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प्रसंग: दिल्ली का दामन

सवाल है कि अतीत को ढोते दिल्ली की आबादी के ढाई फीसद आदिवासियों को विकास के मॉडल में शामिल किए जाने की कोई मंशा दिल्ली सचिवालय की है या बदनामी के अंधेरे खोखल में अतीतजीवी बने रहना उन आदिवासियों की नियति है?

Author Published on: April 14, 2019 5:43 AM
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2011-12 के मुताबिक दिल्ली की कुल आबादी का ढाई फीसद हिस्सा आदिवासियों का है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अमरेंद्र किशोर

दिल्ली नहीं मानती कि उसके दामन में कोई आदिवासी रहता है। लिहाजा राज्य सरकार की विकास प्राथमिकता में वहां के आदिवासियों को लेकर कोई कार्ययोजना नहीं है। सवाल है कि क्या राज्य सरकार के पास आदिवासी आबादी न होने के इस निष्कर्ष का कोई पुख्ता प्रमाण है या नौकरशाह खुद इसे मान चुके हैं? जैसे विभाजन के समय पाकिस्तान और बाद में देश के मुख्तलिफ इलाकों से पलायन कर कई नस्लों और जाति-प्रजातियों के लोग आकर यहां बसते गए, उसी तरह वे लोग नहीं आए जो नस्लीय पूर्वाग्रह या विकास की चपेट से उजड़े या उखड़े लोग थे, जो आदिवासी थे। सच यह है कि दफ्तरशाही की गलतफहमी के चलते पहाड़ों और जंगलों से निकल कर आए लाखों लोग ‘आदिवासी’ की पहचान से मुक्त होकर दिल्ली में रहते हैं, जबकि उनके पूर्वजों-पुरखों को इतिहास के पुरालेखों में आदिवासी कहा गया है।

पुरालेखों और प्रमाणों पर नौकरशाही माथापच्ची नहीं करना चाहती। झारखंड में अगरिया समुदाय दशकों से आदिवासी कहलाने को तरस रही है। वे प्राचीन लौहशिल्पी हैं, हैमेटाईट पत्थरों से लोहा निकालने का काम कई युगों से करते चले आ रहे हैं। इस जनजाति का पूरा नाम असुर अगरिया है, लेकिन झारखंड के सरकारी अभिलेखों में इनका उल्लेख केवल ‘अगरिया’ के रूप में किया गया है। लिहाजा, वे अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनीधिकार अधिनियम, 2006 के तहत विशेषाधिकारों का खालिस लाभ चाहते हैं। चूंकि जिलाधिकारियों ने उन्हें आदिवासी प्रमाण-पत्र जारी नहीं किया, इसलिए वे अधिनियम के तहत अधिकारों का दावा नहीं कर सकते। उल्लेखनीय है कि 2003 में केंद्र सरकार की अधिसूचना के बाद छत्तीसगढ़ में अगरियों को पहले ही आदिवासी का दर्जा दिया जा चुका है, लेकिन झारखंड सरकार ने अभी इस पर अमल नहीं किया है। यही स्थिति पूर्वोत्तर भारत के कोच, राजबोंग्सी, ताई अहोम, मटक और मोरन समुदायों की है, जो आदिवासी कहलाने को तरस रही हैं।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी संजातीय और नस्लीय पहचान के लिए तरस रहा है। वैसे तो राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2011-12 के मुताबिक दिल्ली की कुल आबादी का ढाई फीसद हिस्सा आदिवासियों का है। इन आदिवासी समुदायों ने अपनी खानाबदोश खासियत को लेकर इतिहास में भली-बुरी पहचान बनाई है। इस बारे में फिलिप मिडोज टेलर (कॉन्फेशन ऑफ ए ठग/ 1939) लिखते हैं कि ‘लूटपाट की उनकी जीवन-पद्धति ने उन्हें इतना खूंखार बना दिया कि एक राज्य दूसरे राज्य को परेशान करने के मकसद से इन आपराधिक तबियत और हरकतों को अंजाम देने वाले आदिवासियों का सहारा लेते थे। यानी पड़ोसी राज्य के राजा-रजवाड़ों के इशारे पर वे आपराधिक आदिवासी राहजनी करते थे। उन अपराधजीवी नस्लों को रजवाड़ों ने संरक्षण दिया तो लूट का एक बड़ा हिस्सा राजकोष में भरा जाने लगा।’ हद तो तब हो गई जब इन अपराधी नस्लों ने बर्बरता की हदों के पार जाकर हत्या का सिलसिला शुरू किया। इसके बाद 1871 में क्रिमिनल ट्राइबल एक्ट अस्तित्व में आया। दिल्ली और उसके आसपास रहने वाले कोई दर्जन भर आदिवासी समुदाय इसी अमानवीय सूची में शुमार किए गए।

क्रिमिनल ट्राइबल एक्ट के तहत सैकड़ों समुदायों पर अपराधी नस्ल का ठप्पा लगाया गया। उसके बाद इस कानून की आड़ में सरकार के कपट भरे कठोर व्यवहार की शुरुआत हुई। इसके सबसे बड़े भुक्तभोगी बने सांसी लोग, जो आज भी दिल्ली में रहते हैं। अंग्रेजों के गजटों-गजेटियर में उन तमाम आदिवासी समुदायों के नाम लिखे और वे ‘अपराधी कबीले’ या सरकश जनजाति घोषित किए गए। लिहाजा, पुलिसिया दमन से परेशान इनके मर्द या तो जंगलों में रहते थे या पकड़े गए तो जेलों में- नतीजतन, औरतें शराब की भट्टियों में रहती थीं या समाज के चौधरियों के हरम में या सत्ता के बिछौने पर। बावरिया, सांसी और बंजारा समुदायों को लेकर समाज जहां चौकन्ना और सतर्क था वहीं गाड़िया लोहार अपने लौह-कर्म से देश की मुख्यधारा के साथ सहज होकर जीवनयापन करते रहे। यहां तक कि खुली बाजार-व्यवस्था के पहले तक जब दिल्ली का दायरा आज के मुकाबले कम था, तो ये कलंदर-मदारी-नट और संपेरों की कलाबाज और कारीगर जनजातियां आसपास बस्तियों में डेरा जमा कर अपने परिवार का भरण-पोषण करतीं थीं। बीती सदी के अंत तक दिल्ली की कच्ची बस्तियों में डेरा डाल कर पुरखों से संपेरे सांपों का तमाशा दिखा कर, बहेलिए चिड़ियों का शिकार कर और कलंदर बंदर-भालू नचा कर अपना पेट भरते थे।
पर जमाना बदला, तो माहौल बदला। यह बदलाव वाजिब था। बल्कि कानून के प्रावधानों और उन प्रावधानों की पेचीदगी ने जैसे वक्त के पहिए को रोक दिया। वन्य-जीव संरक्षण अधिनियम तो 1972 से अस्तित्व में था, मगर 1990 में इसे सख्ती से लागू कर मदारी-कलंदर और संपेरों के पेशे पर रोक लगा दी गई। वन्य-जीवों को बचाने की मुहिम की व्यावहारिक और वाजिब जरूरत महसूस की गई।

लिहाजा, दिल्ली की उन अनियमित बस्तियों में विभिन्न प्रजाति के सांपों के रखने की मनाही हो गई। मदारियों और कलंदरों का बंदर-भालू तमाशा थम गया। बहेलियों के तीर-कमान और गुलेल की मार का कौशल इतिहास की कंदराओं में जा सिमटा। ऐसे में हजारों मदारी-कलंदर और बहेलिए भीख मांगने को मजबूर हुए। मगर कोई इकतीस साल पुराना भिक्षावृति निवारण कानून रोजी-रोटी के उनके वैकल्पिक उपाय में अड़चन बना। भिक्षावृति निवारण कानून की परवाह किए बगैर ये जनजातियां दिल्ली और उसके समीपवर्ती उपनगरों की सड़कों पर सक्रिय हो गईं। सिलसिला यहीं नहीं थमा, भूख ने उन्हें इतना समझौतावादी बना दिया कि इस जनजातीय समाज की लड़कियों की वजह से राष्ट्रीय राजधानी के कई इलाके ‘हॉट बेड ऑफ दिल्ली’ के नाम से चिह्नित और चर्चित हुए। इन मदारियों-कलंदरों-संपेरों के पुनर्वास और रोजगार के लिए राष्ट्रीय राजधानी के नागरिक संगठनों ने दिल्ली सचिवालय से लेकर मंत्रालयों की देहरी पर नाक रगड़ी और गुजारिशें की, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

यह सच है कि दिल्ली के समीपवर्ती इलाकों के लुटेरे बावरिया और यहां के विभिन्न इलाकों में रहने वाले सांसी जनजाति लंबे समय से विधि-व्यवस्था को चुनौती देते रहे हैं। उनके आपराधिक चरित्र ने दिल्ली को बहुत अस्त-व्यस्त किया। एच. गुप्ता ने अपनी किताब ‘ए क्रिटिकल स्टडी ऑफ द ठग्स एंड देयर एक्टिविटीज’(1959) में लिखा है कि ‘साल 1911 में देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली हस्तांतरण के मुद्दे पर एक बड़ी समस्या आपराधिक जनजातियों की गतिविधियों को लेकर थी। ब्रिटिश लेखक डेविड एच डेले बाद में लिख गई अपनी किताब ‘द पुलिस एंड पोलिटिकल डेवलपमेंट इन इंडिया’ (1959) में इस रिवायत को विस्तार दिया है। दिल्ली में रहने वाला आज का प्रमुख जनजातीय समाज सांसी भले अतीत में अपराधजीवी रहा है और यह भी सत्य है कि हाल के वर्षों तक दिल्ली पुलिस के लिए सांसी सिरदर्दी रहे हैं। मगर हालात बदले हैं। उन्हें अपने आपराधिक अतीत का अपराधबोध भी है, लेकिन सिविल सोसाइटी इस धारणा से मुक्त नहीं हो पाया है कि सांसियों में मुक्ति की छटपटाहट है।’ शिक्षाविद हेनरी स्च्वार्ज बताते हैं कि ‘समाज का यह पूर्वाग्रह बहुत स्वाभाविक है, जो किसी कानून और उसकी बाध्यता की जोर-आजमाइश से मिटाया नहीं जा सकता। अपराध से उपजे आतंक से ग्रस्त समाज का इंद्रियबोध और अपराध से लोहा लेती सरकार की चेतना इतनी सुस्त और गंदली होती है, जो सुधार के लिए तत्पर किसी अपराधी पर मेहरबान होने में झिझक रखती है, बल्कि ऐसी चर्चाओं से भड़कती भी है।’

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