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प्रसंग: दलित उत्पीड़न का सिलसिला

गैर-दलितों को यह बात समझने की जरूरत है कि उनके दुख-सुख के सच्चे साथी दलित ही हैं। राजनेता अपने स्वार्थों के मद्देनजर आपके जख्मों पर मरहम लगाने जरूर खड़े हो जाएंगे, लेकिन सच्चे अर्थों में समाज की तरक्की सामाजिक समरसता से ही संभव है।

Author May 12, 2019 5:11 AM
क्या दलित नेताओं को वास्तव में आंबेडकर के विचारों और आदर्शों की चिंता है?

हाल में उत्तराखंड के एक गांव में ऊंची मानी जाने वाली जाति के लोगों के सामने बैठ कर खाना खाने पर दबंगों ने एक दलित युवक की बेरहमी से पिटाई कर दी, जिसके चलते उसकी मौत हो गई। दलित युवक अपने रिश्तेदार की शादी में गया था। वह कुर्सी पर बैठ कर खाना खाने लगा। इस बीच एक तथाकथित ऊंची जाति का व्यक्ति वहां आया और उसे कुर्सी से उठने को कहा। फिर उस युवक की बुरी तरह पिटाई की गई। कुछ समय पहले गुजरात में मंूछ रखने और गरबा आयोजन में शामिल होने के कारण दलितों से मारपीट और उनकी हत्याओं की घटनाएं सामने आई थीं। इस प्रगतिशील दौर में भी अगर अपनी तथाकथित श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए ऊंची जातियों द्वारा दलितों से मारपीट की जा रही है तो इसे किस विकास का नाम दिया जाएगा।

यह विडंबना ही है कि इस तथाकथित विकास की चकाचौंध में हम अब भी आत्मिक विकास नहीं कर सके हैं। कटु सत्य यही है कि इक्कीसवीं सदी में भी हम दलितों के प्रति अपने पूर्वाग्रह त्याग नहीं पाए हैं। आज भी दलितों का विकास हमारी आंखों में चुभता है और उनकी खुशी हमसे सही नहीं जाती। दलितों से मारपीट की घटनाओं के मूल में ऊंची जातियों का अपने आप को श्रेष्ठ मानने और दलितों को कमतर सिद्ध करने का भाव ज्यादा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में जहां एक ओर नई दलित चेतना विकसित हुई है, वहीं दूसरी ओर दलितों पर अत्याचार के मामले बढ़े हैं। हम अब भी वैचारिक रूप से रूढ़िवादी जकड़नों से बाहर नहीं निकल पाए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में सैंतीस फीसद दलित गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं, जबकि चौवन फीसद दलित कुपोषित की श्रेणी में आते हैं। हर अठारह मिनट पर एक दलित के खिलाफ अपराध घटित होता है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी तक हम दलितों को वह सम्मान नहीं दे पाएं हैं, जिसके वे हकदार हैं। गैर-दलितों में दबंगई का भाव कायम है, जिसके कारण हम दलितों को अपने गले नहीं लगा पाए हैं। गैर-दलितों में श्रेष्ठता बोध ही अनेक समस्याओं को जन्म दे रहा है। गैर-दलितों का यह श्रेष्ठताबोध समय-समय पर प्रकट होकर हमारे समाज के खोखले आदर्शवाद की पोल खोलता रहता है। खोखले आदर्शवाद का आलम यह है कि हम अपने आपको दलितों का हितैषी सिद्ध करने के लिए आंबेडकर की मूर्ति पर पुष्प अर्पित करने का नाटक करते रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ दलितों को नीचा दिखाने का कोई भी मौका चूकते नहीं हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज आंबेडकर के आदर्शों से किसी को कोई मतलब नहीं है। दरअसल, आंबेडकर ने इस सत्य को बहुत पहले समझ लिया था कि जब तक दलित वर्ग अपनी शक्ति को पहचान कर सत्ता का भागीदार नहीं बनेगा, उसकी उपेक्षा होती रहेगी। यही कारण था कि उन्होंने दलितों के आरक्षण की वकालत की।

पर सवाल है कि क्या इस दौर में सत्ता का भागीदार बने दलित नेताओं को वास्तव में आंबेडकर के विचारों और आदर्शों की चिंता है? आज हर राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल कर रहा है। यही कारण है कि आज भी आम दलित को शोषण का शिकार बनाया जा रहा है। यह विडंबना ही है कि आज राजनीतिक दल आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल अपने उत्थान के लिए कर रहे हैं, न कि दलितोत्थान के लिए। सवाल है कि आजादी के बाद राजनेताओं ने आंबेडकर-आंबेडकर चिल्लाने और आंबेडकर के नाम पर विभिन्न परियोजनाओं का नामकरण करने के अलावा किया ही क्या है? क्या आजादी के बाद हमारे राजनेता आंबेडकर के आदर्शों को आत्मसात कर पाए हैं? क्या केवल आंबेडकर के नाम पर पार्क बना देने, उनकी मूर्तियां स्थापित कर देने और उनके विचारों को विचार-गोष्ठियों में दोहरा देने मात्र से हम इस दौर में आंबेडकर को प्रासंगिक बना सकते हैं? शायद नहीं। बड़ी-बड़ी रैलियां आयोजित कर पानी की तरह पैसा बहा देना आंबेडकर का सपना नहीं था। करोड़ों रुपए का हार पहन कर भव्य पंडाल में दलितों और अपने अनुयायियों लिए महाभोज आयोजित करना भी बाबा साहब की प्राथमिकताओं में नहीं था। क्या ऐसे आयोजनों से वास्तव में दलितों का स्वाभिमान जाग सकता है? हमारे राजनेता कुछ हजार या लाख लोगों को भव्य भोज देने के बजाय गांव के आखिरी आदमी को दो जून की रोटी देने के बारे में कब सोचेंगे? आंबेडकर ने दलितों के जिस स्वाभिमान की बात की थी वह वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित नहीं था।

इस दौर में सबसे दुखद यही है कि वोट बैंक की राजनीति के तहत दलितों के स्वाभिमान को जगाने की बात हो रही है। जब विभिन्न दलों के राजनेता दलितों के साथ खाना खाते और दलितों के घर में रात गुजारते हैं तो दलितों का स्वाभिमान जागने लगता है। लेकिन जैसे ही ये नेतागण अपने महल में वापस लौटते हैं, दलितों की जिंदगी पुराने ढर्रे पर लौटने लगती है। अनेक आश्वासनों के बाद जब दोबारा दलितों को पुरानी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है, तो उन्हें स्वयं महसूस होने लगता है कि यह वोट बैंक का छलावा है। राजनेताओं के स्वाभिमान जगाने की इस खोखली प्रक्रिया से दलित अपना पुराना स्वाभिमान भी खो देते हैं। दरअसल, यह दलितों को उठाने की नहीं बल्कि गिराने की एक कुटिल चाल है। जो दलित सत्ता के पिछलग्गू बन राजनेताओं की इस चाल का हिस्सा बन जाते हैं, उनका स्वाभिमान अभिमान में बदल जाता है और दूसरे दलितों के प्रति उनका व्यवहार भी शोषणकारी हो जाता है। जबकि आम दलित का स्वाभिमान अपने पुराने स्तर से भी नीचे गिर जाता है। इन नारों और अभियानों मे एक आम दलित के हाथ कुछ नहीं लगता।

आंबेडकर ने अन्यायपूर्ण सामाजिक विषमता के विरुद्ध विद्रोह किया और पूरी शक्ति से इसे मिटाने का प्रयत्न किया। सवाल है कि आज हर क्षेत्र में जागरूकता आने के बाद भी क्या जाति प्रथा मिट सकी है? राजनेताओं ने जाति प्रथा को और अधिक बढ़ाया है। किसी संसदीय क्षेत्र में उम्मीदवार की जाति के लोगों की संख्या देख कर ही टिकट का बंटवारा किया जाता है। तमाम समाजशास्त्रीय अध्ययनों और विमर्शों के बावजूद जाति अपना अस्तित्व बनाए हुए है। केवल राजनेताओं को दोष क्यों दें, समाज भी जाति की राजनीति कर रहा है। जाति के मुद्दे पर हमारे राजनेताओं और समाज का गठजोड़ ही अंतत: अनेक विसंगतियों को जन्म दे रहा है। पहले यह आशा व्यक्त की गई थी कि शायद शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने से इस स्थिति में परिवर्तन आएगा, लेकिन आज इस शिक्षित समाज में भी जातिगत भेदभाव की खबरें प्रकाश में आ रही हैं।

जाति प्रथा की तीव्रता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हरियाणा में एक संगठन के आदेश पर ही दलितों के घर जला दिए गए, मगर इन विसंगतियों पर राजनेताओं का ध्यान क्यों जाएगा? दलितोत्थान के बारे में सोचने की फुरसत तो तब होगी, जब उन्हें अपने उत्थान की योजनाओं से फुरसत मिले। पूरे देश में दलितों के साथ हो रही मारपीट की घटनाओं ने एक बार फिर हमें आईना दिखा दिया है। गैर-दलितों को यह बात समझने की जरूरत है कि उनके दुख-सुख के सच्चे साथी दलित ही हैं। राजनेता अपने स्वार्थों के मद्देनजर आपके जख्मों पर मरहम लगाने जरूर खड़े हो जाएंगे, लेकिन सच्चे अर्थों में समाज की तरक्की सामाजिक समरसता से ही संभव है। आज जरूरत इस बात की है कि हम स्वयं ऐसे समाज का निर्माण करें, जिसमें बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे को गले लगाया जा सके।

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