर्फ और सिर्फ झूठ में लिप्त है। वह उनके खिलाफ सिर्फ इसलिए है, क्योंकि वह उनके प्रतिद्वंद्वियों के हाथों बिका हुआ है। वह जाली खबरें बना कर उनकी छवि बिगड़ना चाहता है। साहब ने मीडिया के खिलाफ खूब लिखा और उसको इस हद तक ललकारा कि जन संवाद में मीडिया का चाल, चरित्र और चेहरा गंभीर शक के घेरे में आ गया।

वैसे सीधे संवाद करने के कई फायदे हैं। मन की बात फौरन से पेश्तर प्रसारित हो जाती है- बीच में कोई रोका-टोकी या राय-मशवरा नहीं होता है। इसके साथ केवल एक सौ चालीस करैक्टर टाइप कर के बहुत कुछ कहा जा सकता है- गागर में सागर भर जाता है और संतोष जनसभा संबोधित करने जैसा मिलता है। साहब ने अपने ट्विटर लेखन की शान में खुद कहा है कि वे ट्विटर के अर्नेस्ट हेमिंगवे हैं। दूसरे शब्दों में, जैसे हेमिंगवे ने कालजयी साहित्य लिखा था, वे ट्विटर पर ठीक वैसा ही कर रहे हैं। उनका ट्विटर लेखन आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी।

शायद ऐसा ही होगा। ट्विटर एक तरह से अपना ढोल है, जैसे चाहे बजाओ। और फिर डोनाल्ड ट्रंप तो साहब ठहरे। ढोल पर नगाड़ा बजा दिया। उनको यकीन था कि शोर करने से भूत भी भाग जाते हैं, तो मीडिया या उनके निंदकों की क्या मजाल थी कि उनके द्वारा रचे गए शोर के आगे ठहर पाए? साहब हर दिन, हर पल जता रहे थे कि उनसे महान कोई नहीं है, बता रहे थे कि किस तरह वे अमेरिका को फिर से श्रेष्ठतम राष्ट्र बनाने के लिए वे अपनी रातों की नींद हराम कर रहे हैं। साहब कह रहे थे और अपने कहे पर खुद ही खुश हो रहे थे कि सब उनसे लगातार प्रभावित हो रहे हैं। उनके हिसाब से बिके हुए मीडिया और उदारवादी धड़ों को छोड़ कर बाकी सारा देश उनके सुर-ताल में लयबद्ध थे।

दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप साहब को यकीन था कि चूंकि वे राष्ट्रपति हैं, इसलिए वे जो चाहे कर सकते हैं और अगर कुछ गलत हो जाता है तो उसको भाषणों और ट्विटर शोर में दफन किया जा सकता है। उन्होंने अपने को राष्ट्रवादी होने का तमगा दिया और फिर मनमर्जी लागू कर दी। स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करार दे दिया। उनको विश्वास था कि वे अजेय हैं, क्योंकि उनके साथ बहुमतवादी दक्षिणपंथी वोट बैंक मुस्तैदी से खड़ा है। वे बयानबाजी में लगे रहे और इस तुफैल में उन्होंने नीति, व्यवस्थाएं और कार्य प्रणाली ताक पर रख दी। हालात ऐसे हो गए कि ट्रंप भक्त और ट्रंप विरोधी एक-दूसरे के लिए निम्न स्तर की भाषा का इस्तेमाल करने लगे, जिससे पिछले डेढ़ साल में अमेरिका में सामाजिक और राजनीतिक माहौल अभूतपूर्व तरीके से बदल गया है। दोनों पक्षों में संवाद की संभावना विलुप्त हो चली है।

ट्रंप साहब अपने देश में डेढ़ लोगों की सरकार चलाने पर आमादा हैं। एक वे खुद हैं और आधा भाग बेटी-दामाद का मिल कर बनता है। एक साल पहले तक उनकी पार्टी के लोग मानते थे कि समय के साथ साहब देश चलाने की पेचीदगियां समझ जाएंगे, पर जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, बात साफ हो गई कि राष्ट्रपति महोदय की समझ आठवीं कक्षा के बच्चे की समझ से ज्यादा नहीं है। वे अपनी तुफैल में रहते हैं और हमेशा रहेंगे। इसके चलते साहब के सलाहकार उनसे अलग हो गए या फिर किसी तरह से उनके कार्यकाल को खींचने की कोशिश कर रहे हैं।

न्यू यॉर्क टाइम्स में प्रकाशित हाल ही के एक गुमनाम लेख से और उससे कुछ ही दिन पहले जाने-माने पत्रकार बॉब वुडवॉर्ड की किताब से खुलासा हुआ है कि साहब के एकछत्र राज के चलते स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि राष्ट्रपति को हटाने तक की बात उनके निकटम सहयोगी करने लगे हैं। उनको डर है कि ट्रंप साहब की तुफैल का कोई अंत नहीं है और वह उनको ही नहीं, बल्कि देश को ही ले बैठेगी। नए खुलासों से साफ है कि ट्रंप के आरोपों, अपशब्दों और धमकियों के बावजूद पत्रकारिता ने अपना धर्म निभा दिया है। उसने साहब की वह तस्वीर पेश कर दी है, जिसे ट्रंप अपने शब्दजाल और जुमलों में छिपाने पर आमादा थे। दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है। झूठा मीडिया सच्चा साबित हो गया है। खुद को समर्पित ट्विटर जुमलों की बैसाखी गुजर चुकी है। अंदर की बात बाहर आ गई है। अब बस साहब का बाहर जाना बाकी है।

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